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SC: मणिपुर घटनाओं की जांच के लिए PIL, पूर्व जज की अध्यक्षता में स्वतंत्र समिति की मांग, इन्हें बनाया प्रतिवादी

Mon, 24 Jul 2023 09:49 PM IST
देव कश्यप पीटीआई, नई दिल्ली।
पीटीआई, नई दिल्ली। Published by: देव कश्यप Updated Mon, 24 Jul 2023 09:49 PM IST
सार

याचिका में कहा गया है कि हिंसा, मारपीट, यौन उत्पीड़न, दुष्कर्म और दंगों से जुड़ा मामला मणिपुर में महीनों से व्याप्त है, फिर भी प्रतिवादी नंबर एक (भारत संघ) और प्रतिवादी नंबर दो (मणिपुर सरकार) की ओर से इस संबंध में कोई कार्रवाई नहीं की गई है।

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PIL in SC seeks independent panel headed by ex-apex court judge to probe incidents of Manipur sexual assault
सुप्रीम कोर्ट। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

मणिपुर में यौन उत्पीड़न और हिंसा की घटनाओं की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है। याचिका में शीर्ष अदालत के सेवानिवृत्त न्यायाधीश के अधीन एक स्वतंत्र समिति के गठन की मांग की गई है। जनहित याचिका दायर करने वाले वकील विशाल तिवारी का कहना है कि यह मणिपुर में कानून के शासन के उल्लंघन और दमनकारी क्रूरता, अव्यवस्था और फैलाई जा रही अराजकता के खिलाफ दायर की गई है।

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याचिका में कहा गया है, हाल ही में मणिपुर का एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें दो महिलाओं को भीड़ के कब्जे में दिखाया गया और उन्हें निर्वस्त्र करके अपमानजनक तरीके से घुमाया गया और उनके साथ यौन उत्पीड़न किया गया। इस पूरी घटना ने देश को झकझोर कर रख दिया है। हिंसा, मारपीट, यौन उत्पीड़न, दुष्कर्म और दंगों से जुड़ा मामला मणिपुर में महीनों से व्याप्त है, फिर भी प्रतिवादी नंबर एक (भारत संघ) और प्रतिवादी नंबर दो (मणिपुर सरकार) की ओर से इस संबंध में कोई कार्रवाई नहीं की गई है।
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जनहित याचिका (पीआईएल) में कहा गया है कि स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति को चार सप्ताह के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपने के लिए कहा जाना चाहिए और कर्तव्य में लापरवाही और ललिता कुमारी मामले में शीर्ष अदालत के 2013 के फैसले का पालन नहीं करने के लिए राज्य एजेंसियों के खिलाफ कार्रवाई करने का निर्देश जारी किया जाना चाहिए।
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ललिता कुमारी मामले में अपने फैसले में शीर्ष अदालत ने पुलिस द्वारा पालन किए जाने वाले दिशा-निर्देशों का एक सेट जारी किया, जिसमें सीआरपीसी की धारा 154 के तहत एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य है, अगर जानकारी संज्ञेय अपराध के घटित होने का खुलासा करती है और ऐसी स्थिति में कोई प्रारंभिक जांच की अनुमति नहीं है।

सीबीआई जांच के लिए निर्देश देने की भी मांग
शीर्ष अदालत ने कहा था कि यदि जानकारी किसी संज्ञेय अपराध का खुलासा नहीं करती है, लेकिन जांच की आवश्यकता का संकेत देती है, तो यह पता लगाने के लिए प्रारंभिक जांच की जा सकती है कि क्या जानकारी किसी संज्ञेय अपराध का खुलासा कर सकती है। तिवारी ने मणिपुर में हिंसा की सीबीआई जांच के लिए अदालत से निर्देश देने की भी मांग की है।

जनहित याचिका में कहा गया है कि हिंसा से प्रभावित राज्य में कोई निवारक और सुधारात्मक उपाय नहीं किए गए हैं। यहां कानून और संविधान के शासन का उल्लंघन हुआ है और न्याय का कोई सहारा नहीं है।

इसमें कहा गया कि हिंसा ने आम लोगों का जीवन दयनीय बना दिया है। इसमें दावा किया गया कि हिंसा को रोकने के लिए केंद्र या राज्य सरकार की ओर से कोई हस्तक्षेप नहीं किया गया। जनहित याचिका में कहा गया, मणिपुर पुलिस ने सोशल मीडिया पर इस घटना को अपहरण, सामूहिक दुष्कर्म और हत्या का मामला बताया। इस तरह के संज्ञेय अपराध को देश की आपराधिक कानून प्रणाली के अनुसार नहीं निपटाया गया और यह सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुरूप नहीं था।


वीडियो पर संज्ञान लेते हुए मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने केंद्र और मणिपुर सरकार को तत्काल उपचारात्मक, पुनर्वास और निवारक कदम उठाने और की गई कार्रवाई से अवगत कराने का निर्देश दिया था। इसमें कहा गया था कि मीडिया में दिखाए गए दृश्य घोर संवैधानिक और मानवाधिकारों के उल्लंघन का संकेत देते हैं।

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