नौ राज्यों में हिंदू को अल्पसंख्यक का दर्जा देने की अर्जी पर सुनवाई से सुप्रीम कोर्ट का इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने नौ राज्यों में हिंदू को अल्पसंख्यक का दर्जा देने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई से बृहस्पतिवार को इनकार कर दिया। जस्टिस रोहिंग्टन एफ नरीमन की पीठ ने याचिकाकर्ता भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय को इस मामले में हाईकोर्ट का रुख करने को कहा है। जिसके बाद उपाध्याय से याचिका वापस ले ली।
PIL seeking redefinition of "minority" to include Hindus in the states where they are in minority: Supreme Court has directed petitioners to approach individual High Courts of the states where Hindus are in minority. pic.twitter.com/SWFZEeO5mS
— ANI (@ANI) February 20, 2020विज्ञापन
याचिका में कहा गया था कि लक्षद्वीप (2.5 फीसदी), मिजोरम (2.75 फीसदी), नगालैंड (8.75 फीसदी), मेघालय (11.53 फीसदी), जम्म कश्मीर (28.44 फीसदी), अरुणाचल प्रदेश (29 फीसदी), मणिपुर (31.39 फीसदी) और पंजाब (38.40 फीसदी) व लद्धाख में हिंदू अल्पसंख्यक हैं लिहाजा वहां हिंदुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा मिलना चाहिए।
इन राज्यों में बहुसंख्यक, अल्पसंख्यकों का लाभ ले रहे हैं। उपाध्याय ने वर्ष 2017 में भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। तब शीर्ष कोर्ट ने उन्हें अल्पसंख्यक आयोग के पास जाने को कहा था। लेकिन आयोग ने कहा कि वह उसके कार्यक्षेत्र में नहीं आता। लिहाजा उन्होंने सुप्रीम कोर्ट ने फिर से याचिका दायर की थी।
रविदास मामले में अवमानना याचिका दाखिल
संत रविदास मंदिर का मामला एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। पूर्व कांग्रेसी सांसद अशोक तंवर ने अवमानना याचिका दायर की है। इसमें कहा गया कि गत वर्ष अक्तूबर में सुप्रीम कोर्ट ने पुरानी जगह पर ही दिल्ली के तुगलकाबाद में ही मंदिर के निर्माण का आदेश दिया था।
इसके लिए छह हफ्ते में कमेटी गठित करने का भी निर्देश दिया था। लेकिन अब तक कोर्ट के आदेश का पालन नहीं किया गया है। याचिका में दिल्ली सरकार व दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) को प्रतिवादी बनाया गया है। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत गत 10 अगस्त को तुगलकाबाद स्थिति संत रविदास मंदिर को ढहा दिया गया था।
इसके बाद दिल्ली समेत उत्तर भारत में कई जगहों पर विरोध-प्रदर्शन हुए थे। कई याचिकाएं दायर की गईं। इसी बीच केंद्र सरकार ने रविदास मंदिर बनाने के लिए 400 वर्ग मीटर देने का प्रस्ताव दिया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार कर लिया।