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Phone Tap Entry In UP Election 2022: सरकार कैसे और क्यों कर सकती है आपका फोन टैप, विशेषज्ञ से समझिए क्या है फोन टैपिंग का कानून

Mon, 20 Dec 2021 02:07 PM IST
Pratibha Jyoti प्रतिभा ज्योति
Updated Mon, 20 Dec 2021 02:07 PM IST
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सार
मानवाधिकार के तहत हर व्यक्ति को ‘निजता का अधिकार’ और ‘व्यक्तिगत स्वतंत्रता’ का अधिकार हासिल है, फिर ऐसा क्या होता है कि सरकारें चाहें तो किसी का भी फोन टैप कर सकती हैं? 
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Phone Tap Entry In UP Election 2022 , What are the 10 agencies that can tap your phone, what is the  Indian Telegraph Act 1885 law of phone tapping
प्रियंका गांधी, मुख्यमंत्री योगी व अखिलेश यादव। - फोटो : amar ujala

विस्तार

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव करीब आते ही आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है। समाजवादी पार्टी के कुछ नेताओं के घर आयकर विभाग की छापेमारी के बाद सपा अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने आरोप लगाया है कि केंद्र सरकार केंद्रीय जांच एजेंसियों का दुरुपयोग कर रही है और उनके फोन टैप कराए जा रहे हैं। अखिलेश यादव का आरोप है कि शाम को खुद सीएम योगी उसकी रिकॉर्डिंग सुनते हैं।



अखिलेश यादव के फोन टैपिंग के आरोपों का कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने भी समर्थन किया है। उन्होंने रविवार को कहा कि काम करने की बजाय यह सरकार कमरे में बैठकर विपक्षी दलों के फोन टैप कर रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह सरकार विपक्षी नेताओं को सता रही है। वहीं अखिलेश यादव की तरफ से लगाए गए फोन टैपिंग के आरोप पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का भी जवाब आया है। मुख्यमंत्री योगी ने अखिलेश यादव पर पलटवार करते हुए कहा कि कहा, 'उनकी तरफ से यह कृत्य किए जाते होंगे तो उन्हें यही लगता होगा’।


पहली बार नहीं गरमाई सियासत
देश की राजनीति में यह पहली बार नहीं है जब फोन टैपिंग को लेकर सियासत गरमाई हुई है। इससे पहले भी कई बार फोन टैपिंग के मामले बवाल मचा चुके हैं। हाल ही में सरकार पर भारत में कुछ चर्चित और महत्वपूर्ण लोगों के फोन पेगासस नाम के मैलवेयर के जरिए टैप कराने के आरोप लगे हैं। आखिर क्या है फोन टैपिंग का कानून और निजता के अधिकार के बावजूद सरकारें कैसे कर सकती हैं किसी का फोन टैप? इस रिपोर्ट में इन्हीं सवालों के जवाब ढूंढते हैं। 

फोन टैपिंग
फोन टैपिंग - फोटो : demo pic
यह लोगों की निजता से जुड़ा मामला
किसी के फोन टैपिंग को उसकी निजता का हनन माना जाता है और फोन टैपिंग के कानून और दिशा-निर्देशों की मंशा पर ही सवाल उठते रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के वकील, साइबर लॉ एक्सपर्ट और ‘अनमास्किंग वीआईपी’ पुस्तक के लेखक विराग गुप्ता के मुताबिक भारत में वर्तमान कानूनी व्यवस्था के अनुसार निजी व्यक्ति या संस्था टेलीफोन टैपिंग के माध्यम से किसी व्यक्ति की जासूसी नहीं कर सकते।  यह लोगों की जीवन के अधिकार और प्राइवेसी से जुड़ा है जिसके लिए संविधान के अनुच्छेद 21 में संरक्षण दिया गया है। 

वे बताते हैं, सुप्रीम कोर्ट ने प्राइवेसी या निजता के अधिकार को अनेक फैसलों से मान्यता दी है। इस बारे में सबसे ऐतिहासिक फैसला पुत्तास्वमी मामले में सन 2017 में आया जिसे नौ जजों ने सर्वसम्मति से दिया था। अनाधिकृत टेलीफोन टेपिंग संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत मिली अभिव्यक्ति की आजादी का उल्लंघन भी है। इसे रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले से सख्त कानूनी व्यवस्था बनी है। 

सरकार को है ये अधिकार
बावजूद इसके भारत बहुत कम विशेषाधिकार प्राप्त-लोकतांत्रिक देशों में से एक है जहां लोगों को निजता का अधिकार भी हासिल है और सरकारों को विशेष परिस्थितियों में फोन टैप कराने का भी। सरकारें चाहें तो आपके  हरेक फोन कॉल को सुन सकती है और फोटो-वीडियो देख सकती है। सरकार को भारतीय टेलीग्राफिक अधिनियम 1885 की धारा 5 (2) के तहत टेलीफोन को इंटरसेप्ट करने का भी अधिकार मिल हुआ है।

फोन की टैपिंग (सांकेतिक तस्वीर)
फोन की टैपिंग (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : Social Media
कब हो सकता है फोन टैप
एक मामले में गृह मंत्रालय ने दिल्ली हाईकोर्ट को बताया कि देश की संप्रभुता और अखंडता के लिये कानून प्रवर्तन एजेंसियां  फोन टैप करती हैं। यदि किसी कानून प्रवर्तन एजेंसियों को यह लगता है कि जन सुरक्षा या राष्ट्रीय हित में फोन टैप करने की जरूरत है तो उस स्थिति में ऐसा किया जा सकता है। 

इसके नियम क्या हैं
विराग गुप्ता बताते हैं टेलीग्राफ एक्ट 1885 की धारा पांच के तहत लोगों की सुरक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा या जन आपातकाल की स्थिति में राज्य या केंद्र सरकार को टेलीफोन टैपिंग का अधिकार है।  इंडियन टेलीग्राफ संशोधन नियम, 2007 में संशोधन के बाद  टेलीफोन टैपिंग के लिये केंद्र या राज्य सरकार के गृह सचिव स्तर के अधिकारी से पूर्व मंजूरी लेना जरूरी होता है। पहली बार यह मंजूरी केवल 60 दिनों के लिए मिलती है। विशेष परिस्थितियों में इसे 180  दिन से अधिक नहीं बढ़ाया जा सकता है। इसका मतलब है कि सरकार यदि चाहे तो आपकी बातचीत सुन सकती है। 

टेलीफोन टैपिंग के लिए कानूनी व्यवस्था 
विराग गुप्ता के मुताबिक 1995 के बाद देश में मोबाइल फोन भी आ गए। इनकी जासूसी या इंटरसेप्सन के लिए आईटी एक्ट की धारा 69 के तहत सरकार को अधिकार हैं।

2019 में गृह राज्य मंत्री जी किशन रेड्डी ने लोकसभा के एक प्रश्न के उत्तर के दौरान यह बताया था कि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 69 भी केंद्र सरकार या राज्य सरकार को देश की संप्रभुता या अखंडता, राज्यों की सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था या विदेशी राज्यों से मैत्रीपूर्ण संबंधों के हित में किसी भी कंप्यूटर में संग्रहित या भेजी गई सूचना की जानकारी हासिल करने का अधिकार देती है।

हालांकि उन्होंने यह भी कहा था कि सरकार ने किसी भी एजेंसी को निगरानी के लिए पूरी तरह से अनुमति नहीं दी है और हर मामले में कानून और नियमों की उचित प्रक्रिया के अनुसार सक्षम प्राधिकारी से अनुमति की आवश्यकता पड़ती है। 

फोन टैपिंग (फाइल फोटो)
फोन टैपिंग (फाइल फोटो) - फोटो : Social Media
यदि मंजूरी न ली जाए तो? 
किसी भी एजेंसी को फो टैप करने से पहले गृह मंत्रालय की पूर्व मंजूरी लेना जरूरी होता है। अगर बिना मंजूरी ऐसा किया जाता है, तब पीड़ित मानवाधिकार आयोग में शिकायत दर्ज करा सकता है और थाने में भी इसकी एफआईआर करा सकता है। पीड़ित व्यक्ति भारतीय टेलीग्राफिक अधिनियम की धारा 26 (b) के तहत कोर्ट का दरवाजा भी खटखटा सकता है। आरोप साबित होने पर दोषी को तीन साल की तक सजा हो सकती है। फोन टैप के दुरुपयोग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दायर हो चुकी हैं। कई बार निजी टेलीफोन कंपनियों के खिलाफ भी प्रक्रिया का पालन किए बिना इसके दुरुपयोग की शिकायत मिली है। 

कानून को पूरी तरह से बदलने की जरूरत
विराग गुप्ता मानते हैं कि अनधिकृत तौर पर टेलीफोन टैपिंग करने का मर्ज सभी पार्टियों की सरकारों ने पाल रखा है। पक्ष विपक्ष शासित सभी राज्यों में विरोधी दलों के नेता समय-समय पर गलत तरीके से टेलीफोन टैपिंग के आरोप लगाते हैं। वे बताते हैं राजनेताओं या विरोधी पक्ष के लोगों का सियासी आधार पर टेलीफोन टैपिंग करना पूरी तरह से गैरकानूनी है।

वे कहते हैं 'कोई भी सरकार यदि गैर कानूनी तरीके से टेलीफोन टैप करें तो उसके खिलाफ पीड़ित व्यक्ति अदालत जा सकता है। लेकिन समस्या यह रहती है कि टेलीफोन टैपिंग विधि सम्मत तरीके से  हुई या गलत तरीके से हुई है, इसके बारे में पीड़ित व्यक्ति के पास कोई प्रमाण नहीं होता। इसलिए सरकार और निजी कंपनियों द्वारा लोगों और विरोधियों की जासूसी पर लगाम लगाने के लिए अंग्रेज़ी जमाने के टेलीग्राफ कानून को पूरी तरह से बदलने की जरूरत है।'

सीबीआई
सीबीआई - फोटो : पीटीआई
कैसे रुके डिजिटल जासूसी
उनका कहना है नए जमाने में डिजिटल संचार तंत्र और मोबाइल का इस्तेमाल बढ़ने के बाद निजी कंपनियां भी लोगों की जासूसी करने लगी हैं, जैसा की पेगासस मामले से जाहिर है। डिजिटल जासूसी रोकने के लिए सख्त कानून के साथ सुप्रीम कोर्ट से PUCL जैसे नए और सख्त फैसले की जरूरत है। इसके बाद ही लोगों को गलत और अनाधिकृत टेलीफोन टैपिंग के मर्ज से मुक्ति मिल सकेगी। 

10 एजेसियों को है डिजिटल जासूसी का अधिकार
भारतीय कानून करीब 10 सरकारी एजेंसियों को आपकी डिजिटली जासूसी करने का अधिकार देता है। जैसे इंटेलिजेंस ब्यूरो,नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो, एनफोर्समेंट डायरेक्टरेट, सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सेस, डायरेक्टरेट ऑफ रेवेन्यू इंटेलिजेंस, सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टीगेशन, नेशनल इन्वेस्टीगेशन एजेंसी,  रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ), डायरेक्टरेट ऑफ सिग्नल इंटेलिजेंस और दिल्ली पुलिस कमिश्नर को किसी की डिजिटली जासूसी करने का अधिकार है। 
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