PFI Ban: पीएफआई वाले पूर्वज 'साहबों' को क्यों देते थे गाली, क्या है तुर्की और पाकिस्तान से कनेक्शन?
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विस्तार
केंद्र सरकार ने पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया यानी पीएफआई पर पांच वर्ष के लिए प्रतिबंध लगा दिया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा जारी नोटिफिकेशन में कई अहम खुलासे हुए हैं। इंटेलिजेंस एवं जांच एजेंसियों की एक अहम रिपोर्ट, इस संगठन पर बैन लगने का प्रमुख आधार बनी है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि सियासत के चक्कर 'पीएफआई' काफी आगे बढ़ चुका था। वह मुस्लिमों को गुमराह कर रहा था। पीएफआई से जुड़े लोगों के पूर्वज 'साहबों' को गाली देते थे। इस्लाम की सर्वोच्च धार्मिक हस्ती पैगम्बर मुहम्मद के साथी, शिष्य, लेखक और परिजन, जिन्होंने उनके जीवनकाल में साथ दिया, उन्हें अरबी भाषा में 'साहब' बोला जाता है। इसका अर्थ 'साथी' या 'सहयोगी' होता है। इन्हें 'सहाबा' भी कहा जाता है। इसके अलावा तुर्की की 'इंटेलिजेंस' एजेंसी 'एमआईटी' से पीएफआई का संबंध रहा है।
सामने आई दो देशों की खुफिया एजेंसियों की भूमिका
भारतीय खुफिया एजेंसियों और एनआईए की रिपोर्ट के मुताबिक, पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फंडिंग होती रही है। इसमें तुर्की की इंटेलिजेंस एजेंसी 'एमआईटी' और पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी 'आईएसआई' का गठजोड़ भी सामने आया है। इनकी मदद से एक मोटी रकम बैंक खातों में पहुंचाई जा रही थी। इस राशि का इस्तेमाल टेरर फंडिंग में किए जाने के सबूत हाथ लगे हैं। कश्मीर में आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए इन दोनों एजेंसियों की भूमिका सामने आ चुकी है। आईएसआई द्वारा कथित तौर से अपने मकसद के लिए तुर्की राष्ट्रपति रेसेप तैयन एर्दोगन का इस्तेमाल किया गया। साल 2019 में 'संयुक्त राष्ट्र संघ' की महासभा में तुर्की राष्ट्रपति एर्दोगान, मलेशिया के पूर्व पीएम महाथिर मोहम्मद और पाकिस्तान के तत्कालीन पीएम इमरान खान ने कश्मीर का मुद्दा उठाया था। तुर्की ने मलेशिया और पाकिस्तान को साथ लेकर न्यू 'ओआईसी' बनाने की असफल कोशिश की थी। पहले तो तुर्की, कश्मीर के मुस्लिमों की नजर में हमदर्द बनना चाहता था, लेकिन अब पीएफआई जैसे संगठनों के साथ वह भारत में मुस्लिम संगठनों को समर्थन देने के लिए आगे बढ़ चुका है। इसके लिए वह मुस्लिमों को कई तरीके की मदद और जॉब दे रहा है।
पीएफआई को लेकर दिया था ये बड़ा बयान
हुबली, कर्नाटक (दिसंबर, 2021) में एक सम्मेलन के दौरान मौलाना मोहम्मद रहमानी से पूछा गया कि क्या पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) के सदस्य 'साहबों' (पैगंबर के साथी) के रास्ते पर काम कर रहे हैं। अबुल कलाम आजाद इस्लामिक अवेकनिंग सेंटर के अध्यक्ष और रहमानी मस्जिद जाकिर, नगर दिल्ली के इमाम मौलाना रहमानी ने टिप्पणी की थी कि पीएफआई एक राजनीतिक संगठन है। यह उन लोगों से जुड़ा है, जिनके पूर्वज 'साहबों' को बदनाम करते हैं और गाली देते हैं। मौलाना रहमानी ने पूरे अधिकार के साथ, कुरान और हदीस के आलोक में कहा, पीएफआई इस्लामी मान्यताओं/आस्था पर काम नहीं करता है। उनकी विश्वास प्रणाली में खतरनाक विसंगतियां शामिल रही हैं। वे ख्वारिज पद्धति के करीब थे। यही वजह रही है कि इस संगठन पर सांप्रदायिक घृणा और धार्मिक कट्टरवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगा था। कई राज्यों ने पीएफआई के भयावह डिजाइन बाबत चिंता जताई थी। कहा गया कि यह संगठन कानून और व्यवस्था के संबंध में नई चुनौतियां पेश कर रहा है। यदि पीएफआई की गैरकानूनी गतिविधियों को तुरंत नियंत्रित नहीं किया गया तो यह देश में सांप्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ कर रख देगा।
मुसलमानों के नेता बनने लायक नहीं हैं पीएफआई सदस्य
रिपोर्ट के अनुसार, पीएफआई के कदम को इस्लामिक नजरिए से देखने की जरूरत है। सबसे पहले, पीएफआई के नेता निश्चित रूप से मुसलमानों के नेता होने के योग्य नहीं हैं। पीएफआई एक राजनीतिक रूप से प्रेरित हिंसक संगठन था। इसकी पहुंच मुट्ठी भर लोगों तक थी। इस संगठन के नेता खुद को रोल मॉडल के रूप में पेश करने की बजाए विभिन्न घोटालों में शामिल थे। ओएमए सलाम, पीएफआई अध्यक्ष, केरल राज्य सेवा नियमों का उल्लंघन करने के लिए वर्तमान में निलंबित थे। युवा विंग के नेता, रऊफ शरीफ पर आबादी के एक वर्ग के बीच सांप्रदायिक भावनाओं को भड़काने के लिए मुकदमा चल रहा है। कुछ दूसरे नेता भी मनी लॉन्ड्रिंग से लेकर हत्या तक के कई मामलों में शामिल थे। पीएफआई नेता, मुसलमानों के नेतृत्व का दावा करने से मीलों दूर थे।
खाड़ी देशों में फंड जुटाने का सुव्यवस्थित तरीका
ईडी ने वर्ष 2020 और 2021 में पीएफआई नेताओं के कई कार्यालय परिसरों और आवासों पर संदिग्ध मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप में छापेमारी की थी। पीएफआई नेताओं को गिरफ्तार किया गया। जांच के दौरान पता चला कि पीएफआई ने खाड़ी देशों में फंड जुटाने के लिए एक बहुत ही सुव्यवस्थित ढांचा तैयार किया था। जमा किए गए फंड को हवाला के जरिए भारत भेजा गया था। पीएफआई विदेशों में मनी लॉन्ड्रिंग मोर्चों का संचालन कर रहा था। इसमें केरल में मुन्नार विला विस्टा परियोजना और अबू धाबी में दरबार रेस्तरां शामिल थे। मुन्नार विला विस्टा परियोजना में, लाखों बेहिसाब नकदी का संचार किया गया था। इस परियोजना के कुछ बेनामी शेयरधारक संयुक्त अरब अमीरात में भी थे। उन्होंने बाद में शेयरों को पीएफआई नेताओं को हस्तांतरित कर दिया। पीएफआई इस परियोजना में अपने अवैध रूप से जुटाए गए धन को जमा कर रहा था ताकि आवश्यकता पड़ने पर इसका उपयोग किया जा सके।
तुर्की चैरिटी और तुर्की की खुफिया एजेंसी का राज
पीएफआई, तुर्की स्थित फाउंडेशन फॉर ह्यूमन राइट्स एंड फ्रीडम एंड ह्यूमैनिटेरियन रिलीफ (आईएचएच), अल-कायदा से जुड़ी तुर्की चैरिटी और तुर्की की खुफिया एजेंसी से संबद्ध था। वह इनके साथ मिलकर पैन-इस्लामिक संबंधों को आगे बढ़ा रहा था। इसके शीर्ष नेताओं ने 2018 और 2019 में फिलिस्तीन से संबंधित कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए तुर्की का दौरा किया था। 2020 में, पीएफआई ने अपने कैडरों के लिए 'आधुनिक तुर्की की इस्लाम में वापसी' पर एक कार्यक्रम (ऑनलाइन) आयोजित किया था। इसमें पीएफआई ने तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन की तुर्की में सच्चा इस्लामी शासन लाने के लिए प्रशंसा की थी। इंडिया फ्रेटरनिटी फोरम (आईएफएफ) और इंडियन सोशल फोरम (आईएसएफ), पीएफआई के विदेशी मोर्चे थे। इनके जरिए धन एकत्रित किया जाता था। इन संगठनों की कार्यकारी समितियां, भारत में पीएफआई को बिना कोई निशान छोड़े पैसा भेजने के लिए जिम्मेदार थीं। धन आम तौर पर नकद में एकत्र करते थे और उसे हवाला चैनलों (गुप्त रूप से) के माध्यम से भारत में प्रेषित किया जाता था। इस धन को भारत स्थित रिश्तेदारों और पीएफआई के सदस्यों के दोस्तों और विदेशों में काम करने वालों के खातों में जमा किया जाता था। आईएफएफ, खाड़ी देशों में भारतीय मुस्लिम प्रवासियों से धन जुटाने के लिए सबसे महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में उभरा था।