पेगासस स्पाइवेयर: एमनेस्टी इंटरनेशनल का इससे क्या लेना-देना और उसने फोन टैपिंग की जांच क्यों की?
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विस्तार
एमनेस्टी इंटरनेशनल का दावा है कि वह मानवीय स्वतंत्रता और नागरिक समाज की मदद के लिए गंभीर खतरों का पता लगाने की कोशिश करता है और उनके जवाब ढूंढता है। इसी वजह से उसने पेगासस के स्पायवेयर का फॉरेंसिक विश्लेषण किया। एमनेस्टी इंटरनेशनल के मुताबिक, उसकी सिक्योरिटी लैब ने दुनिया भर के मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और पत्रकारों के कई मोबाइल उपकरणों का गहन फॉरेंसिक विश्लेषण किया है। इस शोध में यह पाया गया कि एनएसओ ग्रुप ने पेगासस स्पाइवेयर के जरिए मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और पत्रकारों की लगातार, व्यापक, लगातार और गैरकानूनी तरीके से निगरानी की है।
फॉरेंसिक कार्यप्रणाली रिपोर्ट: एनएसओ समूह के पेगासस को कैसे पकड़ा, रिपोर्ट जारी कर समझाया
एमनेस्टी इंटरनेशनल की सुरक्षा लैब ने 10 देशों के 17 मीडिया संगठनों के 80 से अधिक पत्रकारों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के समूह के फोन टैपिंग का फॉरेंसिक विश्लेषण किया है। जिसमें उसे आधे से अधिक मामलों में पेगासस स्पायवेयर के निशान मिले हैं।
एमनेस्टी इंटरनेशनल ने यह विश्लेषण कैसे किया है, इस कार्यप्रणाली को समझाने के लिए उसने मोबाइल फॉरेंसिक टूल और विस्तृत तकनीक संकेत की एक रिपोर्ट प्रकाशित की है। यह रिपोर्ट पेगासस स्पाइवेयर के साथ आईओएस और एंड्रॉइड डिवाइस पर छोड़े गए फॉरेंसिक निशान का दस्तावेज है।
2016 में मानवाधिकार कार्यकर्ता अहमद मंसूर का फोन टैप हुआ तो शक गहराया
इसमें वह फॉरेंसिक रिकॉर्ड भी शामिल हैं, जिसमें 2016 में पहली बार साल संयुक्त अरब अमीरात के मानवाधिकार कार्यकर्ता अहमद मंसूर का फोन टैप करने के लिए उन्हें निशाना बनाया गया था। जिसके बाद से एमनेस्टी इंटरनेशनल का शक पेगासस स्पाइवेयर पर गहराया और उसने अपने तरीके से इस पर जांच शुरू की।
इस रिपोर्ट में 2014 से जुलाई 2021 तक के पेगासस हमले की विस्तृत जानकारी दी गई है। इनमें तथाकथित "शून्य-क्लिक" के निशाने भी शामिल हैं, जिनमें उस व्यक्ति के पास किसी तरह का निशान नहीं छोड़ा जाता है जिसके फोन को टैप किया जाना है। एमनेस्टी इंटरनेशन का दावा है कि मई 2018 से जीरो-क्लिक शुरू हुए हैं, जो अब तक जारी हैं। इस रिपोर्ट के खंड 1 से 8 में पेगासस हमले के बाद मोबाइल उपकरणों पर छोड़े गए फॉरेंसिक निशानों को दिखाया है। यह सबूत कई देशों के मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और पत्रकारों के फोन से जुटाए गए हैं।
सुरक्षा कारणों से हटे गए कई लोगों के नाम
खंड 9 में रिपोर्ट में 2016 के बाद से पेगासस के नेटवर्क के बुनियादी ढांचे के विकास का दस्तावेजीकरण किया गया है। इसमें कहा गया है कि एनएसओ समूह ने डोमेन और सर्वर की कई परतों का प्रयोग करके अपने हमले के बुनियादी ढांचे को फिर से डिजाइन किया है। बार-बार परिचालन संबंधी सुरक्षा गलतियों के कारण ही एमनेस्टी इंटरनेशनल सिक्योरिटी लैब को इस बुनियादी ढांचे को लगातार देखने का मौका मिलता रहा। रिपोर्ट में सुरक्षा कारणों से कई लोगों के नाम हटा दिए गए हैं। जिन लोगों के नाम प्रकाशित नहीं किए गए हैं, उन्हें इस रिपोर्ट में एक अल्फान्यूमेरिक कोड नाम दिया गया है।
अपने कार्यकर्ता को निशाना बनाए जाने के बाद 2018 में पेगासस पर की जांच तेज
एमनेस्टी इंटरनेशल के विश्लेषण के मुताबिक, एनएसओ ग्रुप ने 2018 में एमनेस्टी के कर्मचारी और सऊदी कार्यकर्ता याह्या असिरी के फोन को टैप करने के लिए निशाना बनाया। इसके बाद एमनेस्टी इंटरनेशनल की लैब ने अपनी तकनीकी जांच तेज कर दी। 2019 में जब मोरक्को के एक मानवाधिकार कार्यकर्ता के फोन को टैप किया गया, तो इसी लैब ने अपनी फॉरेंसिक जांच के तरीकों में और सुधार करना शुरू कर दिया। जब लैब ने अपनी फॉरेंसिक जांच के तरीके में सुधार किया तो 2020 में मोरक्को के एक पत्रकार को भी निशाना बनाए जाने की पुष्टि हो गई।
क्या है एमनेस्टी इंटरनेशनल
एमनेस्टी इंटरनेशनल एक अंतरराष्ट्रीय संगठन है, जिसका दावा है कि वह मानवाधिकार, मानवीय मूल्यों की रक्षा और मानवीय स्वतंतत्रा के लिए काम करता है। इसका कहना है कि यह मानवाधिकारों पर गहन शोध करके उस पर जनमत तैयार करने की कोशिश करता है। इसकी स्थापना ब्रिटेन में 1961 में हुई थी। हालांकि, इस पर आरोप लगते रहे हैं कि यह सरकारों पर एक खास दबाव बनाने की कोशिश करता है। इस संगठन पर पश्चिमी देशों के प्रति पूर्वाग्रह रखने के भी आरोप लगते रहे हैं।
भारत में इसका क्यों रहा है विवादों से नाता
एमनेस्टी इंटरनेशनल (इंडिया) का विवादों से पुराना नाता रहा है। इस पर भारत सरकार का विरोध करने और अवैध तरीके से अंतरराष्ट्रीय फंडिंग करने का आरोप लगता रहा है। 2020 में उसने केंद्र सरकार पर बदले की भावना से काम करने का आरोप लगाकर अपना कामकाज रोक दिया था। संगठन का कहना था पिछले साल फरवरी में दिल्ली दंगों को लेकर पुलिस पर और जम्मू-कश्मीर में मानवाधिकार उल्लंघन पर केंद्र से सवाल पूछने पर उसके साथ बदले की भावना से व्यवहार किया गया। उसके बैंक अकाउंट्स को पूरी तरह फ्रीज कर दिया गया, जिससे उसे भारत में काम बंद करने के लिए मजबूर होना पड़ा।
सरकार का तर्क रहा है कि एमनेस्टी इंटरनेशनल विदेशों से पैसा लेकर वित्तीय अनियमितताओं कर रही है और इस आरोप की ईडी जांच कर रही है। गृह मंत्रालय के मुताबिक, संस्था को एफडीआई के जरिए फंड मिला, जिसकी गैर सरकारी संगठनों को इजाजत नहीं है। ईडी ने 25 अक्तूबर 2018 को बेंगलुरु स्थित दफ्तर पर छापेमारी की थी।