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संसद में आंबेडकर के नेहरू कैबिनेट से इस्तीफे की बात: क्या है असल कहानी, पहले चुनाव में कैसे मिली हार? जानें
Wed, 18 Dec 2024 08:24 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Wed, 18 Dec 2024 08:24 PM IST
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पंडित जवाहर लाल नेहरू और डॉ. आंबेडकर
- फोटो :
अमर उजाला/Wikimedia Commons
विस्तार
संविधान निर्माता बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर पर गृह मंत्री अमित शाह द्वारा कथित तौर पर की गई एक टिप्पणी को लेकर विपक्षी सदस्यों के हंगामे के चलते बुधवार को राज्यसभा की कार्यवाही पूरे दिन के लिए स्थगित कर दी गई। विपक्षी सदस्यों ने आरोप लगाया कि गृह मंत्री शाह ने संविधान निर्माता बाबा साहेब आंबेडकर का अपमान किया है और उन्हें इसके लिए माफी मांगनी चाहिए। हालांकि, भाजपा ने इस पर पलटवार करते हुए कहा कि गृह मंत्री ने उनके लिए श्रद्धा जाहिर की और सम्मान व्यक्त किया, जबकि कांग्रेस ने बाबा साहेब का अपमान किया। भाजपा ने आंबेडकर के नेहरू कैबिनेट से इस्तीफा देने से लेकर उनके 1952 के चुनाव में साजिशन हरवाए जाने का मुद्दा उठाया।
आंबेडकर को लेकर क्यों बहस छिड़ी?
दरअसल, राज्यसभा में मंगलवार को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की तरफ से की गई एक टिप्पणी पर बुधवार को कांग्रेस ने जबरदस्त हंगामा किया। अमित शाह ने कहा था कि अब आंबेडकर, आंबेडकर, आंबेडकर कहने का फैशन हो गया है। अगर उन्होंने इतनी बार भगवान का नाम लिया होता तो उन्हें स्वर्ग में जगह मिलती। शाह ने यह भी कहा था कि बाबासाहेब ने नेहरू कैबिनेट से इसलिए इस्तीफा दिया, क्योंकि उन्हें नजरअंदाज किया जा रहा था और वह इससे असंतुष्ट थे।
कांग्रेस ने आरोप लगाया कि शाह ने आंबेडकर का अपमान किया है। इस पर राज्यसभा में भाजपा के नेता किरेन रिजिजू ने कहा ‘‘जब तक आंबेडकर जीवित थे तब उन्हें 1952 में साजिश के तहत कांग्रेस ने चुनाव में हराया। उपचुनाव में भी कांग्रेस ने उन्हें पुन: हराया। अगर बाबा साहेब को कांग्रेस नहीं हराती तो वह 1952 के बाद भी चुनाव जीत कर सदन के सदस्य बने होते।’’ रिजिजू ने कहा कि उनके परिनिर्वाण के बाद भी कांग्रेस ने उन्हें अपमानित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्हें भारत रत्न नहीं दिया। उन्हें अपमानित कर कांग्रेस ने देश के साथ खिलवाड़ किया।’’
इस पूरे विवाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कांग्रेस पर हमला बोला। पीएम ने कहा कि डॉ. आंबेडकर के प्रति कांग्रेस के पापों की सूची में शामिल हैं- उन्हें एक बार नहीं, बल्कि दो बार चुनावों में हराना। पंडित नेहरू ने उनके खिलाफ प्रचार किया और उनकी हार को प्रतिष्ठा का मुद्दा बनाया। उन्हें भारत रत्न देने से इनकार करना। संसद के सेंट्रल हॉल में उनकी तस्वीर को गौरवपूर्ण स्थान न देना।
दरअसल, राज्यसभा में मंगलवार को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की तरफ से की गई एक टिप्पणी पर बुधवार को कांग्रेस ने जबरदस्त हंगामा किया। अमित शाह ने कहा था कि अब आंबेडकर, आंबेडकर, आंबेडकर कहने का फैशन हो गया है। अगर उन्होंने इतनी बार भगवान का नाम लिया होता तो उन्हें स्वर्ग में जगह मिलती। शाह ने यह भी कहा था कि बाबासाहेब ने नेहरू कैबिनेट से इसलिए इस्तीफा दिया, क्योंकि उन्हें नजरअंदाज किया जा रहा था और वह इससे असंतुष्ट थे।
कांग्रेस ने आरोप लगाया कि शाह ने आंबेडकर का अपमान किया है। इस पर राज्यसभा में भाजपा के नेता किरेन रिजिजू ने कहा ‘‘जब तक आंबेडकर जीवित थे तब उन्हें 1952 में साजिश के तहत कांग्रेस ने चुनाव में हराया। उपचुनाव में भी कांग्रेस ने उन्हें पुन: हराया। अगर बाबा साहेब को कांग्रेस नहीं हराती तो वह 1952 के बाद भी चुनाव जीत कर सदन के सदस्य बने होते।’’ रिजिजू ने कहा कि उनके परिनिर्वाण के बाद भी कांग्रेस ने उन्हें अपमानित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्हें भारत रत्न नहीं दिया। उन्हें अपमानित कर कांग्रेस ने देश के साथ खिलवाड़ किया।’’
इस पूरे विवाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कांग्रेस पर हमला बोला। पीएम ने कहा कि डॉ. आंबेडकर के प्रति कांग्रेस के पापों की सूची में शामिल हैं- उन्हें एक बार नहीं, बल्कि दो बार चुनावों में हराना। पंडित नेहरू ने उनके खिलाफ प्रचार किया और उनकी हार को प्रतिष्ठा का मुद्दा बनाया। उन्हें भारत रत्न देने से इनकार करना। संसद के सेंट्रल हॉल में उनकी तस्वीर को गौरवपूर्ण स्थान न देना।
पीएम ने एक्स पर पोस्ट में कहा, 'अगर कांग्रेस और उसका बेकार हो चुका तंत्र यह सोचता है कि उनके दुर्भावनापूर्ण झूठ उनके कई सालों के कुकर्मों खासकर डॉ. आंबेडकर के प्रति उनके अपमान को छिपा सकते हैं, तो वे बहुत बड़ी गलतफहमी में हैं। भारत के लोगों ने बार-बार देखा है कि कैसे एक वंश के नेतृत्व वाली एक पार्टी ने डॉ. आंबेडकर की विरासत को मिटाने और एससी-एसटी समुदायों को अपमानित करने के लिए हर संभव गंदी चाल चली है।'
लोकसभा और राज्यसभा में बीते दिनों बाबासाहेब आंबेडकर को लेकर हुई चर्चा के बाद कई सवाल उठे हैं। खासकर भाजपा की तरफ से कांग्रेस पर लगाए गए आरोपों के बाद आंबेडकर के नेहरू कैबिनेट छोड़ने, उनके 1952 में लोकसभा चुनाव लड़ने और इसमें हारने से जुड़ी कहानी क्या है? बाबासाहेब को कांग्रेस सरकार में भारत रत्न न दिए जाने की सच्चाई क्या है? इसे लेकर कौतूहल बढ़ गया है। आइये सभी सवालों के जवाब जानते हैं...
लोकसभा और राज्यसभा में बीते दिनों बाबासाहेब आंबेडकर को लेकर हुई चर्चा के बाद कई सवाल उठे हैं। खासकर भाजपा की तरफ से कांग्रेस पर लगाए गए आरोपों के बाद आंबेडकर के नेहरू कैबिनेट छोड़ने, उनके 1952 में लोकसभा चुनाव लड़ने और इसमें हारने से जुड़ी कहानी क्या है? बाबासाहेब को कांग्रेस सरकार में भारत रत्न न दिए जाने की सच्चाई क्या है? इसे लेकर कौतूहल बढ़ गया है। आइये सभी सवालों के जवाब जानते हैं...
बाबासाहेब ने क्यों छोड़ा था प्रधानमंत्री नेहरू का कैबिनेट?
भारत में जब पहली सरकार का गठन हुआ तब प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने बाबासाहेब आंबेडकर को कानून मंत्री का पद दिया। हालांकि, एक विवाद के चलते आंबेडकर ने 27 सितंबर 1951 को नेहरू कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया था। दरअसल, जिस वजह से उन्होंने प्रधानमंत्री नेहरू के कैबिनेट से इस्तीफा दिया, उसकी शुरुआत होती है 11 अप्रैल 1947 को जब आंबेडकर संविधान बनाने वाली संविधान सभा में देश के लिए कानून के मूल ढांचे का निर्माण कर रहे थे। उस दौरान उन्होंने हिंदू कोड बिल प्रस्ताव इस सभा के सामने रखा। इसके तहत हिंदू परिवारों से जुड़े कुछ नियम-कायदे बनाए जाने थे। इसके तहत संविधान सभा में परिवार के प्रधान पुरुष की मौत हो जाने पर उनकी विधवाओं को संपत्ति का अधिकार, उनके बेटे-बेटियों को समान अधिकार की मांग की गई थी। इसके अलावा हिंदू पुरुषों की एक से ज्यादा शादी को अवैध बनाने और महिलाओं को तलाक का अधिकार देने के भी नियम बनाने को कहा गया।
1951 में जब पहली बार इससे जुड़ा विधेयक सामने आया तब विपक्ष ने इसका जबरदस्त विरोध किया। यहां तक कि भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने भी इस विधेयक को टालने की बात कही। हालांकि, पंडित नेहरू ने कैबिनेट की मंजूरी मिलने के चलते इसे टालने में अक्षमता जता दी। इसके बाद नेहरू कैबिनेट ने हिंदू कोड बिल को फरवरी 1951 को पेश करने की तैयारी की। हालांकि, इसे अगले सत्र के लिए टालने का फैसला हुआ और सितंबर के पहले हफ्ते में पेश करने पर बात बनी। बताया जाता है कि बाबासाहेब ने खराब तबीयत और इलाज का हवाला देते हुए इसे अगस्त के मध्य में पेश करने की मांग उठाई, लेकिन ऐसा नहीं हो सका।
भारत में जब पहली सरकार का गठन हुआ तब प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने बाबासाहेब आंबेडकर को कानून मंत्री का पद दिया। हालांकि, एक विवाद के चलते आंबेडकर ने 27 सितंबर 1951 को नेहरू कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया था। दरअसल, जिस वजह से उन्होंने प्रधानमंत्री नेहरू के कैबिनेट से इस्तीफा दिया, उसकी शुरुआत होती है 11 अप्रैल 1947 को जब आंबेडकर संविधान बनाने वाली संविधान सभा में देश के लिए कानून के मूल ढांचे का निर्माण कर रहे थे। उस दौरान उन्होंने हिंदू कोड बिल प्रस्ताव इस सभा के सामने रखा। इसके तहत हिंदू परिवारों से जुड़े कुछ नियम-कायदे बनाए जाने थे। इसके तहत संविधान सभा में परिवार के प्रधान पुरुष की मौत हो जाने पर उनकी विधवाओं को संपत्ति का अधिकार, उनके बेटे-बेटियों को समान अधिकार की मांग की गई थी। इसके अलावा हिंदू पुरुषों की एक से ज्यादा शादी को अवैध बनाने और महिलाओं को तलाक का अधिकार देने के भी नियम बनाने को कहा गया।
1951 में जब पहली बार इससे जुड़ा विधेयक सामने आया तब विपक्ष ने इसका जबरदस्त विरोध किया। यहां तक कि भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने भी इस विधेयक को टालने की बात कही। हालांकि, पंडित नेहरू ने कैबिनेट की मंजूरी मिलने के चलते इसे टालने में अक्षमता जता दी। इसके बाद नेहरू कैबिनेट ने हिंदू कोड बिल को फरवरी 1951 को पेश करने की तैयारी की। हालांकि, इसे अगले सत्र के लिए टालने का फैसला हुआ और सितंबर के पहले हफ्ते में पेश करने पर बात बनी। बताया जाता है कि बाबासाहेब ने खराब तबीयत और इलाज का हवाला देते हुए इसे अगस्त के मध्य में पेश करने की मांग उठाई, लेकिन ऐसा नहीं हो सका।
इस बीच विधेयक के विरोध में जनसंघ के नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने संसद के बाहर और अंदर सरकार के इस फैसले को गलत करार दिया। उनके अलावा एक बड़े संत हरिहरानंद सरस्वती, जिन्हें करपात्री महाराज के नाम से भी जाना जाता है, की अगुवाई में संसद के बाहर भी इस बिल को लेकर बड़ा विरोध शुरू हो गया। संसद सदस्य रामनारायण सिंह ने भी इस विधेयक पर डॉ. आंबेडकर का विरोध किया।
बता दें कि 1951 के अंत में ही देश में लोकसभा के चुनाव भी प्रस्तावित थे। ऐसे में विपक्ष के जबरदस्त विरोध के चलते इस विधेयक का पारित होना अटका रहा। बताया जाता है कि खुद राष्ट्रपति डॉ. प्रसाद ने इस मुद्दे पर नेहरू को चिट्ठी लिखकर कहा था कि चूंकि यह सरकार चुनी हुई नहीं है और इसे जनता का समर्थन अब तक नहीं मिला है, इसलिए उन्हें इस विधेयक के पारित हो जाने के बावजूद उन्हें इसे वीटो कर रोकना पड़ेगा।
कहा जाता है कि संसद में विधेयक के जबरदस्त विरोध और चुनाव को देखते हुए पंडित नेहरू ने हिंदू कोड बिल को पारित करवाने की कोशिशों पर विराम लगा दिया। इतना ही नहीं, इसी विधेयक के एक अन्य हिस्से को जब अलग से पारित करवाने की कोशिश की गई तो उसमें भी सरकार को असफलता का सामना करना पड़ा। इस बात से नाराज आंबेडकर ने आखिरकार 27 सितंबर 1951 को पंडित नेहरू की कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया। बाबासाहेब ने तब कहा था, "विधेयक की हत्या की गई और इसे दफना दिया गया।" उन्होंने इस्तीफा देते हुए एक पत्र भी लिखा जिसमें उन्होंने अपने इस्तीफे की वजहें बताई थीं।
कांग्रेस की वेबसाइट के मुताबिक, आंबेडकर के नेहरू कैबिनेट से इस्तीफे की वजह सिर्फ हिंदू कोड बिल ही नहीं था। बल्कि कश्मीर और विदेश नीति पर भी वह पंडित नेहरू की नीतियों से खुश नहीं थे। इसके अलावा पिछड़ी जातियों से होने वाले दुर्व्यवहार पर वह नाराजगी जाहिर करते रहे थे और इन्हीं कारणों के चलते उन्होंने कैबिनेट छोड़ने का फैसला किया।
बता दें कि 1951 के अंत में ही देश में लोकसभा के चुनाव भी प्रस्तावित थे। ऐसे में विपक्ष के जबरदस्त विरोध के चलते इस विधेयक का पारित होना अटका रहा। बताया जाता है कि खुद राष्ट्रपति डॉ. प्रसाद ने इस मुद्दे पर नेहरू को चिट्ठी लिखकर कहा था कि चूंकि यह सरकार चुनी हुई नहीं है और इसे जनता का समर्थन अब तक नहीं मिला है, इसलिए उन्हें इस विधेयक के पारित हो जाने के बावजूद उन्हें इसे वीटो कर रोकना पड़ेगा।
कहा जाता है कि संसद में विधेयक के जबरदस्त विरोध और चुनाव को देखते हुए पंडित नेहरू ने हिंदू कोड बिल को पारित करवाने की कोशिशों पर विराम लगा दिया। इतना ही नहीं, इसी विधेयक के एक अन्य हिस्से को जब अलग से पारित करवाने की कोशिश की गई तो उसमें भी सरकार को असफलता का सामना करना पड़ा। इस बात से नाराज आंबेडकर ने आखिरकार 27 सितंबर 1951 को पंडित नेहरू की कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया। बाबासाहेब ने तब कहा था, "विधेयक की हत्या की गई और इसे दफना दिया गया।" उन्होंने इस्तीफा देते हुए एक पत्र भी लिखा जिसमें उन्होंने अपने इस्तीफे की वजहें बताई थीं।
कांग्रेस की वेबसाइट के मुताबिक, आंबेडकर के नेहरू कैबिनेट से इस्तीफे की वजह सिर्फ हिंदू कोड बिल ही नहीं था। बल्कि कश्मीर और विदेश नीति पर भी वह पंडित नेहरू की नीतियों से खुश नहीं थे। इसके अलावा पिछड़ी जातियों से होने वाले दुर्व्यवहार पर वह नाराजगी जाहिर करते रहे थे और इन्हीं कारणों के चलते उन्होंने कैबिनेट छोड़ने का फैसला किया।
बाबासाहेब के चुनाव हारने की कहानी क्या?
बाबासाहेब आंबेडकर पीएम नेहरू के कैबिनेट से इस्तीफा देने के बाद अनुसूचित जातियों-जनजातियों के साथ होने वाले भेदभावों को खत्म करने के काम में जुट गए। इसी के मद्देनजर उन्होंने शेड्यूल कास्ट्स फेडरेशन को खड़ा करने की कोशिशें शुरू कर दीं। इसी बीच भारत के पहले चुनाव का समय भी आ गया। बाबासाहेब ने अपनी पार्टी खड़ी की और 35 उम्मीदवार उतारे। हालांकि, इनमें जीत सिर्फ दो को ही मिली। खुद डॉक्टर आंबेडकर को उत्तरी बॉम्बे की सीट से कांग्रेस प्रत्याशी से हार का सामना करना पड़ा। कांग्रेस ने आंबेडकर को हराने के लिए इस सीट से एनएस काजोलकर को टिकट दिया था। काजोलकर, आंबेडकर के पूर्व सहयोगी रहे थे। चुनाव में आंबेडकर को 1,23,576 वोट मिले और काजरोल्कर को 1,37,950 वोट मिले।
इतिहासकार रामचंद्र गुहा की किताब भारत गांधी के बाद में बाबासाहेब आंबेडकर के चुनावी सफरनामे का ब्योरा विस्तार से दिया गया है। इसमें कहा गया है कि 1952 के चुनाव में सबसे अहम हारों में से एक बाबासाहेब आंबेडकर की हार रही थी। बॉम्बे (अब मुंबई) में उनके निर्वाचन क्षेत्र में उन्हें एक दूध का कारोबार करने वाले नेता काजरोलकर के हाथों मिली थी। किताब में कहा गया है कि आंबेडकर की हार की वजह कांग्रेस ही रही थी। यहां कांग्रेस की पकड़ और प्रतिष्ठा कांग्रेस के पक्ष में रही। वहीं, नेहरू के बॉम्बे में दिए गए कई भाषणों ने भी काजरोलकर के पक्ष में हवा बनाने का काम किया और नतीजतन बाबासाहेब आंबेडकर चुनाव हार गए।
कहा जाता है कि इस सीट से चुनाव हारने का आंबेडकर को गहरा दुख हुआ क्योंकि महाराष्ट्र उनकी कर्मभूमि थी। बाद में कांग्रेस ने कहा कि आंबेडकर सोशल पार्टी का साथ दे रहे थे इसलिए उनका विरोध करने के अलावा पार्टी के पास कोई दूसरा चारा नहीं था। बाद यहीं खत्म नहीं हुई बल्कि कांग्रेस ने 1954 में बंडारा लोकसभा के लिए हुए उपचुनाव में भी आबंडेकर को एक बार फिर हराया।
बाबासाहेब आंबेडकर पीएम नेहरू के कैबिनेट से इस्तीफा देने के बाद अनुसूचित जातियों-जनजातियों के साथ होने वाले भेदभावों को खत्म करने के काम में जुट गए। इसी के मद्देनजर उन्होंने शेड्यूल कास्ट्स फेडरेशन को खड़ा करने की कोशिशें शुरू कर दीं। इसी बीच भारत के पहले चुनाव का समय भी आ गया। बाबासाहेब ने अपनी पार्टी खड़ी की और 35 उम्मीदवार उतारे। हालांकि, इनमें जीत सिर्फ दो को ही मिली। खुद डॉक्टर आंबेडकर को उत्तरी बॉम्बे की सीट से कांग्रेस प्रत्याशी से हार का सामना करना पड़ा। कांग्रेस ने आंबेडकर को हराने के लिए इस सीट से एनएस काजोलकर को टिकट दिया था। काजोलकर, आंबेडकर के पूर्व सहयोगी रहे थे। चुनाव में आंबेडकर को 1,23,576 वोट मिले और काजरोल्कर को 1,37,950 वोट मिले।
इतिहासकार रामचंद्र गुहा की किताब भारत गांधी के बाद में बाबासाहेब आंबेडकर के चुनावी सफरनामे का ब्योरा विस्तार से दिया गया है। इसमें कहा गया है कि 1952 के चुनाव में सबसे अहम हारों में से एक बाबासाहेब आंबेडकर की हार रही थी। बॉम्बे (अब मुंबई) में उनके निर्वाचन क्षेत्र में उन्हें एक दूध का कारोबार करने वाले नेता काजरोलकर के हाथों मिली थी। किताब में कहा गया है कि आंबेडकर की हार की वजह कांग्रेस ही रही थी। यहां कांग्रेस की पकड़ और प्रतिष्ठा कांग्रेस के पक्ष में रही। वहीं, नेहरू के बॉम्बे में दिए गए कई भाषणों ने भी काजरोलकर के पक्ष में हवा बनाने का काम किया और नतीजतन बाबासाहेब आंबेडकर चुनाव हार गए।
कहा जाता है कि इस सीट से चुनाव हारने का आंबेडकर को गहरा दुख हुआ क्योंकि महाराष्ट्र उनकी कर्मभूमि थी। बाद में कांग्रेस ने कहा कि आंबेडकर सोशल पार्टी का साथ दे रहे थे इसलिए उनका विरोध करने के अलावा पार्टी के पास कोई दूसरा चारा नहीं था। बाद यहीं खत्म नहीं हुई बल्कि कांग्रेस ने 1954 में बंडारा लोकसभा के लिए हुए उपचुनाव में भी आबंडेकर को एक बार फिर हराया।