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पूर्व कश्मीरी आतंकवादियों की पाकिस्तानी पत्नियां मांग रही हैं भारतीय नागरिकता

Sat, 04 May 2019 10:26 PM IST
अमर शर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, श्रीनगर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, श्रीनगर Published by: अमर शर्मा Updated Sat, 04 May 2019 10:26 PM IST
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Pakistani wives of former Kashmiri terrorists are demanding Indian citizenship
पूर्व कश्मीरी आतंकवादियों की पत्नियां

आत्मसमर्पण कर चुके आतंकवादियों के पुनर्वास योजना के तहत नियंत्रण रेखा के पार से लौटे पूर्व कश्मीरी आतंकवादियों की पाकिस्तानी पत्नियों ने शनिवार को केंद्र और जम्मू-कश्मीर सरकार से अपील की है कि या तो उन्हें भारतीय नागरिकता प्रदान की जाए या उन्हें निर्वासित कर दिया जाए।

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महिलाओं ने अपनी दुर्दशा को खत्म करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के साथ-साथ जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक से हस्तक्षेप करने की मांग की है।
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प्रदर्शनकारियों में से एक जेबा ने यहां संवाददाताओं से कहा, "राज्य की नागरिकता हासिल करना हमारा अधिकार है। हमें यहां की नागरिकता मिलनी चाहिए, जैसा कि किसी भी देश में पुरुषों से शादी करने वाली महिलाओं के मामले में होता है। हम भारत सरकार और राज्य सरकार से अपील करते हैं कि या तो हमें नागरिकता प्रदान करें या हमें निर्वासित करें।" 
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ये महिलाएं अपने पतियों के साथ पिछले एक दशक के दौरान कश्मीर पहुंचीं। उनका आरोप है कि राज्य सरकार उन्हें पाकिस्तान और पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) में उनके परिवारों से मिलने के लिए यात्रा दस्तावेज देने से वंचित कर रही थी। 

एक अन्य प्रदर्शनकारी महिला साफिया ने कहा, "हमारा एक मानवीय मुद्दा है। हमें कई चीजों का वादा किया गया था, लेकिन कुछ भी पूरा नहीं हुआ। हमारी यहां कोई पहचान नहीं है। हम में से कई लोग अवसाद के शिकार हो गए हैं। हमारे लिए कारवां-ए-अमन (श्रीनगर-मुजफ्फराबाद) बस सेवा जैसी पहल होनी चाहिए ताकि हम अपने परिवारों से मिल सकें।" 

पीओके में श्रीनगर और मुजफ्फराबाद के बीच कारवां-ए-अमन बस सेवा चलती है। भारत और पाकिस्तान के बीच विश्वास बहाली के उपाय के रूप में बस सेवा को 2005 में पाक्षिक आधार पर शुरू किया गया था।

व्यथित महिलाओं ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान और मानवाधिकार संगठनों से भी अपील की कि वे उनकी पीड़ा पर ध्यान दें। 

पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने 2010 में पूर्व कश्मीरी आतंकवादियों के लिए एक पुनर्वास नीति की घोषणा की थी, जो 1989 से 2009 तक पाकिस्तान में चले गए थे।


नियंत्रण रेखा (एलओसी) पार कर हथियारों का प्रशिक्षण लेने गए सैकड़ों कश्मीरी अपने परिवार के साथ 2016 तक नेपाल की सीमा के रास्ते वापस लौट आए। हालांकि बाद में केंद्र ने इस नीति को बंद कर दिया था।

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