{"_id":"63c4ed52a743115a0d63fca2","slug":"padma-vibhushan-pandit-chhannulal-mishra-said-i-am-a-disciple-of-such-a-family-whose-creator-is-lord-shiva-2023-01-16","type":"story","status":"publish","title_hn":"बेबाक: संगीत घराने तो लगभग 200 साल पहले ही प्रचार में आए हैं, जबकि संगीत तो अनंत काल से है","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
बेबाक: संगीत घराने तो लगभग 200 साल पहले ही प्रचार में आए हैं, जबकि संगीत तो अनंत काल से है
Mon, 16 Jan 2023 11:53 AM IST
Jeet Kumar
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Jeet Kumar
Updated Mon, 16 Jan 2023 11:53 AM IST
सार
पद्मविभूषण पं. छन्नूलाल मिश्र कहते हैं- वास्तव में संगीत घराने तो लगभग दो सौ साल पहले ही प्रचार में आए हैं, जबकि संगीत तो अनंत काल से है। ख्याल भी अति प्राचीन है तो इसे घरानों के माध्यम से कैसे परिभाषित किया जा सकता है? कई बार तो घराने की आड़ में कलाकार अपनी कमियों को भी छिपा जाते हैं।
विज्ञापन
वाराणसी, पंडित छन्नूलाल मिश्र
- फोटो : self
विस्तार
गीत की चर्चा होने पर घरानों के नाम खुद-ब-खुद आ जाते हैं। मेरा मानना है कि मैं ऐसे घराने का शिष्य हूं, जिसके रचयिता भगवान शिव हैं। जब नाद की उत्पत्ति ही शिव के स्वरूप ऊं से मानी गई है तो क्यों ना संगीत का सिर्फ एक ही घराना माना जाए। शिव का घराना। आज भी यदि कोई कलाकार ये कहे कि मैं घरानेदार शास्त्रीय कलाकार हूं तो लोग यही प्रश्न सबसे पहले पूछते हैं कि किस घराने से संबंध रखते हैं ? या किस घराने से शिक्षा प्राप्त की है, आगरा, किराना, ग्वालियर, दिल्ली, जयपुर, पटियाला या कोई और?
वास्तव में ये घराने तो लगभग दो सौ साल पहले ही प्रचार में आए हैं, जबकि संगीत तो अनंत काल से है। ख्याल भी अति प्राचीन है तो इसे घरानों के माध्यम से कैसे परिभाषित किया जा सकता है? कई बार तो घराने की आड़ में कलाकार अपनी कमियों को भी छिपा जाते हैं। कमी होना गलत नहीं है, लेकिन उसे किसी घराने का नाम आगे करके अपने गुरु एवं पूर्वज कलाकारों पर दोषारोपण करना गलत है। एक बार मैं अपने गुरु के पास बैठा था। अनायास ही पूछा कि उस्ताद जी यह घराना क्या होता है?
इस पर उस्ताद जी विचार करने लगे। फिर उन्होंने जो टोपी पहन रखी थी उसे दाहिनी ओर झुका दिया और पूछा ये क्या है? मैंने कहा कि आपकी टोपी है दाहिनी तरफ झुकी है। उस्ताद ने टोपी बाईं तरफ झुका दी और फिर पूछा कि अब ये क्या हुआ? मैंने कहा कि कुछ नहीं बस आपकी टोपी अब बाईं ओर झुक गई है। उसके बाद टोपी खिसकाकर अपने माथे की तरफ झुका लिया और फिर मुझसे पूछा कि अब क्या बदलाव हुआ? मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। फिर भी मैंने कहा कि कुछ नहीं हुआ बस आपकी टोपी अब सामने की ओर झुकी हुई है। तब मुझे समझाते हुए कहा कि देखो, न तो मेरा सिर बदला न ही मेरी टोपी बदली सिर्फ पहनने का तरीका बदल गया। यही बात घरानों के साथ भी है। न स्वर बदलते हैं न लय और ताल, न ही राग। संगीत का सिर्फ एक घराना होना चाहिए शास्त्रीय घराना। इससे घरानों का मतभेद भी खत्म हो जाएगा और कलाकारों में शास्त्रों का अध्ययन करने की जिज्ञासा भी बढ़ेगी।
विज्ञापन
एक ही घराना स्वर लगाने का है, जिसे शास्त्रीय घराना कहना उचित होगा क्योंकि शास्त्रों से या शास्त्रीय घराने से ही सात स्वर और लय, शब्द और राग निकले हैं। शास्त्रों में वर्णित इन स्वरों के अतिरिक्त किसी घराने का कोई अलग स्वर नहीं है, केवल उन्हें लगाने का तरीका अलग हो जाता है। सभी घराने शास्त्रीय घराने के तहत ही आते हैं,
मगर लोग अलग-अलग ढंग से स्वर लगाकर और शब्दों में परिवर्तन करके अपना घराना बना लेते हैं। वास्तव में शास्त्रीय घराना ही सर्वमान्य होना चाहिए। क्योंकि स्वर, लय, शब्द की उत्पत्ति भगवान शिव के डमरू से हुई है। इसलिए इसे शिव का घराना कहना भी उचित होगा।
विज्ञापन
वास्तव में ये घराने तो लगभग दो सौ साल पहले ही प्रचार में आए हैं, जबकि संगीत तो अनंत काल से है। ख्याल भी अति प्राचीन है तो इसे घरानों के माध्यम से कैसे परिभाषित किया जा सकता है? कई बार तो घराने की आड़ में कलाकार अपनी कमियों को भी छिपा जाते हैं। कमी होना गलत नहीं है, लेकिन उसे किसी घराने का नाम आगे करके अपने गुरु एवं पूर्वज कलाकारों पर दोषारोपण करना गलत है। एक बार मैं अपने गुरु के पास बैठा था। अनायास ही पूछा कि उस्ताद जी यह घराना क्या होता है?
विज्ञापन
इस पर उस्ताद जी विचार करने लगे। फिर उन्होंने जो टोपी पहन रखी थी उसे दाहिनी ओर झुका दिया और पूछा ये क्या है? मैंने कहा कि आपकी टोपी है दाहिनी तरफ झुकी है। उस्ताद ने टोपी बाईं तरफ झुका दी और फिर पूछा कि अब ये क्या हुआ? मैंने कहा कि कुछ नहीं बस आपकी टोपी अब बाईं ओर झुक गई है। उसके बाद टोपी खिसकाकर अपने माथे की तरफ झुका लिया और फिर मुझसे पूछा कि अब क्या बदलाव हुआ? मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। फिर भी मैंने कहा कि कुछ नहीं हुआ बस आपकी टोपी अब सामने की ओर झुकी हुई है। तब मुझे समझाते हुए कहा कि देखो, न तो मेरा सिर बदला न ही मेरी टोपी बदली सिर्फ पहनने का तरीका बदल गया। यही बात घरानों के साथ भी है। न स्वर बदलते हैं न लय और ताल, न ही राग। संगीत का सिर्फ एक घराना होना चाहिए शास्त्रीय घराना। इससे घरानों का मतभेद भी खत्म हो जाएगा और कलाकारों में शास्त्रों का अध्ययन करने की जिज्ञासा भी बढ़ेगी।
विज्ञापन
एक ही घराना स्वर लगाने का है, जिसे शास्त्रीय घराना कहना उचित होगा क्योंकि शास्त्रों से या शास्त्रीय घराने से ही सात स्वर और लय, शब्द और राग निकले हैं। शास्त्रों में वर्णित इन स्वरों के अतिरिक्त किसी घराने का कोई अलग स्वर नहीं है, केवल उन्हें लगाने का तरीका अलग हो जाता है। सभी घराने शास्त्रीय घराने के तहत ही आते हैं,
मगर लोग अलग-अलग ढंग से स्वर लगाकर और शब्दों में परिवर्तन करके अपना घराना बना लेते हैं। वास्तव में शास्त्रीय घराना ही सर्वमान्य होना चाहिए। क्योंकि स्वर, लय, शब्द की उत्पत्ति भगवान शिव के डमरू से हुई है। इसलिए इसे शिव का घराना कहना भी उचित होगा।