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किसानों की मौत का आंकड़ा छिपा रही केंद्र सरकार- पी साईनाथ
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Tue, 27 Nov 2018 10:11 PM IST
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p sainath
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देश में किसानों की आत्महत्या के आंकड़े किसी भी सरकार के लिए परेशानी का सबब बनते रहे हैं। वर्तमान सरकार की शुरुआत में भी इसी तरह के आंकड़े आये थे जिनके सरकार पर सवाल उठने लगे थे। संभवत: यही कारण है कि सरकार के द्वारा किसानों की आत्महत्या से जुड़े आंकड़ों को छिपाने की कोशिश की जा रही है। यह आरोप लगाया है वरिष्ठ पत्रकार और एक्टिविस्ट पी साईनाथ का।
साईनाथ ने कहा कि 1995 से एनसीआरबी किसानों की मौत और आत्महत्याओं का आंकड़ा रखता आ रहा है। लेकिन सरकार की नीतियों के कारण जब इसमें कमी आने की बजाय यह संख्या बढ़ने लगी तो सरकार ने आंकड़े छिपाने का खेल शुरू कर दिया। पहले तो सरकार ने कुछ नीतिगत परिवर्तन कर किसानों की मौत की संख्या कम करके दिखाने की कोशिश की, लेकिन जब इससे भी काम नहीं चला तो उसने एनसीआरबी को ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट के साथ जोड़ दिया। इसके बाद जब भारी नुकसान होने लगा, सरकार ने इसे वापस अलग कर दिया। लेकिन इसके बाद भी 2016 और 2017 में किसानों की मौत का आंकड़ा जारी नहीं किया गया। साईनाथ के मुताबिक यह आंकड़ा बाद में लीपापोती के साथ प्रकाशित भी होगा तो इससे व्यापक असर नहीं होगा। इसीलिए इसे छिपाया जा रहा है।
यूपीए सरकार के लिए भी बना था परेशानी का सबब
कर्ज़ में डूबे किसानों के द्वारा आत्महत्या करने की घटनाओं के कारण पूर्ववर्ती यूपीए सरकार को भी भारी नुकसान पहुंचा था। उसकी नीतियों पर मीडिया में भारी आलोचना हुई थी। मनमोहन सिंह सरकार में मंत्री रहे शरद पवार के बयानों पर भी काफी विवाद हुआ था। उसी प्रकार मौजूदा सरकार में कृषि मंत्री राधामोहन सिंह के उस बयान की भी कड़ी आलोचना हुई थी जिसमें उन्होंने कहा था कि किसान खेती की समस्याओं के कारण नहीं, बल्कि अन्य घरेलू कारणों की वजह से ज्यादा आत्महत्या करते हैं।
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साईनाथ ने कहा कि 1995 से एनसीआरबी किसानों की मौत और आत्महत्याओं का आंकड़ा रखता आ रहा है। लेकिन सरकार की नीतियों के कारण जब इसमें कमी आने की बजाय यह संख्या बढ़ने लगी तो सरकार ने आंकड़े छिपाने का खेल शुरू कर दिया। पहले तो सरकार ने कुछ नीतिगत परिवर्तन कर किसानों की मौत की संख्या कम करके दिखाने की कोशिश की, लेकिन जब इससे भी काम नहीं चला तो उसने एनसीआरबी को ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट के साथ जोड़ दिया। इसके बाद जब भारी नुकसान होने लगा, सरकार ने इसे वापस अलग कर दिया। लेकिन इसके बाद भी 2016 और 2017 में किसानों की मौत का आंकड़ा जारी नहीं किया गया। साईनाथ के मुताबिक यह आंकड़ा बाद में लीपापोती के साथ प्रकाशित भी होगा तो इससे व्यापक असर नहीं होगा। इसीलिए इसे छिपाया जा रहा है।
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यूपीए सरकार के लिए भी बना था परेशानी का सबब
कर्ज़ में डूबे किसानों के द्वारा आत्महत्या करने की घटनाओं के कारण पूर्ववर्ती यूपीए सरकार को भी भारी नुकसान पहुंचा था। उसकी नीतियों पर मीडिया में भारी आलोचना हुई थी। मनमोहन सिंह सरकार में मंत्री रहे शरद पवार के बयानों पर भी काफी विवाद हुआ था। उसी प्रकार मौजूदा सरकार में कृषि मंत्री राधामोहन सिंह के उस बयान की भी कड़ी आलोचना हुई थी जिसमें उन्होंने कहा था कि किसान खेती की समस्याओं के कारण नहीं, बल्कि अन्य घरेलू कारणों की वजह से ज्यादा आत्महत्या करते हैं।
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