फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   Orissa High Court Says DNA test of child in face of mother's admission an insult to her motherhood

Odisha: 'मां के बयान के बावजूद बच्चे का डीएनए परीक्षण मातृत्व का अपमान'; ओडिशा हाईकोर्ट ने की अहम टिप्पणी

Sat, 06 Sep 2025 03:33 PM IST
शिव शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शिव शुक्ला Updated Sat, 06 Sep 2025 03:33 PM IST
विज्ञापन
Orissa High Court Says DNA test of child in face of mother's admission an insult to her motherhood
उड़ीसा उच्च न्यायालय। - फोटो : एएनआई (फाइल)

संपत्ति बंटवारे के एक मामले में डीएनए टेस्ट की मांग को लेकर हो रही सुनवाई के दौरान ओडिशा हाईकोर्ट ने हाल ही में एक अहम टिप्पणी की है। हाईकोर्ट ने कहा कि जब मां के बयान के बावजूद बच्चे का डीएनए परीक्षण कराना उसके मातृत्व का अपमान है। इतना ही नहीं अदालत ने यह भी कहा कि यह कानून के भी विरुद्ध है। 

विज्ञापन


ओडिशा हाई कोर्ट की एकल पीठ के न्यायाधीश न्यायमूर्ति बी.पी. राउत्रे ने यह टिप्पणी करते हुए निचली अदालत का फैसला बरकरार रखा। गौरतलब है कि संपत्ति बंटवारे के एक मामले में विरोधी पक्ष के 58 साल के व्यक्ति के पिता का पता लगाने के लिए उसका डीएनए परीक्षण का निर्देश देने की मांग की गई थी। जिसे निचली अदालत ने खारिज कर दिया था। जिसके बाद निचली अदालत के आदेश को चुनौती देते हुए यह मामला हाईकोर्ट पहुंचा। वहीं अब हाईकोर्ट ने भी निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखा है। 
विज्ञापन

 
न्यायमूर्ति राउत्रे ने एक सितंबर को अपने फैसले में कहा कि मैं इस मामले में व्यक्ति का डीएनए परीक्षण कराने के लिए इसे उपयुक्त मामला नहीं मानता। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता की अपील को अस्वीकार करने वाली निचली अदालत के आदेश में मुझे कोई कमी नहीं दिखती।  
विज्ञापन
विज्ञापन


साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि संबंधित व्यक्ति अब 58 वर्ष का है और इस उम्र में डीएनए टेस्ट कराने से कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आएगा। गवाही में व्यक्ति की मां ने साफ कहा है कि वह उसके पति ठूटा बुडुला से उत्पन्न संतान है। और विपक्षी पक्ष न तो मां की वैध शादी पर सवाल उठा पाया और न ही उसकी पत्नी होने की स्थिति पर। इसलिए किसी तीसरे पक्ष को पितृत्व पर प्रश्न उठाने का अधिकार नहीं है।

ओडिशा हाईकोर्ट ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 का हवाला देते हुए कहा कि वैवाहिक संबंधों में जन्मे बच्चे को वैध संतान माना जाएगा। याचिका खारिज करते हुए अदालत ने कहा कि यह समझ से परे है कि संपत्ति विभाजन के मामले में डीएनए परीक्षण कैसे प्रासंगिक होगा। ऐसे मामलों में यह देखना जरूरी है कि पक्षकार संयुक्त परिवार के सदस्य के रूप में मान्यता प्राप्त हैं या नहीं। अदालत ने कहा कि सिर्फ रक्त संबंध ही पुत्र होने की पहचान का आधार नहीं है, बल्कि समाज में मान्यता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।


कोर्ट ने यह भी साफ किया कि डीएनए परीक्षण किसी भी मामले में नियमित प्रक्रिया नहीं हो सकती। ऐसा आदेश केवल तब दिया जाना चाहिए जब यह बिल्कुल आवश्यक हो और बिना इसके न्याय तक पहुंचना असंभव हो।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed