सीबीआई और ईडी चीफ को पांच साल: किन अफसरों का टूटेगा मनोबल, पढ़िये ये पांच बड़े जोखिम
'केंद्रीय जांच एजेंसियों में पारदर्शिता और जवाबदेही, ये दो बिंदु ऐसे हैं, जिन पर दशकों से बात होती रही है। आम लोगों के अलावा विपक्ष भी यह सोचता है कि जांच एजेंसियों को स्वायत्तता कैसे मिले। अभी तक सुप्रीम कोर्ट, आमजन और विपक्ष, जांच एजेंसियों को लेकर इनका अनुभव ठीक नहीं रहा है।'
विस्तार
केंद्रीय जांच एजेंसियों, सीबीआई और ईडी प्रमुखों का कार्यकाल पांच वर्ष तक बढ़ाने का निर्णय जोखिम भरा हो सकता है। केवल विपक्षी नेता ही नहीं, बल्कि पूर्व आईपीएस अधिकारी भी केंद्र सरकार के इस निर्णय पर सवाल उठा रहे हैं। कैबिनेट सचिवालय से सेक्रेटरी 'सिक्योरिटी' के पद से रिटायर हुए पूर्व आईपीएस एवं सीआईसी रहे यशोवर्धन आजाद कहते हैं, ये निर्णय ठीक नहीं है। अगर सरकार इन एजेंसियों के प्रमुखों का कार्यकाल पांच वर्ष करना चाहती थी, तो उसे सीधे एक साथ ही 'पांच वर्ष' करना चाहिए था। हर वर्ष के अंत में निदेशक के कामकाज की रिपोर्ट पर अगले एक साल का एक्सटेंशन तय होगा, ये ठीक नहीं है। इस निर्णय की ये सबसे कमजोर कड़ी है। यहां सरकार की मंशा पर खुद–ब–खुद प्रश्नचिन्ह लग जाता है। जांच एजेंसियों में निदेशक से निचले क्रम वाले अधिकारी कहां जाएंगे। उनका उत्साह तो पूरी तरह खत्म हो जाएगा। ये अध्यादेश दुर्भाग्यपूर्ण है। संसद सत्र से कुछ दिन पहले केंद्र सरकार द्वारा यह अध्यादेश लाना, इसके पीछे कुछ छिपाने की मंशा साफ नजर आती है।
इस निर्णय के साथ पांच जोखिम भी देखने पड़ेंगे- आजाद
1. अध्यादेश को संसद सत्र से पहले क्यों लाया गया है। पूर्व आईपीएस यशोवर्धन आजाद ने इसे ही पहला जोखिम बताया है। इसमें बहुत सी बातें छिपी हैं। अगर सरकार का मन साफ है, वह जांच एजेंसियों को मजबूत करना चाहती है या उनकी कार्यप्रणाली में निष्पक्षता का भाव लाना है तो सरकार को इस पर बहस करानी चाहिए थी। भले ही संसद में कोई इसका समर्थन करता तो कोई विरोध में खड़ा होता। उस बहस के बाद जो कुछ निकलकर सामने आता, उससे एजेंसियों की साख बढ़ती। अब संसद सत्र से पहले अध्यादेश के जरिए यह निर्णय लेना, जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर विपरित असर डाल सकता है। अफसरों की परेशानी बढ़ सकती है।
2. केंद्रीय जांच एजेंसियों में पारदर्शिता और जवाबदेही, ये दो बिंदु ऐसे हैं, जिन पर दशकों से बात होती रही है। आम लोगों के अलावा विपक्ष भी यह सोचता है कि जांच एजेंसियों को स्वायत्तता कैसे मिले। अभी तक सुप्रीम कोर्ट, आमजन और विपक्ष, जांच एजेंसियों को लेकर इनका अनुभव ठीक नहीं रहा है। सुप्रीम कोर्ट 'सीबीआई' को तोता कह चुका है। विपक्ष का सदैव एक ही आरोप रहता है कि केंद्रीय जांच एजेंसियों के कामकाज में पारदर्शिता नहीं बची है। जवाबदेही भी बदल गई है। निष्पक्षता को लेकर भी समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। इन एजेंसियों का राजनीतिक दुरुपयोग, ये आरोप तो अब सामान्य हो चले हैं। केंद्र सरकार ने पहले से मौजूद जोखिमों को कम करने की बजाए अध्यादेश से इन्हें और ज्यादा बढ़ा दिया है।
3. अगर जांच एजेंसियों के निदेशकों का कार्यकाल पांच साल बढ़ाना था, तो उसे एक ही साथ बढ़ाना था। वह कार्यकाल हर साल बढ़ेगा, इसका क्या मतलब हुआ। एक साथ पांच वर्ष का कार्यकाल बढ़ने से निर्भीकता, निष्पक्षता और ईमानदारी, निदेशक के कामकाज से ऐसी उम्मीद कर सकते थे। जब निदेशक को यह लगता कि उसे पांच साल तक काम करना है तो वह उक्त शब्दों को ज्यादा बेहतर कार्यशैली के साथ चरितार्थ कर सकता था। हर साल के अंत में निदेशक के कामकाज की समीक्षा होगी। तब उसे बताया जाएगा कि आगे एक साल का सेवा विस्तार मिला है या नहीं। ये बात जांच निदेशक और जांच एजेंसी, दोनों के लिए एक 'जोखिम' की तरह है। कोई भी निदेशक नियमानुसार एजेंसी का कामकाज निपटाने की बजाए, खुद को सरकार के करीब ले जाने का प्रयास करेगा। इससे एजेंसी की छवि व कार्यशैली धूमिल हो सकती है।
4. जांच एजेंसियों में नंबर दो या उससे निचले क्रम में नियुक्त अधिकारी, केंद्र के इस अध्यादेश को खुद के लिए एक जोखिम की तरह मानेंगे। ये अध्यादेश, भविष्य में निदेशक बनने की तैयारी कर रहे अधिकारियों के लिए बड़ा झटका है। अब उनका उत्साह खत्म हो जाएगा। उन्हें मालूम होगा कि एक निदेशक जो पहले दो साल के लिए नियुक्त होता है, वह एक-एक साल आगे बढ़कर तीन वर्ष तक का सेवाकाल ले सकता है। प्रमोशन में पिछड़ने वाले अफसरों की कार्यशैली पर भी विपरित असर देखने को मिल सकता है। कार्य में आगे बढ़ना या पदोन्नति, ये किसी भी संगठन में स्टाफ या शीर्ष नेतृत्व की कार्यशैली को बेहतर बनाने में मदद करते हैं। तकनीकी तौर पर यहां ये भी देखना होगा कि ये अध्यादेश कहीं सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लंघन तो नहीं है।
5. सीबीआई निदेशक सुबोध कुमार जायसवाल ने पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि पश्चिम बंगाल, राजस्थान, झारखंड, महाराष्ट्र, केरल, पंजाब, छत्तीसगढ़ और मिजोरम सरकार ने सीबीआई को जांच कार्य के लिए दी सामान्य सहमति वापस ले ली है। इससे जांच एजेंसी के कामकाज में बाधा आ रही है। बैंक धोखाधड़ी से संबंधित लगभग 78 फीसदी मामलों की जांच केवल इस वजह से शुरू नहीं हो पा रही है कि विभिन्न राज्य इसके लिए सहमति नहीं दे रहे हैं। पूर्व आईपीएस यशोवर्धन आजाद कहते हैं, सरकार को इस मुद्दे पर काम करना चाहिए था। केंद्र सरकार, सुप्रीम कोर्ट और विपक्षी दल, तीनों साथ बैठकर ऐसे मेकेनिज्म पर काम करते कि जिससे सीबीआई को राज्यों की सहमति लेने से छुटकारा मिल जाता। कुछ ऐसा भी हो सकता था कि राज्य बिना ना-नुकर के जांच एजेंसी को अपनी सहमति प्रदान कर देते। यहां बात विश्वास की थी। जब सबकी सहमति से कोई निर्णय होता तो राज्यों और जांच एजेंसी के बीच टकराव भी नहीं होता। केंद्र सरकार, इस तरफ न सोचकर, केवल निदेशकों को पांच वर्ष तक बनाए रखने के लिए अध्यादेश ले आई।