कर्नाटक में मिशन 2019 की तैयारियों का आगाज, विपक्ष ऐसे करेगा मोदी सरकार को परेशान
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कर्नाटक में बुधवार को जदएस-कांग्रेस गठबंधन की सरकार के शपथग्रहण में 14 विपक्षी दलों के नेताओं की मौजूदगी ने मोदी विरोधी मोर्चे की तैयारियों की झलक पेश की। कर्नाटक में बने नए राजनीतिक समीकरण के बाद लोकसभा चुनाव के लिए विपक्षी दलों की गोलबंदी तेज हुई है। इस समारोह के बहाने विपक्षी दिग्गजों के एक मंच पर आने को बड़ा सियासी महत्व मिल रहा है।
समारोह के दौरान बसपा प्रमुख मायावती और कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी एक दूसरे से बहुत गर्मजोशी से मिली। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद से ही एनसीपी प्रमुख शरद पवार और टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी अगले लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा विरोधी मोर्चा खड़ा करने की मुहिम में जुटे थे। इसी साल टीडीपी के एनडीए से नाता तोड़ने, शिवसेना के अगला लोकसभा चुनाव भाजपा के साथ नहीं लड़ने की घोषणा से इस मुहिम को मजबूती मिली है।
141 सांसदों वाले इन दलों के नेता हुए शामिल
कांग्रेस, जदएस, एनसीपी, सपा, बसपा, टीडीपी, टीएमसी, टीआरएस, आप, सीपीएम, रालोद, डीएमके, मक्कल निधि मय्यम और राजद। इन सभी के दलों के लोकसभा में 141 सांसद हैं। बसपा, रालोद, मक्कल निधि मय्यम और डीएमके का लोकसभा में एक भी सांसद नहीं है।
चर्चा में रही माया-अखिलेश की मुलाकात
कार्यक्रम के दौरान सबसे ज्यादा चर्चा का विषय सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और बसपा सुप्रीमो मायावती की मुलाकात रही। दोनों पहली बार किसी मंच पर साथ दिखे। दोनों आसपास की कुर्सियों पर बैठे और बड़ी गर्मजोशी से एक-दूसरे से बातचीत करते दिखे।
फूलपुर-गोरखपुर में लोकसभा उपचुनाव से ऐन पहले साथ आकर भाजपा को सियासी शिकस्त देने वाले सपा-बसपा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कैराना और नूरपुर उपचुनावों में एक साथ हैं। दोनों का साथ आना भाजपा के लिए 2019 में बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।
संयुक्त विपक्ष से बढ़ सकती है भाजपा की परेशानी
2014 के लोकसभा चुनाव में ज्यादातर राज्यों में विपक्ष के अलग-अलग लड़ने से भाजपा को अपने दम पर बहुमत हासिल करने में सफलता मिली थी। 1999 के चुनाव में भाजपा 29 फीसदी से अधिक वोट हासिल करने के बावजूद 182 सीटें ही जीत पाई थी।
2014 में भाजपा महज 31 फीसदी वोट हासिल कर 283 सीटें जीतने में कामयाब रही। अब यूपी में सपा और बसपा ने हाथ मिलाया है, तो कर्नाटक में कांग्रेस, जदएस की बी टीम बनने के लिए तैयार हो गई है। ऐसे में पवार और ममता की कोशिश दूसरे राज्यों में भी बड़े दलों के नेतृत्व में भाजपा के खिलाफ मोर्चा बनाने की है। संयुक्त विपक्ष भाजपा की मुश्किलें बढ़ा सकता है।