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तीसरे मोर्चे की जमीन तैयार करने में जुटे दिग्गज, 2019 से पहले भाजपा की परेशानी बढ़ना तय

हिमांशु मिश्र, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Thu, 08 Mar 2018 08:46 PM IST
पीएम मोदी और अमित शाह
पीएम मोदी और अमित शाह - फोटो : ANI
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शिवसेना के एकला चलो की घोषणा के बाद टीडीपी का एनडीए सरकार से नाता तोड़ने के साथ ही चुनावी वर्ष से ठीक पहले केंद्र की सियासत में नए-नए समीकरण बनने लगे हैं। जल्द ही सियासी क्षत्रपों की ओर से तीसरा मोर्चा और कांग्रेस की ओर से गैर-राजग गठबंधन की जमीन तैयार करने का सिलसिला तेज होगा। बदले माहौल में सोनिया गांधी ने 13 मार्च को विपक्षी दलों को डिनर पर आमंत्रित किया है, तो टीआरएस प्रमुख के चंद्रशेखर राव ने तीसरे मोर्चा बनाने की वकालत की है। वहीं त्रिपुरा के नतीजे आने के बाद सपा-बसपा फिर से एक नाव पर सवार हो गए हैं।
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नए सियासी घटनाक्रम कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए चिंताजनक तस्वीर पेश कर रहे हैं। भाजपा की मुश्किल यह है कि गठबंधन में बिखराव की शुरुआत ऐसे समय में हो रही है, जब पार्टी चुनावी वर्ष में प्रवेश कर रही है। पार्टी से शिवसेना और टीडीपी की नाराजगी खुल कर सामने आ गई है, जबकि बिहार में जीतन राम माझी गुट एनडीए का साथ छोड़ चुका है। 

रालोसपा और लोजपा के मुखिया क्रमश: उपेंद्र कुशवाहा और रामविलास पासवान नीतीश कुमार से असहज रिश्तों के कारण जदयू की एनडीए में वापसी से सहज नहीं हैं। ऐसे में चुनाव तक ये दोनों दल भी बड़ा निर्णय ले सकते हैं। हालांकि भाजपा आंध्र प्रदेश में वाईएसआर कांग्रेस, तो तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक और रजनीकांत की पार्टी को साध कर इसकी भरपाई की कोशिश कर सकती है।

उधर कांग्रेस की मुश्किल यह है कि क्षेत्रीय दलों के कई दिग्गज कांग्रेस से दूरी बनाए रखना चाहते हैं। इसका कारण कई राज्यों में सियासी लड़ाई कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के बीच होना है। 

राजद ही कांग्रेस के गैर-राजग गठबंधन की मुहिम में खुल कर साथ आ सकता है। वाम दलों ने पहले ही कांग्रेस के साथ गठबंधन की संभावनाओं पर पानी फेर दिया है, जबकि यूपी में साथ आई सपा-बसपा का फिलहाल कांग्रेस के लिए रुख स्पष्ट नहीं है।

तीसरे मोर्चे के नेतृत्व पर क्षत्रपों की नजर
वैसे तो देश में गैर-राजग और गैर-कांग्रेस कई क्षेत्रीय दल हैं और पहले की तरह तीसरे मोर्चे की जमीन तैयार होने की संभावना भी है। मगर नेतृत्व के सवाल पर संकट है। 

नायडू ने अगर एनडीए का दामन छोड़ा, तो वह इस मोर्चे का नेतृत्व करना चाहेंगे। जबकि केसीआर पहले ही इस पर अपना दावा जता चुके हैं। वाम दल भी इसका नेतृत्व करना चाहते हैं, जबकि ममता बनर्जी, शरद पवार लंबे समय से इस दिशा में प्रयास कर रहे हैं।

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