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Christmas: पीएम आवास से बीजेपी हेड ऑफिस तक ईसा मसीह पर चर्चा, ईसाइयों पर पीएम मोदी को क्यों आ रहा प्यार
सार
भाजपा नेताओं के ईसाई समुदाय के लोगों से मिलने को 2024 के लोकसभा चुनावों से जोड़कर देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि जिस तरह इंडिया गठबंधन ने भाजपा को उत्तर भारत में चुनौती देने की कोशिश की है, उससे पार्टी को क्षेत्र में कुछ परेशानी हो सकती है। यूपी-बिहार के साथ-साथ पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में उसे कुछ सीटों का नुकसान हो सकता है।
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पीएम नरेंद्र मोदी
- फोटो : ANI
विस्तार
अयोध्या में भगवान राम के नवनिर्मित मंदिर के लोकार्पण कार्यक्रम को भाजपा एक मिशन के रूप में पूरे देश में आगे बढ़ा रही है। लेकिन इसी बीच आज क्रिसमस के त्योहार पर भाजपा नेता अचानक गिरजाघर पहुंचे और ईसा मसीह से आशीर्वाद लिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने आधिकारिक निवास पर ईसाई समुदाय के लोगों से मुलाकात की। उन्होंने ईसाइयों के देश के स्वतंत्रता संग्राम में योगदान को भी याद किया और देश को आगे बढ़ाने में ईसाई समुदाय की भूमिका को भी स्वीकार किया।
वहीं, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा अपने सहयोगियों के साथ दिल्ली के एक गिरजाघर में पहुंचे। उन्होंने भी ईसा मसीह से आशीर्वाद लिया और पादरियों से मुलाकात की। जेपी नड्डा ने भी याद किया कि किस तरह ईसाई समुदाय ने देश में आधुनिक शिक्षा को आगे बढ़ाने और स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाने में अपना योगदान दिया।
ईसाई भाजपा के लिए महत्त्वपूर्ण क्यों बने
भाजपा नेताओं के ईसाई समुदाय के लोगों से मिलने को 2024 के लोकसभा चुनावों से जोड़कर देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि जिस तरह इंडिया गठबंधन ने भाजपा को उत्तर भारत में चुनौती देने की कोशिश की है, उससे पार्टी को क्षेत्र में कुछ परेशानी हो सकती है। यूपी-बिहार के साथ-साथ पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में उसे कुछ सीटों का नुकसान हो सकता है। इस कमी की भरपाई के लिए भारतीय जनता पार्टी दक्षिण भारत में अपना विस्तार करने की कोशिश करेगी।
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लेकिन दक्षिण भारत में हिंदुओं की अपेक्षाकृत कम संख्या, द्रविड़ राजनीति के प्रभाव और ईसाई समुदाय की बहुलता के कारण उसका यह सपना तब तक साकार नहीं हो सकता जब तक कि दक्षिण का कोई प्रभावशाली समूह उसके साथ न जुड़े। जिताऊ समीकरण के लिए उसे दक्षिण भारत में भी उसी तरह के भरोसेमंद वोटरों की तलाश है जैसा कि उत्तर भारत में सवर्ण मतदाताओं ने उसके लिए आधार तैयार किया है। यह आधार ईसाई वोट बैंक में मिल सकता है। इसके लिए भाजपा को ईसाई समुदाय को भरोसे में लेना होगा, जिसके लिए उसने कांग्रेस से भाजपा में आए केरल के नेता टॉम वडक्कन के नेतृत्व में राष्ट्रीय ईसाई मंच बनाकर शुरू कर दिया है।
बहुतों को यह रास्ता कठिन लग सकता है, लेकिन जिन्होंने भी देखा है कि किस तरह भाजपा ने राष्ट्रीय मुस्लिम मंच बनाकर मुसलमान मतदाताओं के एक वर्ग को अपने साथ जोड़ने में सफलता पाई है, वे समझ सकते हैं कि यह तात्कालिक राजनीति के लिए भले बहुत उपयोगी न हो, लेकिन दूर की राजनीति में यह भाजपा के लिए दूर की कौड़ी साबित हो सकती है।
उत्तर भारतीय पार्टी होने का तमगा हटाने के लिए भी ईसाई जरूरी
हाल ही में डीएमके के एक नेता ने भाजपा पर उसे 'गोबर पट्टी' की पार्टी होने का आरोप लगाया। गोबर पार्टी का अर्थ हिंदी पट्टी या उत्तर भारत के राज्यों से है। दक्षिण भारत या पढ़े लिखे समाज में एक वर्ग के उत्तर भारतीय समाज को इसी नाम से व्यंग करते हैं। यदि भाजपा को अपने को केवल गोबर पट्टी की पार्टी होने का कलंक हटाना है तो उसे दक्षिण के किसी राज्य में अपनी पकड़ बनानी होगी।
कर्नाटक में उसके मजबूत पैर होने के बाद भी वह यहां ज्यादातर जोड़ तोड़ की राजनीति पर ही चलने के लिए मजबूर रही है। यदि उसे अपने बूते सत्ता में स्थाई तौर पर टिकना है तो उसके लिए उसे अपने सामाजिक आधार में विस्तार करना होगा। भाजपा को यह उम्मीद ईसाई समुदाय में ही दिखाई पड़ रही है।
भाजपा के मातृ संगठन आरएसएस का पूरे देश में यदि कहीं सबसे ज्यादा काम है तो वह केरल में है। लेकिन अपने तमाम प्रयासों के बाद भी वह केरल में अपनी असरदार उपस्थिति नहीं बना पाई है। पार्टी नेता मानते हैं कि यदि उसे इस सबसे मजबूत वामपंथी गढ़ को ढहाना है तो उसे इसाई समुदाय को साथ लेना होगा। भाजपा नेताओं का मानना है कि केरल का शिक्षित और प्रभावशाली ईसाई समुदाय लव जिहाद और बढ़ती कट्टर मुस्लिम विचारधारा से आशंकित है, उसे आसानी से अपने पाले में लाया जा सकता है। यानी केरल का वामपंथी किला ढहाने के लिए भी भाजपा को ईसाइयों का साथ चाहिए।
पूर्वोत्तर का किला संभालना चुनौती
देश के आठ पूर्वोत्तर के राज्यों में लोकसभा की 26 सीटें हैं। इसमें असम की 14 लोकसभा सीटों पर भाजपा का दबदबा रहेगा। लेकिन मणिपुर विवाद के बाद शेष 12 सीटों पर भाजपा को कड़ी चुनौती झेलनी पड़ सकती है। लेकिन यदि ईसाई बहुल समुदाय भाजपा के पाले में आ जाता है तो उसकी यह राह आसान हो सकती है।
पूर्वोत्तर में कहां कितने ईसाई
मेघालय में ईसाई समुदाय की जनसंख्या 74.59 प्रतिशत, नागालैंड में 87.93 प्रतिशत, मणिपुर में 41 प्रतिशत और अरुणाचल प्रदेश में 30.26 प्रतिशत है। यानी अकेले ईसाई समुदाय ही यह तय करता है कि यहां पर जीत किसकी होगी। इसके अलावा सिक्किम में 10 प्रतिशत, त्रिपुरा में 4.35 प्रतिशत और असम में 3.74 प्रतिशत ईसाई समुदाय भी जीत की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाता है।
बीजेपी ने कितनी सीटें जीतीं
2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने पूर्वोत्तर की आठ सीटों पर जीत दर्ज की थी, लेकिन 2019 में उसने यह संख्या बढ़ाकर 15 कर लिया था। सहयोगी पार्टियों की तीन सीटों की जोड़ लें तो एनडीए के खाते में 18 सीटें हो गई थीं। ईसाइयों को साथ लेकर भाजपा इन सीटों पर अपनी पकड़ बरकरार रखना चाहती है। उत्तर भारत में इंडिया गठबंधन की चुनौती के बीच उसे अपनी पकड़ बरकरार रखने की जरूरत बढ़ गई है।
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वहीं, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा अपने सहयोगियों के साथ दिल्ली के एक गिरजाघर में पहुंचे। उन्होंने भी ईसा मसीह से आशीर्वाद लिया और पादरियों से मुलाकात की। जेपी नड्डा ने भी याद किया कि किस तरह ईसाई समुदाय ने देश में आधुनिक शिक्षा को आगे बढ़ाने और स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाने में अपना योगदान दिया।
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ईसाई भाजपा के लिए महत्त्वपूर्ण क्यों बने
भाजपा नेताओं के ईसाई समुदाय के लोगों से मिलने को 2024 के लोकसभा चुनावों से जोड़कर देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि जिस तरह इंडिया गठबंधन ने भाजपा को उत्तर भारत में चुनौती देने की कोशिश की है, उससे पार्टी को क्षेत्र में कुछ परेशानी हो सकती है। यूपी-बिहार के साथ-साथ पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में उसे कुछ सीटों का नुकसान हो सकता है। इस कमी की भरपाई के लिए भारतीय जनता पार्टी दक्षिण भारत में अपना विस्तार करने की कोशिश करेगी।
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लेकिन दक्षिण भारत में हिंदुओं की अपेक्षाकृत कम संख्या, द्रविड़ राजनीति के प्रभाव और ईसाई समुदाय की बहुलता के कारण उसका यह सपना तब तक साकार नहीं हो सकता जब तक कि दक्षिण का कोई प्रभावशाली समूह उसके साथ न जुड़े। जिताऊ समीकरण के लिए उसे दक्षिण भारत में भी उसी तरह के भरोसेमंद वोटरों की तलाश है जैसा कि उत्तर भारत में सवर्ण मतदाताओं ने उसके लिए आधार तैयार किया है। यह आधार ईसाई वोट बैंक में मिल सकता है। इसके लिए भाजपा को ईसाई समुदाय को भरोसे में लेना होगा, जिसके लिए उसने कांग्रेस से भाजपा में आए केरल के नेता टॉम वडक्कन के नेतृत्व में राष्ट्रीय ईसाई मंच बनाकर शुरू कर दिया है।
बहुतों को यह रास्ता कठिन लग सकता है, लेकिन जिन्होंने भी देखा है कि किस तरह भाजपा ने राष्ट्रीय मुस्लिम मंच बनाकर मुसलमान मतदाताओं के एक वर्ग को अपने साथ जोड़ने में सफलता पाई है, वे समझ सकते हैं कि यह तात्कालिक राजनीति के लिए भले बहुत उपयोगी न हो, लेकिन दूर की राजनीति में यह भाजपा के लिए दूर की कौड़ी साबित हो सकती है।
उत्तर भारतीय पार्टी होने का तमगा हटाने के लिए भी ईसाई जरूरी
हाल ही में डीएमके के एक नेता ने भाजपा पर उसे 'गोबर पट्टी' की पार्टी होने का आरोप लगाया। गोबर पार्टी का अर्थ हिंदी पट्टी या उत्तर भारत के राज्यों से है। दक्षिण भारत या पढ़े लिखे समाज में एक वर्ग के उत्तर भारतीय समाज को इसी नाम से व्यंग करते हैं। यदि भाजपा को अपने को केवल गोबर पट्टी की पार्टी होने का कलंक हटाना है तो उसे दक्षिण के किसी राज्य में अपनी पकड़ बनानी होगी।
कर्नाटक में उसके मजबूत पैर होने के बाद भी वह यहां ज्यादातर जोड़ तोड़ की राजनीति पर ही चलने के लिए मजबूर रही है। यदि उसे अपने बूते सत्ता में स्थाई तौर पर टिकना है तो उसके लिए उसे अपने सामाजिक आधार में विस्तार करना होगा। भाजपा को यह उम्मीद ईसाई समुदाय में ही दिखाई पड़ रही है।
भाजपा के मातृ संगठन आरएसएस का पूरे देश में यदि कहीं सबसे ज्यादा काम है तो वह केरल में है। लेकिन अपने तमाम प्रयासों के बाद भी वह केरल में अपनी असरदार उपस्थिति नहीं बना पाई है। पार्टी नेता मानते हैं कि यदि उसे इस सबसे मजबूत वामपंथी गढ़ को ढहाना है तो उसे इसाई समुदाय को साथ लेना होगा। भाजपा नेताओं का मानना है कि केरल का शिक्षित और प्रभावशाली ईसाई समुदाय लव जिहाद और बढ़ती कट्टर मुस्लिम विचारधारा से आशंकित है, उसे आसानी से अपने पाले में लाया जा सकता है। यानी केरल का वामपंथी किला ढहाने के लिए भी भाजपा को ईसाइयों का साथ चाहिए।
पूर्वोत्तर का किला संभालना चुनौती
देश के आठ पूर्वोत्तर के राज्यों में लोकसभा की 26 सीटें हैं। इसमें असम की 14 लोकसभा सीटों पर भाजपा का दबदबा रहेगा। लेकिन मणिपुर विवाद के बाद शेष 12 सीटों पर भाजपा को कड़ी चुनौती झेलनी पड़ सकती है। लेकिन यदि ईसाई बहुल समुदाय भाजपा के पाले में आ जाता है तो उसकी यह राह आसान हो सकती है।
पूर्वोत्तर में कहां कितने ईसाई
मेघालय में ईसाई समुदाय की जनसंख्या 74.59 प्रतिशत, नागालैंड में 87.93 प्रतिशत, मणिपुर में 41 प्रतिशत और अरुणाचल प्रदेश में 30.26 प्रतिशत है। यानी अकेले ईसाई समुदाय ही यह तय करता है कि यहां पर जीत किसकी होगी। इसके अलावा सिक्किम में 10 प्रतिशत, त्रिपुरा में 4.35 प्रतिशत और असम में 3.74 प्रतिशत ईसाई समुदाय भी जीत की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाता है।
बीजेपी ने कितनी सीटें जीतीं
2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने पूर्वोत्तर की आठ सीटों पर जीत दर्ज की थी, लेकिन 2019 में उसने यह संख्या बढ़ाकर 15 कर लिया था। सहयोगी पार्टियों की तीन सीटों की जोड़ लें तो एनडीए के खाते में 18 सीटें हो गई थीं। ईसाइयों को साथ लेकर भाजपा इन सीटों पर अपनी पकड़ बरकरार रखना चाहती है। उत्तर भारत में इंडिया गठबंधन की चुनौती के बीच उसे अपनी पकड़ बरकरार रखने की जरूरत बढ़ गई है।