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बिहार में पकड़ौआ विवाह में फिर आई तेजी

Mon, 19 Feb 2018 11:36 AM IST
बीबीसी हिंदी
बीबीसी हिंदी Updated Mon, 19 Feb 2018 11:36 AM IST
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number of pakadwa Marriage case increase in bihar
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"हम पांच बहनें थीं। एक को छोड़कर बाकी सब की शादी पकड़ौआ विवाह से हुई।" ये बताते हुए 48 साल की पूनम के होंठ सिर्फ बंद और खुल रहे थे, लेकिन दिमाग साल 1984 से 1991 के बीच घटी घटनाओं पर जा चिपका था।

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साल 1984 में वो सातवीं में ही तो पढ़ती थीं जब नौंवीं में पढ़ने वाले मनोज से उनकी शादी हुई। मनोज को पूनम के घरवाले और कुछ लठैत लोग अपने साथ बहला-फुसला कर ले आए थे। पूरा एक दिन मनोज को कमरे में बंद रखा गया और दूसरे दिन रीति रिवाज के साथ शादी। तिलमिलाए मनोज के परिवार ने पूरे सात साल तक पूनम को नहीं अपनाया, लेकिन बाद में जब अपनाया तो पूरे प्रेम के साथ।
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बिहार के बेगूसराय की पूनम बताती हैं, "पिताजी की गलती थी। पकड़ के शादी करने पर उनकी जिम्मेदारी तो खत्म हो गई, लेकिन अगर ये दूसरी शादी कर लेते तो? किस्मत अच्छी थी कि ससुराल अच्छा था। सास ने मुझे मां का प्यार दिया और पति ने सम्मान।"
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तीन बच्चों की मां पूनम दिल्ली में रहती हैं जहां उनके पति मनोज सरकारी कर्मचारी हैं। लेकिन बिहार में प्रचलित सभी पकड़ौआ विवाह की ऐसी 'हैप्पी एंडिंग' नहीं होती।

क्या है पकड़ौआ विवाह?

पकड़वा या पकड़ौआ विवाह यानी वो विवाह जिसमें शादी योग्य लड़के का अपहरण करके उसकी जबरन शादी करवाई जाती है। कुछ साल पहले इसी विषय पर एक फिल्म और भाग्यविधाता नाम का सीरियल आया था। 80 के दशक में उत्तर बिहार में खासतौर पर बेगूसराय में पकड़ौआ विवाह के मामले खूब सामने आए।

आलम ये था कि बाकायदा हर सात से आठ गांव पर इसके लिए गिरोह चलते थे और शादी के सीजन में इनकी बहुत डिमांड रहती थी। इंटर की परीक्षा देते छात्र, नौकरीपेशा लड़कों को खास ताकीद दी जाती थी कि वो शादी के सीजन में जल्दी घर से नहीं निकलें।

बीती 23 जनवरी को सहरसा में एक 17 वर्षीय छात्र का अपहरण करके 23 साल की युवती से जबरन शादी करा दी गई थी। इस मामले में बख्तियारपुर थाने में रिपोर्ट भी दर्ज की गई है।

बेगूसराय के जी डी कॉलेज में प्रोफेसर मदन मोहन चक्रवर्ती कहते हैं, "बेगूसराय को लेनिनग्राद भी कहा जाता है, इसलिए किसी भी समस्या के खिलाफ विद्रोह का भी ये केन्द्र है। ये भूमिहार बहुल इलाका है और इस समाज में दहेज बहुत चलता है। इसी दहेज के खिलाफ सामाजिक परिवर्तन के लिए गैर कानूनी ही सही, लेकिन लोगों ने ये तरीका अपनाया। आज भी शादी के सीजन मे दो से तीन फीसदी शादियां पकड़ौआ विवाह ही होती हैं।"

बंदूक तानकर मंडप पर बैठाना

हालांकि दहेज के खिलाफ होने का नाम लेकर हो रहे इन पकड़ौआ विवाह का दंश सबसे ज्यादा दूल्हा और दुल्हन को ही भोगना पड़ता है। दरभंगा की कमला की शादी उनके पिता ने जबरन करवाई थी। सामाजिक दबाव में ससुराल वालों ने उन्हें अपना तो लिया, लेकिन दिल में कसक अभी भी कायम है।

कमला बताती है, "हर वक्त मन में ग्लानि महसूस होती है और डर भी लगता है कि जाने कौन-सी बात पर घर वाले बिगड़ जाएं। अपने परिवार वाले का किया हम भोगने को मजबूर हैं।"

ऐसी शादियों में दूल्हे की स्थिति का अंदाजा आप सहरसा के 27 साल के आलोक से बातचीत करके लगा सकते हैं। 13 मई, 2012 को आलोक के एक दोस्त ने पार्टी का लालच देकर उनका अपहरण कर लिया। 10 की संख्या में लोगों ने बंदूक तानकर मंडप पर बैठाया और जबरन शादी करवा दी।

'मेरे लिए डरावना सच'
आलोक बताते हैं कि तीन साल तक वो समाज से लड़ते रहे, लेकिन आखिरकार खुद के ऊपर 'थोपी' हुई कम पढ़ी लिखी दुल्हन को सामाजिक दबाव के चलते विदा कर ले आए।

दो बच्चों के पिता आलोक कहते हैं, "दिल तो अभी भी कटा-कटा रहता है। किसी की भी जिंदगी के लिए शादी यादगार होती है, मेरे लिए तो वो डरावना सच है।"

बता दें कि जहां सामाजिक दबाव में इन शादियों को मान्यता मिलती है वहीं अब तेजी से इन्हें खारिज भी किया जा रहा है। हाल ही में मोकामा में बीती 3 दिसंबर को पेशे से इंजीनियर विनोद की शादी जबरन करवा दी गई थी जिसका वीडियो वायरल हुआ था। विनोद ने ये शादी मानने से इंकार कर दिया।

बातचीत में उन्होंने कहा, "जबरन भैंस से शादी करवा देंगे तो क्या उसे भी मैं अपनी बीवी मान लूंगा? और इन मामलों मे पुलिस की मिलीभगत रहती है। कोई एफआईआर नहीं होती, इसलिए इन लोगों का मन बढ़ा हुआ है।"

दिलचस्प है कि बीते चार सालों में पकड़ौआ विवाह के मामले बढ़े हैं। बिहार पुलिस मुख्यालय के आंकड़ों के मुताबिक साल 2014 में 2526, 2015 में 3000, 2016 में 3070 और नवंबर 2017 तक 3405 शादी के लिए अपहरण हुए। गौरतलब है कि इसमें प्रेम प्रसंग में घर से भागने वाले प्रेमी युगल का आंकड़ा शामिल नहीं है।

अगर प्रेम प्रसंग में भागने वालों का आंकड़ा भी शामिल कर दिया जाए तो बिहार में होने वाले कुल अपहरण का 70 फीसदी सिर्फ प्रेम या शादी के लिए होता है। राष्ट्रीय क्राइम रिकार्ड ब्यूरो 2015 की रिपोर्ट भी कहती है कि बिहार मे 18 से 30 साल के युवकों का सबसे ज्यादा अपहरण हुआ। ये देश में इस उम्र समूह में हुए अपहरण का तकरीबन 16 फीसदी है।

पटना स्थित ए. एन. सिन्हा संस्थान के पूर्व निदेशक डी। एम। दिवाकर कहते हैं, "पकड़ौआ विवाह का इतिहास 100 साल से भी ज़्यादा पुराना है। लेकिन अभी उसमें उछाल आने की चार वजहें प्रमुख हैं।


पहला तो पूंजी के दबाव में दहेज का विकराल चेहरा हमारे सामने है, दूसरा लड़कियों की अशिक्षा, तीसरे गैर कृषि व्यवसाय में दूल्हे की चाहत लगातार बढ़ रही है और चौथी ये है कि सामाजिक ताने-बाने में जातीय जकड़ अभी भी कायम है।"

दिलचस्प है कि पकड़ौआ विवाह में उछाल ऐसे वक्त में सामने आ रहा है जब बिहार सरकार दहेजबंदी का एजेंडा ले कर जोर-शोर से कार्यक्रम चला रही है। 

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