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अब तो केंद्र सरकार के गले में अटक गया राफेल लड़ाकू विमान

Wed, 12 Sep 2018 11:58 PM IST
शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Wed, 12 Sep 2018 11:58 PM IST
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Now the rafale Fighter aircraft stuck in the neck of the central government

कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ-साथ उच्चतम न्यायालय के वकील प्रशांत भूषण, पूर्व केन्द्रीय मंत्री अरुण शौरी और यशवंत सिन्हा ने राफेल लड़ाकू विमान सौदे पर सवाल उठाकर केन्द्र सरकार की परेशानी बढ़ा दी है। रक्षा खरीद परिषद के सदस्य और उच्चपदस्थ सूत्र भी इस सवाल पर कुछ बोलने से कतरा रहे हैं। 

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केंद्र सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री भी इस सौदे के बचाव में बस इंतजार करने का तर्क रहे हैं। सूत्र का कहना है कि सरकार जल्द ही इस मामले में नये तथ्यों के साथ सामने आने वाली है। वहीं, पड़ताल में सामने आ रहा है कि राफेल लड़ाकू विमान का सौदा केंद्र सरकार के गले में फांस बनकर अटक गया है।
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क्यों चाहिए लड़ाकू विमान ?

90 के दशक में मिग सिरीज के पुराने होते युद्धक विमान, दुर्घटना की संभावना और पाकिस्तान तथा चीन के मोर्चे पर दोहरी चुनौती का आकलन करके भारतीय वायुसेना ने चौथी पीढ़ी बहुउद्देश्यी लड़ाकू विमानों की जरूरत पर बल दिया था। वायुसेना ने 1998 में इस मांग को आधार बनाकर अपनी क्षमता 38-39 स्क्वाड्रॉन(एक स्क्वाड्रान में 16+2(प्रशिक्षण)=१८ लड़ाकू विमान)करने की आवश्यकता पर बल दिया। 

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ये हुए बाहर और राफेल अव्वल

Now the rafale Fighter aircraft stuck in the neck of the central government

कारगिल युद्ध के बाद बनी कारगिल समीक्षा समिति ने भी इस पर ध्यान दिया और वायुसेना के आधुनिकीकरण को बल मिला। 205-06 में वायुसेना ने इस मांग को जोर-शोर से उठाया और रक्षा मामलों की समिति ने चौथी पीढ़ी के बहुउद्देशीय विमानों की आवश्यकता को प्रमुखता से स्वीकार किया। इसके बाद रक्षा खरीद परिषद और भारत सरकार की अनुमति 2007 में 126 बहुउद्देश्यीय लड़ाकू विमानों के लिए अंतरराष्ट्रीय आमंत्रण प्रस्ताव(आरएफपी) मंगाए गए। 

इस प्रस्ताव पर छह अंतरराष्ट्रीय विमान निर्माता कंपनियों (अमेरिका की बोइंग(एफ-18 सुपरहार्नेट) , लॉकहीड मार्टिन(एफ-16), यूरोफाइटर टाइफून, ब्रिटेन का गिप्रेन, फ्रांस की डेसाल्ट एवियेशन का राफेल और रूस की मिग कारपोरेशन के मिग-35) ने रुचि दिखाई। भारतीय वायुसेना ने देश के विभिन्न हिस्सों में अपनी जरूरत के हिसाब से विभिन्न मौसम, तापमान, हाई बैटलफील्ड आदि को ध्यान में रखकर दो साल से अधिक समय तक परीक्षण किया और विमानों की गुणवत्ता पर अपनी रिपोर्ट सौंप दी।


ये हुए बाहर और राफेल अव्वल

लॉकहीड मार्टिन का एफ-16 एकल इंजन लड़ाकू विमान होने, पाकिस्तान के पास मौजूद होने समेत अन्य कारणों से प्रतिपर्धा में सफल नहीं हो सका। एफ-18 सुपरहार्नेट की कीमत, जीवन चक्र(लाइफ साइकिल) कीमत,तकनीकी हस्तांतरण, अमेरिकी नियम कानून की जटिलताएं तथा विमान की क्षमता आदि के कारण यह वायुसेना के परीक्षण में पीछे रहा। 

यही स्थिति रूस के मिग-35 के साथ रही। ब्रिटेन का ग्रिपेन भी सिंगल इंजन एयरक्राफ्ट है। जबकि यूरोफाइटर टाइफून और फ्रांस का राफेल इस प्रतिस्पर्धा में बाजी मारने में सफल रहे। वायुसेना की परीक्षण रिपोर्ट के आधार पर रक्षा मंत्रालय ने कामर्शियल ट्रायल शुरू किया और इसमें कम कीमत के कारण डास्सो एवियेशन का राफेल लड़ाकू विमान एल वन रहा।

एंटनी ने फैसला अगली सरकार पर छोड़ा

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एंटनी ने फैसला अगली सरकार पर छोड़ा

2012 में कामर्शियल ट्रायल शुरू होने और 2013 तक स्थिति साफ होने के बाद तत्कालीन रक्षा मंत्री एके एंटनी ने बयान देकर 126 लड़ाकू विमानों के सौदे के निर्णय को अगली सरकार के ऊपर छोड़ दिया था। एंटनी ने रक्षा प्रदर्शनी में भी बतौर रक्षा मंत्री इसकी घोषणा की थी। तब इसके लिए पूर्व सुरक्षा सलाहकार बृजेश मिश्रा ने एंटनी के निर्णय की आलोचना भी की थी। बृजेश मिश्र ने संवाददाता से साक्षात्कार के दौरान रक्षा सौदों में देरी के लिए रक्षा मंत्री एके एंटनी को जिम्मेदार ठहराया था। 

लेकिन 126 बहुउद्देश्यीय लड़ाकू विमान के सौदे को लेकर दो तथ्य सामने आए थे। पहला भारत फ्रांस की लड़ाकू विमान निर्माता कंपनी से 126 बहुउद्देश्यीय लड़ाकू विमान लेगा। यह सौदा तकनीकी हस्तांतरण क्लाज के तहत होगा। इसके अंतर्गत एक स्क्वाड्रॉन(18) विमान फ्रांस से तैयार हालत में आएंगे। शेष 108 विमान तकनीकी हस्तांतरण क्लॉज के तहत देश में ही विकसित होंगे। 

यह विमान देश की सार्वजनिक क्षेत्र की विमान निर्माता कंपनी हिन्दुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड(एचएएल) के सहयोग से तौयार होंगे। लड़ाकू विमान को बनाने का लाइसेंस और तकनीक फ्रांस की कंपनी एचएएल को देगी। विमान के 70 प्रतिशत कलपुर्जे भारत में बनेंगे और 30 प्रतिशत डास्सो एवियेशन के कारखाने में होगा।

इससे पहले रूस के इरकुत कारपोरेश के साथ एचएएल का सुखोई-30 एमकेआई विमानों को तैयार करने का अनुभव रहा है। एचएएल रूस के पांचवी पीढ़ी के लड़ाकू विमानों के निर्माणन क्षेत्र में भारत की तरफ से भागीदार कंपनी के तौर पर शामिल थी। एचएएल ही देश की एकमात्र विमान निर्माता कंपनी है।

भारत की रक्षा खरीद नीति

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भारत की रक्षा खरीद नीति

भारत ने 126 बहुउद्देश्यीय लड़ाकू विमानों की प्रतिस्पिर्धा के दौरान ही सौदे में तकनीकी हस्तांतरण की शर्त को स्पष्ट कर दिया था। इसी को ध्यान में रखकर रक्षा मंत्रालय रक्षा खरीद नीति को मंजूरी दी थी। यूपीए सरकार की पहली रक्षा खरीद नीति को कुछ संशोधनों के साथ स्पष्ट किया गया और इसमें किसी भी रक्षा सौदे के लिए तकनीकी हस्तांतरण को अहम शर्त के तौर पर शामिल किया गया था।

 केन्द्र में सत्ता बदलने के बाद भी नई रक्षा नीति आई। रक्षा मंत्री मनोहर पार्रिकर ने नई रक्षा नीति में मेक इन इंडिया की अवधारणा को मजबूती दी। यहां तक कि सरकार ने रक्षा खरीद नीति, रक्षा क्षेत्र में निवेश को लेकर भी अहम निर्णय लिए।

मई 2014 और इसके बाद

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मई 2014 और इसके बाद

देश में आम चुनाव के बाद मोदी सरकार सत्ता में आई। 10 अप्रैल 2015 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने 126 बहुउद्देश्यीय लड़ाकू विमानों के सौदे वाली पुरानी निविदा को रद्द करते हुए फ्रांस से 36 तैयार हालत में लड़ाकू विमान लेने के सौदे को मंजूरी दी। 

इस तरह से यह सौदा फ्रांस की सरकार, भारत सरकार और फ्रांस की लड़ाकू विमान निर्माता कंपनी डास्सो एवियेशन के बीच तक सीमित रह गया। इस सौदे में से सार्वजनिक क्षेत्र की विमान निर्माता कंपनी हिन्दुस्तान एरोनाटिक्स लिमिटेड बाहर हो गई। भारत में तकनीकी हस्तांतरण के तहत 108 लड़ाकू विमान के निर्माण की प्रक्रिया संबंधी फाइल भी बंद हो गई।

कहां है विवाद

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कहां है विवाद

राफेल लड़ाकू विमान सौदे में पहला विवाद यही है कि एचएएल को बाहर करके निजी क्षेत्र की उद्योगपति अनिल अंबानी के समूह वाली रिलायंस डिफेंस को क्यों डास्सो एवियेशन के माध्यम से शामिल किया गया? अनिल अंबानी के समूह वाली डिफेंस कंपनी कुछ ही समय पहले अस्तित्व में आई थी और उसे विमान निर्माणन के क्षेत्र में उसका स्क्रू बनाने तक का अनुभव नहीं है? फिर इस सौदे में रिलायंस को लाभ पहुंचाने की कोशिश क्यों हुई? यह एक रक्षा सौदे में हुआ घोटाला है।

दूसरा बड़ा विवाद पुरानी निविदा को रद्द करके और उसके स्वरुप को आधार बनाकर किए गए सौदे में विमान की कीमत, लाइफ साइकिल कास्ट, मेंटीनेंस समेत अन्य की अंतिम कीमत क्या है? क्या यह सौदा यूपीए सरकार के समय तय हुई लड़ाकू विमान की कीमत से तीन गुणा तक मंहगा है? क्या सरकार कीमत को लेकर गुमराह कर रही है?

अनिल अंबानी के समूह वाली रिलायंस ने इस मामले में सफाई दी है। उसने कांग्रेस पार्टी पर कंपनी के खिलाफ दुष्प्रचार का आरोप लगाते हुए 5000 करोड़ रुपये के मानिहानि का मुकदमा भी किया है। लेकिन कांग्रेस पार्टी और पूर्व केन्द्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी तथा वकील प्रशांत भूषण अपने आरोपों पर अड़े हैं।

सरकार की सफाई

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सरकार की सफाई

संसद के मानसून सत्र में आए अविश्वास प्रस्ताव के दौरान राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर सीधा हमला बोला था। तब रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने गोपनीयता समझौते का हवाला देते हुए लड़ाकू विमान की कीमत बताने से इनकार कर दिया था। केन्द्र सरकार ने अभी तक लड़ाकू विमान की  अंतिम अधिकारिक कीमत नहीं बताई है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसे भारत और फ्रांस की सरकार के बीच हुआ रक्षा सौदा कहकर टालने की कोशिश की है। 

वह खुद लड़ाकू विमान की कीमत बताने से बचते रहे हैं। सरकार इस सौदे में अलि अंबानी समूह वाले रिलायंस डिफेंस कंपनी के शामिल होने पर कोई अधिकारिक टिप्पणी करने से बच रही है। 18 नवंबर, 2016 को लोकसभा में प्रश्नकाल के दौरान रक्षा राज्यमंत्री ने एक प्रश्न के जवाब में रक्षा राज्य मंत्री डा. सुरेश भामरे ने जानकारी देते हुए बताया कि 23 सितंबर, 2016 को फ्रांस और भारत सरकार के बीच 36 राफेल विमान खरीदने का समझौता किया गया। उन्होंने बताया कि प्रत्येक राफेल विमान की लागत लगभग 670 करोड़ रुपए है और साल 2022 तक सभी राफेल विमानों की सप्लाई कर दी जाएगी

घमासान का नया मुद्दा

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घमासान का नया मुद्दा

सरकार कीमत पर कोई स्पष्ट जानकारी देने से बचते हुए फ्रांस से आने वाले 36 राफेल लड़ाकू विमान को भारतीय जरूरत के हिसाब से तैयार कराए जाने का तर्क दे रही है। सरकार के मंत्रियों का सफाई में कहना है कि इसके चलते लड़ाकू विमान की कीमत में यूपीए के समय में या बाद में तय हुई कीमत में कुछ फर्क संभव है।

वकील प्रशांत भूषण, पूर्व केन्द्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी इसके जवाब में सरकार पर गुमराह करने का आरोप लगाते हैं। वहीं पूर्व रक्षा मंत्री एके एंटनी के अनुसार सरकार झूठ बोलकर भ्रमित कर रही है। वायुसेना के एक पूर्व वायुसेनाध्यक्ष इस विवाद में नहीं पडऩा चाहते, लेकिन उन्हें भी काफी कुछ अटपटा लग रहा है। 

सूत्र का कहना है कि लड़ाकू विमान कहां से, कैसे, किस कीमत पर लेगी यह सरकार तय कर सकती है, लेकिन किस तरह का, किस क्षमता का और किन खूबियों का विमान चाहिए यह तो वायुसेना तय करती है। रक्षा खरीद परिषद और इस बदलाव को मंजूरी देने के लिए एक व्यवस्था भी है। सूत्र का कहना है कि सरकार अपने स्तर पर अचानक इसमें भारतीय जरूरत का निर्धारण करके कुछ नई क्षमता नहीं जोड़ सकती। इसकी एक व्यवस्था है।

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