वोट बैंक: ईसाईयों को 'हिंदुत्व' में लाने की कोशिशों में जुटा संघ, लेकिन झांसी जैसी घटनाओं से हो रहा है नुकसान
- मुस्लिम राष्ट्रीय मंच की तरह 'भारतीय क्रिश्चियन मंच' बनाकर ईसाईयों के बीच पहुंच बना रहा भगवा परिवार
- डॉ. मोहन भागवत कहते हैं कि मुस्लिमों के बिना हिंदुत्व अधूरा है, और हिन्दुस्तान में रहने वाला हर व्यक्ति हिन्दू है
- राम मंदिर निर्माण अभियान से भी जोड़ने की हुई कोशिश, लेकिन झांसी जैसी घटनाओं से इस सोच को पहुंचा नुकसान
विस्तार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के केंद्र की सत्ता पर काबिज होने के बाद देश में कई बार ईसाईयों पर हमले होने की घटनाएं घटीं। कुछ जगहों पर ईसाई धर्म प्रचारकों से दुर्व्यवहार हुआ, तो कुछ मामलों में गिरिजाघरों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की गई। ईसाई संगठनों की कड़ी आपत्ति के बाद भी अभी तक इस तरह की घटनाओं में कोई बड़ी कार्रवाई नहीं की गई। लेकिन झांसी में चार ननों के साथ हुए दुर्व्यवहार की घटना के बाद अचानक यह मामला गरमा गया। केरल के मुख्यमंत्री की अपील पर स्वयं अमित शाह ने इस घटना पर संज्ञान लिया और दोषियों पर कार्रवाई करने की बात कही।
धर्मांतरण बड़ा मुद्दा
प्रथम दृष्टि में अमित शाह की इस तेजी को केरल के विधानसभा चुनाव से जोड़कर देखा जा सकता है, जहां भाजपा अपनी जड़ें जमाने की कोशिश कर रही है। इस तरह के किसी मामले के उठने से भाजपा की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को नुकसान पहुंच सकता है, इसलिए अमित शाह की टिप्पणी को स्वाभाविक माना जा सकता है। लेकिन यह मामला केवल यहीं तक सीमित नहीं है।
आरएसएस के जानकारों का मानना है कि संघ परिवार के सभी संगठन अभी तक ईसाईयों के द्वारा किए जा रहे तथाकथित धर्मांतरण को बड़ा मुद्दा बनाकर पेश करते रहे हैं। वे इसे हिंदुत्व के सामने एक खतरे की तरह पेश करते रहे हैं। संघ के बजरंग दल जैसे आनुषांगिक संगठनों से ईसाईयों के टकराव के पीछे यही सोच काम करती रही है।
लेकिन पिछले कुछ समय से संघ अपने हिंदुत्व की परिभाषा में केवल हिन्दुओं को ही भागीदार नहीं बना रहा है, वह इससे आगे बढ़कर भारतभूमि पर रहने वाले सभी भारतीयों को हिंदुत्व से जोड़ने की कोशिश कर रहा है। अगर आरएसएस के सर संघचालक डॉ. मोहन भागवत यह कहते हैं कि मुस्लिमों के बिना हिंदुत्व अधूरा है, और हिन्दुस्तान में रहने वाला हर व्यक्ति हिन्दू है, तो उसे इसी भावना के विस्तार के रूप में देखा जा सकता है।
इस सोच में अब ईसाईयों को भी शामिल करने की कोशिश की जा रही है। जिस तरह मुस्लिमों को राष्ट्रवादी रंग में रंगने के लिए मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के माध्यम से कोशिशें की जा रही हैं, वैसे ही ‘भारतीय क्रिश्चियन मंच’ बनाकर इसके माध्यम से ईसाईयों तक पहुंचने की कोशिश की जा रही है। कांग्रेस से भाजपा में आये टॉम वडक्कन को इसके अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी देकर ईसाईयों के दिल की खटास कम करने की कोशिश की जा रही है।
हालांकि, यह कोशिश कितनी सफल रहेगी, यह अभी से नहीं कहा जा सकता क्योंकि संघ नेता इन्द्रेश कुमार की लाख कोशिश के बाद भी मुस्लिम राष्ट्रीय मंच अभी तक प्रतिकात्मक संगठन ही बनकर रह गया है। यह मुस्लिम समाज में आरएसएस या भाजपा की स्वीकार्यता बढ़ाने में कोई बड़ी भूमिका निभाने में अभी तक असफल ही रहा है।
राममंदिर अभियान में भी जोड़ने की हुई कोशिश
संघ के एक अन्य वरिष्ठ नेता के मुताबिक राम मंदिर निर्माण के लिए धन संग्रह का अभियान मिजोरम, मणिपुर और नागालैंड जैसे इलाकों में भी चलाया गया जो कि पूरी तरह ईसाई बहुल हैं। कई जगहों पर ईसाईयों की आबादी 98 फीसदी से ऊपर तक है। आश्चर्यजनक रूप से संघ को यहां काफी सफलता मिली और मंदिर निर्माण के लिए इन क्षेत्रों से भी बहुत धन संग्रह किया गया।
संघ के इस नेता के मुताबिक यह समाज के सभी वर्ग को भारत की राष्ट्रीय और सांस्कृतिक सोच से जोड़ने की कोशिश के अंतर्गत ही हुआ। संघ राष्ट्र को मजबूत करने की दिशा में काम करता है और सभी वर्गों के साथ आये बिना यह संभव नहीं है। लिहाजा वह सभी वर्गों में अपनी पहुंच बढ़ा रहा है।
आरएसएस पूरे देश में सबसे ज्यादा केरल में ही अपनी शाखाएं संचालित करता है, लेकिन इसके बाद भी यहां पर वह हिन्दुत्व को एक बड़ी राजनीतिक ताकत बनाने में अभी तक नाकाम रहा है।
संघ के एक वरिष्ठ पदाधिकारी के मुताबिक उनका संगठन राजनीतिक सत्ता हासिल करने के लक्ष्य को लेकर नहीं चल रहा है। अगर यही लक्ष्य हासिल करना होता तो एक-एक विधानसभा में कुछ कार्यकर्ताओं को पांच-दस साल के लिए लगा देना राजनीतिक सत्ता परिवर्तन के लिए बेहद महत्वपूर्ण राजनीतिक परिणाम दे सकता है।
संघ के पदाधिकारी के मुताबिक संघ सामाजिक चेतना जागृत करने में विश्वास रखता है और केरल या ईसाई बहुल राज्यों में उसका यही प्रयास रहा है कि समाज को इस बात के लिए आश्वस्त किया जाये कि उनका लंबे समय का हित किस सोच के साथ संभव है। यह एक लंबी प्रक्रिया है और यही कारण है कि यह कार्य धीरे-धीरे हो रहा है।
यहां हो रही गलती
भाजपा के एक नेता के मुताबिक़, ईसाई समाज से दूरी के कारण बहुत से लोगों के मन में उनके प्रति भी भारी गलतफहमियां हैं, जिसे दूर किये जाने की जरूरत है। ईसाई समुदाय में भी जो रोमन कैथोलिक वर्ग से हैं वे कभी भी धर्मांतरण को प्रोत्साहित नहीं करते। लेकिन जो वर्ग प्रोटेस्टेंट वर्ग से जुड़े हुए हैं, वे अपने स्तर पर कुछ लोगों को खुद से जोड़ने की कोशिश करते रहते हैं। यही वर्ग आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु के इलाकों में सक्रिय है जो अनेक संगठनों को अखर रहा है।
लेकिन जानकारी के अभाव में लोग सभी ईसाईयों को एक साथ रखते हैं और उससे सामाजिक टकराव का रास्ता बन जाता है। अगर लोगों को इस अंतर की जानकारी हो तो इस तरह की किसी भी हिंसा से बचा जा सकता है।
झांसी में हुई यही गलती
जानकारी के मुताबिक़, झांसी की घटना में भी इसी तरह की गलती हुई थी। दिल्ली के सेक्रेड हार्ट कैथेड्रल से जुड़ी चार ननों को धर्मांतरण करने वाला समझने की भूल की गई और उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया। दिल्ली से ओडिशा के राउरकेला जा रही ननों को झांसी में ही उतार दिया गया। इस मामले में सबसे दुर्भाग्यपूर्ण यह रहा कि स्थानीय सुरक्षा बलों ने भी मामले की सच्चाई जानने-समझने की कोशिश नहीं की जिससे यह मामला ज्यादा संवेदनशील हो गया।
ईसाई संगठनों ने किया विरोध
आल इंडिया कैथलिक यूनियन के प्रवक्ता जॉन दयाल ने अमर उजाला से कहा कि इस मामले का सबसे दुखद पहलू यह है कि इतनी बड़ी घटना होने के बाद भी राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ चुप हैं। जब केंद्र और राज्य का प्रमुख इस तरह की घटनाओं पर चुप्पी साध लेता है तो इस तरह की हरकतें करने वालों की हिम्मत बढ़ जाती है।
अगर आरएसएस ईसाईयों को साथ लेने की कोशिश करने के संकेत देता है तो उसे सबसे पहले इस तरह के हमलों को रोकने की कोशिश करनी चाहिए। लेकिन इस तरह का कोई प्रयास होता नहीं दिख रहा है, लिहाजा यह विश्वास करना कठिन है कि आरएसएस ईसाईयों में अपनी पहुंच और स्वीकार्यता बढ़ाने पर गंभीरता से विचार कर रहा है।
केरल में किसकी कितनी भागीदारी
चार करोड़ से कुछ कम आबादी वाला केरल कुल आबादी की दृष्टि से अभी भी हिन्दू बहुल है, जहां इनकी आबादी 54 फीसदी से कुछ ज्यादा है। लेकिन अभी तक यह आबादी आरएसएस-भाजपा की सांस्कृतिक-राजनीतिक सोच से दूर रही है। अनुमान है कि इस वर्ग का एक तिहाई से कुछ अधिक हिस्सा आज भी वामविचारधारा को सपोर्ट करता है तो शेष पर कांग्रेस का प्रभाव है जो इस राज्य में पार्टी की मजबूती का आधार है। लेकिन वामपंथी दल हों या कांग्रेस, यहां उनकी राजनीतिक सफलता 26 फीसदी से अधिक आबादी वाले मुस्लिम समुदाय के समर्थन पर टिकी रही है। उत्तर केरल में मुस्लिम बहुल इलाकों में अकेले मुस्लिम मतदाता ही किसी भी राजनीतिक दल की जीत या हार तय करते हैं, तो मध्य केरल में वे हिन्दुओं के वोटों के साथ मिलकर निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
केरल में ईसाईयों की आबादी 18 फीसदी से कुछ अधिक है, लेकिन ये उत्तर केरल को छोड़कर पूरे केरल में बिखरी हुई है। इसलिए ये वर्ग केरल की ज्यादातर सीटों पर जिसके पक्ष में मुड़ जाए, निर्णायक भूमिका निभाता है। वहीं, राज्य का दक्षिण का हिस्सा हिन्दू बहुल आबादी वाला है जहां भाजपा को लंबे समय में कुछ संभावना बन सकती है, लेकिन इसके लिए अभी लंबा इंतज़ार करना होगा।