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रणनीति: अब बन रहा है लेखकों, रचनाकारों और संस्कृतिकर्मियों का ‘संयुक्त मोर्चा’, जानिए क्या है मामला

Thu, 23 Dec 2021 04:35 PM IST
Atul sinha अतुल सिन्हा
Updated Thu, 23 Dec 2021 04:35 PM IST
सार

प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष विभूति नारायण राय कहते हैं कि लेखकों और साहित्यकारों को अपने रचनाकर्म और प्रतिरोध के साहित्य सृजन के जरिये लोगों तक अपनी बात असरदार ढंग से ले जानी चाहिए।

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Now A United Front of writers creators and cultural workers is being formed Latest News Update
सांकेतिक तस्वीर।

विस्तार

आगामी चुनावों के मद्देनज़र अब साहित्य और संस्कृति जगत के कुछ संगठन भी लोगों को जागरूक करने और सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ गोलबंदी के लिए अपनी अपनी रणनीति बना रहे हैं। खासकर प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच जैसे वामपंथी रूझानों वाले संगठन अपने साहित्यिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों और प्रस्तुतियों के जरिए ये अभियान चला रहे हैं।

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प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष विभूति नारायण राय कहते हैं कि लेखकों और साहित्यकारों को अपने रचनाकर्म और प्रतिरोध के साहित्य सृजन के जरिये लोगों तक अपनी बात असरदार ढंग से ले जानी चाहिए। इसके लिए दिल्ली समेत ज्यादातर शहरों में ऐसे साहित्यिक आयोजन करने की योजना है जिसमें सत्ता के सांप्रदायिक और अमानवीय चेहरे को सामने लाने वाले साहित्य को मंच मिल सके और उसका प्रचार प्रसार हो सके। उनका कहना है कि कुछ लेखक और साहित्यकार अभी भी खुलकर बोलने में हिचक रहे हैं और सामने आने में उन्हें कोई न कोई डर रोक लेता है। ऐसे में उन पर बहुत दबाव डालने से बेहतर है कि वह जिस सीमा तक भी अपना प्रतिरोध दर्ज कर सकते हैं, उन्हें उसके लिए तैयार किया जाए।
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जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और कवि कौशल किशोर कहते हैं कि जब भी देश पर सांस्कृतिक हमले तेज हुए और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कटघरे में आई या सत्ता का जनविरोधी और सांप्रदायिक चेहरा सामने आया, लेखकों और संस्कृतिकर्मियों ने अपने सामाजिक दायित्व को समझा है। ये अभियान लगातार जारी है और अब प्रतिरोध के साहित्य और इस आंदोलन को एक बड़े फलक पर ले जाने की सख्त जरूरत है। आगामी विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए आने वाले 30 जनवरी यानी महात्मा गांधी की पुण्यतिथि से लेकर भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की शहादत दिवस यानी 23 मार्च तक लखनऊ, इलाहाबाद, गोरखपुर, वाराणसी, आजमगढ़ समेत प्रमुख शहरों में लेखकों के सम्मेलन और विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। ये बहस भी तेज हुई है कि जिस तरह जाने माने साहित्यकार अमृत राय ने अपने दौर में लेखकों के संयुक्त मोर्चे की बात की थी और इस पर एक किताब भी लिखी थी, आज उस संयुक्त मोर्चे को किस रूप में खड़ा किया जा सकता है।  
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पिछले दिनों दिल्ली में कवि मंगलेश डबराल और रघुवीर सहाय की स्मृति में आयोजित एक कार्यक्रम में तीनों संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ तमाम लेखकों, रंगकर्मियों और रचनाकारों ने एक प्रस्ताव पास कर प्रतिरोध के साहित्य और संस्कृति को आगे बढ़ाने और पूरे देश में फैलाने का संकल्प लिया। इसमें अशोक वाजपेयी, रामशरण जोशी, असगर वजाहत, अशोक भौमिक, विभूतिनारायण राय, विष्णु नागर, इब्बार रब्बी, विमल कुमार, राजेश कुमार समेत सौ से ज्यादा रचनाकार शामिल थे। इस अभियान में इन तीनों संगठनों के अलावा दलित लेखक संघ और दलित लेखिका संघ जैसे संगठन भी हिस्सा ले रहे हैं। कवि और आलोचक अशोक वाजपेयी ने इस मौके पर ‘प्रतिरोध पूर्वज’ नाम की एक पुस्तिका भी निकाली है जिसमें सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, रामधारी सिंह दिनकर, अज्ञेय, मुक्तिबोध, शमशेर बहादुर सिंह, नागार्जुन, शमशेर से लेकर वीरेन डंगवाल और गोरख पांडेय जैसे 22 कवियों की प्रतिरोध कविताएं शामिल की गई हैं।

इन संगठनों ने आगे की रूपरेखा तय करने और इस साझा मंच को कोई नाम देने की पहल शुरु कर दी है, इसकी बैठकें हो रही हैं और आगामी चुनाव को ध्यान में रखकर सांस्कृतिक जन चेतना जगाने का काम भी शुरु हो गया है। जल्दी ही इसका विस्तृत कार्यक्रम घोषित किया जाएगा।

कवि विमल कुमार कहते हैं कि ये अवधारणा गलत है कि लेखकों के इस मोर्चे का मकसद सिर्फ मोदी या भाजपा विरोध है। पहले भी कांग्रेस की निरंकुश सरकारों के खिलाफ ये अभियान चलाए जाते रहे हैं। दरअसल इस प्रतिरोध का मतलब किसी खास पार्टी का विरोध नहीं, बल्कि सत्ता के जनविरोधी चरित्र और चेहरे का विरोध है।  


रामशरण जोशी बने प्रलेस दिल्ली के अध्यक्ष
वरिष्ठ पत्रकार और लेखक रामशरण जोशी को प्रगतिशील लेखक संघ की दिल्ली इकाई का अध्यक्ष बनाया गया है। इससे पहले विभूति नारायण राय के पास ये जिम्मेदारी थी। अब उनके राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद ये ज़िम्मेदारी रामशरण जोशी को सौंपी जा रही है। रामशरण जोशी का कहना है कि आने वाले दिनों में दिल्ली समेत देशभर के जनपक्षधर रचनाकारों और पत्रकारों को साथ लाने के लिए प्रगतिशील लेखक संघ तमाम सहयोगी संगठनों के साथ मिलकर कई अभियान चलाएगा। उनका कहना है कि जो भी लेखक जिस सीमा तक भी सत्ता के इस चेहरे का विरोध कर सकता है, उसे आगे आना चाहिए।

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