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Jayant Narlikar Passes Away: प्रसिद्ध खगोल वैज्ञानिक जयंत नार्लीकर नहीं रहे, 87 वर्ष की उम्र में ली अंतिम सांस

Tue, 20 May 2025 11:19 AM IST
अभिषेक दीक्षित पीटीआई, मुंबई
पीटीआई, मुंबई Published by: अभिषेक दीक्षित Updated Tue, 20 May 2025 11:19 AM IST
सार

डॉ. नार्लीकर का मंगलवार सुबह नींद में ही निधन हो गया। हाल ही में शहर के एक अस्पताल में उनके कूल्हे की सर्जरी हुई थी। उनके परिवार में तीन बेटियां हैं।

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Noted astrophysicist Jayant Narlikar passes away at 87 Latest News Update
Jayant Narlikar - फोटो : X/ONGC_

विस्तार

डॉ. जयंत विष्णु नार्लीकर अब हमारे बीच नहीं रहे। वे प्रख्यात खगोल वैज्ञानिक और विज्ञान संचारक थे। उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था। डॉ. जयंत विष्णु नार्लीकर ने मंगलवार को पुणे में अंतिम सांस ली। वे 87 वर्ष के थे। भारतीय विज्ञान के क्षेत्र में एक महान हस्ती डॉ. नार्लीकर को ब्रह्मांड विज्ञान में उनके अग्रणी योगदान, विज्ञान को लोकप्रिय बनाने के उनके प्रयासों और देश में प्रमुख शोध संस्थानों की स्थापना के लिए व्यापक रूप से जाना जाता था। 

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पारिवारिक सूत्रों के मुताबिक, डॉ. नार्लीकर का मंगलवार सुबह नींद में ही निधन हो गया। हाल ही में शहर के एक अस्पताल में उनके कूल्हे की सर्जरी हुई थी। उनके परिवार में तीन बेटियां हैं। 19 जुलाई 1938 को जन्मे डॉ. नार्लीकर ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के परिसर में पूरी की। उनके पिता विष्णु वासुदेव नार्लीकर प्रोफेसर और गणित विभाग के प्रमुख थे। वे उच्च शिक्षा के लिए कैम्ब्रिज चले गए, जहां वे गणितीय ट्रिपोस में रैंगलर और टायसन पदक विजेता बने। 
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डॉ. जयंत विष्णु नार्लीकर के बारे में जानिए

  • वे टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (1972-1989) में शामिल होने के लिए भारत लौट आए, जहां उनके नेतृत्व में सैद्धांतिक खगोल भौतिकी समूह का विस्तार हुआ और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनी।
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  • 1988 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने डॉ. नार्लीकर को प्रस्तावित अंतर-विश्वविद्यालय खगोल विज्ञान और खगोल भौतिकी केंद्र (IUCAA) के संस्थापक निदेशक के रूप में स्थापित करने के लिए आमंत्रित किया।
  • उन्होंने 2003 में अपनी सेवानिवृत्ति तक IUCAA के निदेशक का पद संभाला। उनके निर्देशन में IUCAA ने खगोल विज्ञान और खगोल भौतिकी में शिक्षण और अनुसंधान में उत्कृष्टता के केंद्र के रूप में दुनिया भर में ख्याति प्राप्त की है। वे IUCAA में एमेरिटस प्रोफेसर थे।
  • 2012 में थर्ड वर्ल्ड एकेडमी ऑफ साइंसेज ने विज्ञान में उत्कृष्टता के केंद्र की स्थापना के लिए डॉ. नार्लीकर को अपना पुरस्कार दिया।


2004 में पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया
डॉ. नार्लीकर अपनी पुस्तकों, लेखों और रेडियो, टीवी कार्यक्रमों के माध्यम से एक विज्ञान संचारक के रूप में प्रसिद्ध थे। वे अपनी विज्ञान कथा कहानियों के लिए भी जाने जाते हैं। इन सभी प्रयासों के लिए उन्हें 1996 में यूनेस्को द्वारा लोकप्रिय विज्ञान कार्यों के लिए कलिंग पुरस्कार से सम्मानित किया गया। डॉ. नार्लीकर को 1965 में 26 वर्ष की छोटी उम्र में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। 2004 में उन्हें पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया और 2011 में महाराष्ट्र सरकार ने उन्हें राज्य के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार महाराष्ट्र भूषण से सम्मानित किया। 2014 में भारत की प्रमुख साहित्यिक संस्था साहित्य अकादमी ने क्षेत्रीय भाषा (मराठी) लेखन में अपने सर्वोच्च पुरस्कार के लिए उनकी आत्मकथा का चयन किया।

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