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सरकार से पूछिए राहत के पैकेज में उसने अपने हिस्से से कितना करोड़ दिया: सीआईआई

Wed, 13 May 2020 09:03 PM IST
Harendra Chaudhary शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Wed, 13 May 2020 09:03 PM IST
सार

  • कर्ज लो, आगे बढ़ो, राहत नहीं सहयोग पैकेज है
  • थोड़ा वेतन और पहले के लोन का भार उतारने में सहयोग कर देती सरकार तो अच्छा था
  • एमएसएमई पैकेज 1.0 की घोषणा का स्वागत नहीं कर रहा है

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North India CII life sciences Head Dinesh dua asked How much crore did govt give from his share in the package of relief
nirmala-sitaraman - फोटो : file

विस्तार

प्रधानमंत्री ने 20 लाख करोड़ के राहत पैकेज की घोषणा की, वित्त मंत्री पैकेज 1.0 को लेकर आई और उन्होंने लोन का मेला लगा दिया। नार्थ इंडिया सीआईआई लाइफ साइंसेज कमेटी के अध्यक्ष दिनेश दुआ का कहना है कि यह तो वहीं हाल हुआ, पहाड़ खोदा और चुहिया भी नहीं निकली।

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मुझे तो समझ में नहीं आ रहा है कि इसमें एमएसएमई के लिए क्या है? कौन सी राहत है? एमएसएमई की परिभाषा बदलने की मांग भी तो पुरानी है। उसका कोविड-19 से क्या लेना देना?
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सरकार बताए कि 15 हजार तक का वेतन पाने वालों के नियोक्ता और कर्मचारी का छह माह का पीएफ का हिस्सा देने के सिवा उसकी फूटी कौड़ी कहां खर्च हो रही है। यह तो समझ में नहीं आ रहा है कि कैसा राहत पैकेज है। एमएसएमई को 45 दिन में भुगतान जरूर अच्छी बात है।
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सरकार ने सड़क, रेल तमाम, रियल एस्टेट निर्माण क्षेत्र में लगे लोगों, कंपनियों को छह माह का समय बढ़ा दिया, आखिर यह कौन सी राहत है? सरकार ने एनबीएफसी को 30 हजार करोड़ रुपये देने की बात कही है, ठीक है।

लेकिन इससे भी लोग कर्ज ही लेंगे, लौटाएंगे। डिस्कॉम पहले से कर्ज में डूबा है, उसे 90 हजार करोड़ का कर्ज देकर सरकार और बोझिल बना रही है।

राहत नहीं सहयोग पैकेज है

एमएसएमई इंटरप्राइजेज के अनिल भारद्वाज का कहना है कि सरकार ने लंबी चौड़ी घोषणा की है, लेकिन पूछिए इसमें से कितने करोड़ वह अपने हिस्से दे रही है। भारद्वाज का कहना है कि लोन तो बैंक देगा, कर्ज सूक्ष्म, लघु, मझोले उद्योग चुकाएंगे। वह भी ब्याज के साथ। कर्ज के ब्याज में भी कोई कमी तो हुई नहीं है। यह तो राहत नहीं, सहयोग पैकेज है। 

सरकार ने बस कर्ज को उदार बनाया है

अनिल भारद्वाज का कहना है कि केंद्र सरकार ने एक ही संदेश दिया है कि कर्ज लो और खुद को पुनर्जीवित करो। पूरी घोषणा में एमएसएमई के लिए तीन लाख करोड़ का कर्ज ही सबसे बड़ी है। सरकार इसके लिए क्रेडिट गारंटी फंड बनाएगी। लेकिन लोन तो बैंक देंगे।

इसे चार साल में ब्याज के साथ लौटाना होगा। फंड ऑफ फंड की घोषणा की है। यह भी यही है। इसमें सरकार की जेब से क्या गया? इसमें राहत की बात केवल इतनी है कि लॉकडाउन के बाद कंपनियों के पास अपना कामकाज शुरू करने, लोगों को सैलरी देने की चुनौती है।

केंद्र सरकार ने यहां रास्ता दिखाया है कि कर्ज लेकर इसे वे पूरा करें। जिस तरह की स्थिति उत्पन्न हुई है, उसमें एमएसएमई के पास कर्ज लेने के सिवा कोई चारा नहीं है। क्योंकि कामकाज तो करना है।

जहां तक प्रश्न 200 करोड़ रुपये के ग्लोबल टेंडर न जारी करने का है तो अधिकांश क्षेत्रों में ऐसा नहीं होता था। कुछ विशेष क्षेत्र में ऐसा हुआ होगा, लिहाजा सरकार ने यह कदम उठाया है। लेकिन अधिकारी यदि चाहेंगे तो दो टेंडर इनकारपोरेट करके इसे 200 करोड़ से ज्यादा बना देंगे।

थोड़ा बोझ सह लेती सरकार

दिनेश दुआ और अनिल भारद्वाज दोनों का कहना है कि मुख्य मांग दो थी। पहली यह कि सरकार एमएसएमई कर्मचारियों के वेतन का भार झेल ले, दूसरा जो कर्ज पहले चल रहा है, उसमें राहत दे दे।

कम ब्याज पर कर्ज उपलब्ध कराए। यह नहीं हो पाया। जबकि अमेरिका, यूरोप समेत दुनिया के देशों ने इसी तरह की पहल की है। उन्होंने अपने देश के कर्मचारियों का छह महीने तक का 70-80 फीसदी तक वेतन का भार वहन किया है।



सरकार ने 15 हजार रुपया वेतन पाने वाले लोगों का कर्मचारी और नियोक्ता का पीएफ पहले तीन महीने तक जमा कराने की जिम्मेदारी ली थी, अब इसे बढ़ाकर छह महीना कर दिया। बस इसी मद में जो खर्च होगा, वह सरकार के खाते से जाएगा।

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