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कौन है ट्विन टावर का मालिक?: आखिर किन लोगों ने लड़ी उसके खिलाफ लड़ाई, यहां जानें ऐसे ही 10 सवालों का जवाब

Sun, 28 Aug 2022 07:50 PM IST
प्रांजुल श्रीवास्तव न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: प्रांजुल श्रीवास्तव Updated Sun, 28 Aug 2022 07:50 PM IST
सार

ट्विन टावर का अवैध रूप से निर्माण करने में बिल्डर और नोएडा प्राधिकरण के कर्मचारियों द्वारा नियमों की जितनी अनदेखी की गई, उतनी ही बड़ी लड़ाई बिल्डर के खिलाफ आम नागरिकों को लड़नी पड़ी।

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Noida Twin Towers Demolition Who Is Owner of Twin Towers and Who Fought Against Him Know 10 Questions Here
सुपरटेक के मालिक आरके अरोड़ा - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

नोएडा के सेक्टर 93ए में स्थित सुपरटेक ट्विन टावर जमींदोज हो चुके हैं। दोपहर ठीक 2:30 बजे तेज धमाके के साथ 32 मंजिला पूरी इमारत मिट्टी में मिल गई। इस गगनचुंबी इमारत को ढहने में महज आठ सेकेंड का वक्त लगा। भ्रष्टाचार की नींव पर खड़ी इस इमारत के निर्माण में बिल्डर और नोएडा प्राधिकरण के कर्मचारियों द्वारा नियमों की जितनी अनदेखी की गई, उतनी ही बड़ी लड़ाई बिल्डर के खिलाफ आम नागरिकों को लड़नी पड़ी। आखिर कौन हैं ये आम लोग? कौन है ट्विन टावर का मालिक? और क्या है ट्विन टॉवर का इतिहास? ऐसे ही 10 सवालों का यहां जानें जवाब... 

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पहले जानिए ट्विन टावर का इतिहास

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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : ANI

कहानी 23 नंवबर 2004 से शुरू होती है। जब नोएडा अथॉरिटी ने सेक्टर-93ए स्थित प्लॉट नंबर-4 को एमराल्ड कोर्ट के लिए आवंटित किया। आवंटन के साथ ग्राउंड फ्लोर समेत 9 मंजिल के 14 टावर बनाने की अनुमति मिली।

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कब-कब बढ़ाई गई टॉवरों की ऊंचाई?

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ट्विन टावर गिरने के बाद कुछ यूं उठा धुएं का गुब्बार। - फोटो : अमर उजाला

जमीन आवंटन के दो साल बाद 29 दिसंबर 2006 को अनुमति में संशोधन कर दिया गया। नोएडा अथॉरिटी ने संशोधन करके सुपरटेक को नौ की जगह 11 मंजिल तक फ्लैट बनाने की अनुमति दे दी। इसके साथ ही टावरों की संख्या भी बढ़ाई गई। पहले 15 और फिर इनकी संख्या 16 हुई। 2009 में इसमें फिर से इजाफा किया गया। 26 नवंबर 2009 को नोएडा अथॉरिटी ने फिर से 17 टावर बनाने का नक्शा पास कर दिया। इसके बाद भी ये अनुमति लगातार बढ़ती गई। 

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अब जानिए कौन है ट्विन टावर का मालिक?

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Twin Tower - फोटो : अमर उजाला

एमराल्ड कोर्ट परियोजना में बने ट्विन टावरों को बनाने वाली कंपनी सुपरटेक लिमिटेड है। यह एक गैर-सरकारी कंपनी है। इस कंपनी को सात दिसंबर, 1995 में निगमित किया गया था। सुपरटेक के फाउंडर आरके अरोड़ा हैं। उन्होंने अपनी 34 कंपनियां खड़ी की हैं। 1999 में आरके अरोड़ा की पत्नी संगीता अरोड़ा ने दूसरी कंपनी सुपरटेक बिल्डर्स एंड प्रमोटर्स प्राइवेट लिमिटेड नाम से कंपनी शुरू की। 

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12 शहरों में लांच किए प्रोजेक्ट 

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ट्विन टावर्स ध्वस्त - फोटो : ANI

सुपरटेक ने अब तक नोएडा, ग्रेटर नोएडा, मेरठ, दिल्ली-एनसीआर समेत देशभर के 12 शहरों में रियल स्टेट प्रोजेक्ट लांच किए हैं। नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल ने इसी साल कंपनी को दिवालिया घोषित कर दिया। कंपनी पर अभी करीब 400 करोड़ का कर्ज बकाया है। 


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कब शुरू हुआ खेल?

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ट्विन टावर - फोटो : अमर उजाला

दो मार्च, 2012 को टावर नंबर 16 और 17 के लिए फिर से संशोधन किया गया। इन दोनों टावरों को 40 मंजिल तक करने की अनुमति दी गई। इनकी ऊंचाई 121 मीटर तय कर दी गई। वहीं दोनों टावरों के बीच की दूरी भी नौ मीटर रखी गई, जबकि यह 16 मीटर से कम नहीं होनी चाहिए। 
 

और कहां हुई नियमों की अनदेखी? 

सुपरटेक को 13.5 एकड़ जमीन आवंटित की गई थी। परियोजना का 90 फीसदी यानी करीब 12 एकड़ हिस्से पर 2009 में ही निर्माण पूरा कर लिया गया था। 10 फीसदी हिस्से को ग्रीन जोन दिखाया गया। 2011 आते-आते दो नए टावरों के बनने की खबरें आने लगीं। 12 एकड़ में जितना निर्माण किया गया, उतना एफएआर का खेल खेलकर दो गगनचुंबी इमारतों के जरिये 1.6 एकड़ में ही करने का काम तेजी से जारी था। अंदाजा लगाया जा सकता है कि 12 एकड़ में 900 परिवार रह रहे हैं, इतने ही परिवार 1.6 एकड़ में बसाने की तैयारी थी। 


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किन लोगों ने लड़ी लड़ाई?

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नोएडा ट्विन टावर - फोटो : amar ujala

फ्लैट बायर्स ने 2009 में आरडब्ल्यू बनाया। इसी आरडब्ल्यू ने सुपरटेक के खिलाफ कानूनी लड़ाई की शुरुआत की। ट्विन टावर के अवैध निर्माण को लेकर आरडब्ल्यू ने पहले नोएडा अथॉरिटी मे गुहार लगाई। अथॉरिटी में कोई सुनवाई नहीं होने पर आरडब्ल्यू इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा। 2014 में हाईकोर्ट ने ट्विन टावर तोड़ने का आदेश जारी किया। इस लड़ाई में यूबीएस तेवतिया, एसके शर्मा, रवि बजाज, वशिष्ठ शर्मा, गौरव देवनाथ, आरपी टंडन, अजय गोयल ने अग्रणी भूमिका निभाई।

सुप्रीम कोर्ट में क्यों पहुंचा मामला?

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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : Social media

इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुपरटेक सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया। सुप्रीम कोर्ट में सात साल चली लड़ाई के बाद 31 अगस्त 2021 को सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को बरकार रखा। सुप्रीम कोर्ट ने तीन महीने के अंदर ट्विन टावर को गिराने का आदेश दिया। 


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कैसे जमीदोंज हुए ट्विन टावर?

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सुपरटेक - फोटो : Social media

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर सेक्टर-93ए स्थित सुपरटेक एमराल्ड कोर्ट के ट्विन टावर को गिराने के लिए इसमें 3700 किलो विस्फोटक लगाया गया था। इमारत से करीब 70 मीटर दूर रिमोट रखा गया था। दोपहर ठीक 2:30 बजे रिमोट की बटन दबाई गई और तेज धमाके के साथ पूरी इमारत मिट्टी में मिल गई। इसके बाद कई मीटर तक धूल का गुबार छा गया। 

टावर गिराने में कितना आया खर्च?

200 करोड़ से ज्यादा की लागत में बने ट्विन टावर्स को गिराने में करीब 20 करोड़ का खर्च आने की बात कही जा रही है। यह रकम भी बिल्डर्स से ही वसूली जाएगी। मौजूदा समय में इमारत की कीमत करीब 800 करोड़ रुपये आंकी गई थी। 


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पूरे मामले पर सुपरटेक ने क्या कहा?

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सुपरटेक का बयान - फोटो : अमर उजाला

ट्विन टावर मामले पर सुपरटेक का बयान आया है। बयान में कहा गया है कि प्राधिकरण को पूरा भुगतान करने के बाद हमने टावर का निर्माण किया था। हालांकि, माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने तकनीकी आधार पर निर्माण को संतोषजनक नहीं पाया है और दोनों टावरों को ध्वस्त करने के आदेश जारी किए। हम सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का सम्मान करते हैं। हमने करीब 70000 से अधिक लोगों फ्लैट्स तैयार करके दे दिए हैं। बाकी लोगों को भी निर्धारित समय में फ्लैट देने के लिए प्रतिबद्ध हैं। 

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