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जब तक चाइल्ड ट्रैफिकिंग नहीं रुकेगी, देश सुरक्षित नहीं होगा- कैलाश सत्यार्थी
amarujala.com: presented by-पूजा मेहरोत्रा
Updated Tue, 14 Nov 2017 11:33 AM IST
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kailash satyarthi
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नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित श्री कैलाश सत्यार्थी जानेमाने बाल अधिकार कार्यकर्ता हैं। उनका मानना है कि बच्चों का बचपन सुरक्षित कर ही हम सुरक्षित भारत का निर्माण कर सकते हैं। वे नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की तर्ज पर नेशनल चिल्ड्रन ट्रिब्यूनल बनाने की मांग कर रहे हैं। पूजा मेहरोत्रा ने बच्चों से संबंधित विभिन्न मुद्दों पर श्री कैलाश सत्यार्थी से बातचीत की। यहां प्रस्तुत है बातचीत के प्रमुख अंशः
सवाल- हमारे देश में बच्चों के प्रति किस-किस तरह की हिंसा हो रही है?
भारत में आज कोई ऐसा दिन नहीं जाता, जब मीडिया में छोटे और सामूम बच्चों के साथ हो रहे बलात्कार की खबरे न आती हों। पड़ोसी, रिश्तेदार, शिक्षक और डॉक्टर ही नहीं, पिता तक 7-8 साल की बच्चियों से दुराचार करने का पाप कर रहे हैं। छेड़खानी और यौन उत्पीड़न का संताप तो करोड़ों बच्चे भोग रहे हैं। हर एक घंटे में दो बच्चों के साथ बलात्कार होता है तो दो बच्चे यौन शोषण के शिकार होते हैं। बडे पैमाने पर बच्चे गायब हो रहे हैं। जानवरों से भी कम कीमत पर बच्चे खरीदे और बेचे जा रहे हैं।
हर दिन 10 बच्चे ट्रैफिकिंग के शिकार हो रहे हैं। उन्हें बाल मजदूरी और वेश्यावृत्ति के लिए खरीदा-बेचा जाता है। इधर कुछ वर्षों से बच्चों के खिलाफ यौन हिंसा में तेजी से बढ़ोत्तरी हुई है। यह समाज में महामारी की तरह फैल रही है। बचपन को सुरक्षित किए बिना हम भारत को सुरक्षित नहीं बना सकते। इसके खिलाफ एक महायुद्ध की जरूरत है। जिसकी शुरुआत हमने भारत यात्रा के जरिए कर दी है। बाल यौन हिंसा और ट्रैफिकिंग के खिलाफ लोगों को जागरुक करने के लिए हमने देशव्यापी भारत यात्रा का आयोजन किया था।
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11 सितंबर, 2017 को कन्याकुमारी से शुरू हुई यह यात्रा 22 राज्यों से गुजरते हुए 12 हजार किलोमीटर की दूरी तय कर 16 अक्टूबर, 2017 को दिल्ली में समाप्त हुई। इस यात्रा में लाखों लोग मेरे साथ सड़कों पर उतरे। इस यात्रा के जरिए हमने आम लोगों के साथ-साथ राजनेताओं, धर्मगुरुओं, जजों और पुलिसवालों का ध्यान बच्चों के इस संवेदनशील मुद्दे की तरफ आकर्षित करने की कोशिश की। जिसमें हम कामयाब रहे।
सवाल- बाल शोषण और बाल मजदूरी को लेकर सरकारें कितनी गंभीर हैं?
देखिए, हमारे देश में बाल हिंसा के खिलाफ ढेर सारे कानून हैं। लेकिन सवाल उनके क्रियान्वयन का है। पुलिस को बच्चों के प्रति संवेदनशील बनाने की जरूरत है। हम चाइल्ड फ्रेंडली पुलिस स्टेशन और कोर्ट बनाने की मांग कर रहे हैं। पीड़ितों और गवाहों की सुरक्षा की मांग कर रहे हैं। भारत यात्रा के दौरान मैं ढेर सारे नेताओं, मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और जजों से मिला। उनके सामने अपनी मांगें भी रखीं। मुझे खुशी है कि तकरीबन सभी लोगों से मुझे अच्छा रिस्पांस मिला।
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सवाल- हमारे देश में बच्चों के प्रति किस-किस तरह की हिंसा हो रही है?
भारत में आज कोई ऐसा दिन नहीं जाता, जब मीडिया में छोटे और सामूम बच्चों के साथ हो रहे बलात्कार की खबरे न आती हों। पड़ोसी, रिश्तेदार, शिक्षक और डॉक्टर ही नहीं, पिता तक 7-8 साल की बच्चियों से दुराचार करने का पाप कर रहे हैं। छेड़खानी और यौन उत्पीड़न का संताप तो करोड़ों बच्चे भोग रहे हैं। हर एक घंटे में दो बच्चों के साथ बलात्कार होता है तो दो बच्चे यौन शोषण के शिकार होते हैं। बडे पैमाने पर बच्चे गायब हो रहे हैं। जानवरों से भी कम कीमत पर बच्चे खरीदे और बेचे जा रहे हैं।
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हर दिन 10 बच्चे ट्रैफिकिंग के शिकार हो रहे हैं। उन्हें बाल मजदूरी और वेश्यावृत्ति के लिए खरीदा-बेचा जाता है। इधर कुछ वर्षों से बच्चों के खिलाफ यौन हिंसा में तेजी से बढ़ोत्तरी हुई है। यह समाज में महामारी की तरह फैल रही है। बचपन को सुरक्षित किए बिना हम भारत को सुरक्षित नहीं बना सकते। इसके खिलाफ एक महायुद्ध की जरूरत है। जिसकी शुरुआत हमने भारत यात्रा के जरिए कर दी है। बाल यौन हिंसा और ट्रैफिकिंग के खिलाफ लोगों को जागरुक करने के लिए हमने देशव्यापी भारत यात्रा का आयोजन किया था।
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11 सितंबर, 2017 को कन्याकुमारी से शुरू हुई यह यात्रा 22 राज्यों से गुजरते हुए 12 हजार किलोमीटर की दूरी तय कर 16 अक्टूबर, 2017 को दिल्ली में समाप्त हुई। इस यात्रा में लाखों लोग मेरे साथ सड़कों पर उतरे। इस यात्रा के जरिए हमने आम लोगों के साथ-साथ राजनेताओं, धर्मगुरुओं, जजों और पुलिसवालों का ध्यान बच्चों के इस संवेदनशील मुद्दे की तरफ आकर्षित करने की कोशिश की। जिसमें हम कामयाब रहे।
सवाल- बाल शोषण और बाल मजदूरी को लेकर सरकारें कितनी गंभीर हैं?
देखिए, हमारे देश में बाल हिंसा के खिलाफ ढेर सारे कानून हैं। लेकिन सवाल उनके क्रियान्वयन का है। पुलिस को बच्चों के प्रति संवेदनशील बनाने की जरूरत है। हम चाइल्ड फ्रेंडली पुलिस स्टेशन और कोर्ट बनाने की मांग कर रहे हैं। पीड़ितों और गवाहों की सुरक्षा की मांग कर रहे हैं। भारत यात्रा के दौरान मैं ढेर सारे नेताओं, मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और जजों से मिला। उनके सामने अपनी मांगें भी रखीं। मुझे खुशी है कि तकरीबन सभी लोगों से मुझे अच्छा रिस्पांस मिला।
लोगों के दिलों में बच्चों के प्रति करुणा पैदा करें
नोबेल विजेता कैलाश सत्यार्थी
सवाल- सिविल सोसायटी बाल शोषण की रोकथाम में क्या योगदान दे रहे हैं?
सिविल सोसायटी का बड़ा महत्वपूर्ण योगदान है। लोकतंत्र में दबाव समूहों की बड़ी भूमिका होती है। सिविल सोसायटी ऐसा ही दबाब समूह होता है। भारत यात्रा के दौरान हमारे साथ देशभर के सैकड़ों गैरसरकारी संस्थाएं जुड़ी थीं। बच्चों के सवाल को आज हम घर-घर तक ले जा पाए, तो इसमें उनकी भी भूमिका है। वे अपने- अपने स्तर पर अच्छा काम कर रहे हैं।
सवाल- यौन शोषण को कम करने के लिए कानून ज्यादा कारगर होंगे, धार्मिक चीजें या फिर नैतिक आग्रह?
इस बुराई को खत्म करने का नैतिक आग्रह एक कारगर तरीका हो सकता है। यौन शोषण हमारे समाज में महामारी की तरह फैल रहा है। मैं इसे अनैतिकता की महामारी कहता हूं। हमारा समाज नैतिक रूप से बड़ा ही सबल रहा है। लेकिन हाल के दिनों में इसमें तेजी से गिरावट आई है। हमें लोगों में नैतिक मूल्य पैदा करने होंगे। इसमें धर्मगुरुओं की महत्वपूर्ण भूमिका है।
मैंने भारत यात्रा के दौरान सभी संप्रदाय के धर्मगुरुओं को एक मंच पर इकठ्ठा किया और उनसे अपील की वे न केवल धर्मस्थलों को बच्चों के लिए सबसे सुरक्षित स्थान बनाए, बल्कि लोगों के दिलों में बच्चों के प्रति करुणा पैदा करें। लोगों के दिलों में बच्चों के प्रति करुणा पैदा कर ही इस अनैतिक महामारी को खत्म कर सकते हैं।
सवाल- हिंसा मुक्त बचपन कैसे हो सकता है?
कानून और अदालतों की अपनी अहमियत है। सख्त कानून और अदालतों की सक्रियता से जाहिर है बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों पर काफी हद तक रोक लगेगी। लेकिन हमें इससे ऊपर उठ कर इस समस्या का दीर्घकालीन समाधान ढूढ़ना होगा। मुझे लगता है कि हर इंसान के दिल में बच्चों के लिए प्यार होता है, उनके लिए करुणा होती है।
इसलिए हम लोगों के दिलों में बच्चों के प्रति करुणा पैदा कर इस समस्या का स्थाई समाधान कर सकते हैं। भारत तो करुणा की धरती रही है। वसुधैव कुटुम्बकम् की धरती से लोगों के दिलों में बच्चों के प्रति करुणा पैदा करने की आवाज उठनी चाहिए। इसीलिए मैं करुणा के भूमंडलीकरण की बात करता हूं। पश्चिम ने हमें बाजार दिया है, जिसने हिंसा को बढ़ाया है। हम लोगों में करुणा का भाव पैदा कर दुनिया को सभी तरह की हिंसा से मुक्त कर सकते हैं।
दूसरी बात मुझे युवाओं पर बहुत भरोसा है। उनके अंदर मैंने एक कशमकश देखी है। वे देश समाज के लिए कुछ करना चाहते हैं, लेकिन उन्हें रास्ता नहीं मिल रहा है। युवाओं को ध्यान में रख कर हमने दुनिया से बाल श्रम और बाल दासता खत्म करन के लिए ‘100 मिलियन फॉर 100 मिलियन’ नामक एक वैश्विक आंदोलन की शुरुआत की है।
इस अभियान के तहत 10 करोड़ युवाओं और बच्चों को बाल अधिकारों से अवगत कराया जाएगा, ताकि वे गुलामी और मजदूरी के दलदल में फंसे समाज के 10 करोड़ वंचित बच्चों के बारे में जान कर उनके लिए कुछ कर सकें। यह अभियान पांच साल तक चलेगा और इसका दारोमदार युवाओं को कंधों पर ही होगा। भारत में इसी अभियान के तहत हमने “भारत यात्रा” का आयोजन किया था।
सिविल सोसायटी का बड़ा महत्वपूर्ण योगदान है। लोकतंत्र में दबाव समूहों की बड़ी भूमिका होती है। सिविल सोसायटी ऐसा ही दबाब समूह होता है। भारत यात्रा के दौरान हमारे साथ देशभर के सैकड़ों गैरसरकारी संस्थाएं जुड़ी थीं। बच्चों के सवाल को आज हम घर-घर तक ले जा पाए, तो इसमें उनकी भी भूमिका है। वे अपने- अपने स्तर पर अच्छा काम कर रहे हैं।
सवाल- यौन शोषण को कम करने के लिए कानून ज्यादा कारगर होंगे, धार्मिक चीजें या फिर नैतिक आग्रह?
इस बुराई को खत्म करने का नैतिक आग्रह एक कारगर तरीका हो सकता है। यौन शोषण हमारे समाज में महामारी की तरह फैल रहा है। मैं इसे अनैतिकता की महामारी कहता हूं। हमारा समाज नैतिक रूप से बड़ा ही सबल रहा है। लेकिन हाल के दिनों में इसमें तेजी से गिरावट आई है। हमें लोगों में नैतिक मूल्य पैदा करने होंगे। इसमें धर्मगुरुओं की महत्वपूर्ण भूमिका है।
मैंने भारत यात्रा के दौरान सभी संप्रदाय के धर्मगुरुओं को एक मंच पर इकठ्ठा किया और उनसे अपील की वे न केवल धर्मस्थलों को बच्चों के लिए सबसे सुरक्षित स्थान बनाए, बल्कि लोगों के दिलों में बच्चों के प्रति करुणा पैदा करें। लोगों के दिलों में बच्चों के प्रति करुणा पैदा कर ही इस अनैतिक महामारी को खत्म कर सकते हैं।
सवाल- हिंसा मुक्त बचपन कैसे हो सकता है?
कानून और अदालतों की अपनी अहमियत है। सख्त कानून और अदालतों की सक्रियता से जाहिर है बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों पर काफी हद तक रोक लगेगी। लेकिन हमें इससे ऊपर उठ कर इस समस्या का दीर्घकालीन समाधान ढूढ़ना होगा। मुझे लगता है कि हर इंसान के दिल में बच्चों के लिए प्यार होता है, उनके लिए करुणा होती है।
इसलिए हम लोगों के दिलों में बच्चों के प्रति करुणा पैदा कर इस समस्या का स्थाई समाधान कर सकते हैं। भारत तो करुणा की धरती रही है। वसुधैव कुटुम्बकम् की धरती से लोगों के दिलों में बच्चों के प्रति करुणा पैदा करने की आवाज उठनी चाहिए। इसीलिए मैं करुणा के भूमंडलीकरण की बात करता हूं। पश्चिम ने हमें बाजार दिया है, जिसने हिंसा को बढ़ाया है। हम लोगों में करुणा का भाव पैदा कर दुनिया को सभी तरह की हिंसा से मुक्त कर सकते हैं।
दूसरी बात मुझे युवाओं पर बहुत भरोसा है। उनके अंदर मैंने एक कशमकश देखी है। वे देश समाज के लिए कुछ करना चाहते हैं, लेकिन उन्हें रास्ता नहीं मिल रहा है। युवाओं को ध्यान में रख कर हमने दुनिया से बाल श्रम और बाल दासता खत्म करन के लिए ‘100 मिलियन फॉर 100 मिलियन’ नामक एक वैश्विक आंदोलन की शुरुआत की है।
इस अभियान के तहत 10 करोड़ युवाओं और बच्चों को बाल अधिकारों से अवगत कराया जाएगा, ताकि वे गुलामी और मजदूरी के दलदल में फंसे समाज के 10 करोड़ वंचित बच्चों के बारे में जान कर उनके लिए कुछ कर सकें। यह अभियान पांच साल तक चलेगा और इसका दारोमदार युवाओं को कंधों पर ही होगा। भारत में इसी अभियान के तहत हमने “भारत यात्रा” का आयोजन किया था।
बच्चे सस्ते मजदूर होते हैं
नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी
- फोटो : अमर उजाला
सवाल- कहा जाता है बाल मजदूरी की वजह गरीबी है। गरीबी खत्म होगी तो बाल मजदूरी अपने आप समाप्त हो जाएगी। इस बात से आप कहां तक सहमत हैं?
लोगों के मन में यह भ्रांति है कि गरीबी की वजह से बाल मजदूरी होती है। तर्क दिया जाता है कि देश में इतनी गरीबी है कि गरीब का बच्चा काम नहीं करेगा तो भूखा मर जाएगा। लेकिन, हकीकत यह है कि बाल मजदूरी की वजह से ही गरीबी है। दुनिया के तमाम अध्ययनों से यह साबित हो चुका है कि बाल मजदूरी से गरीबी बढ़ती है। दुनिया के कई देशों के गैरसरकारी अध्ययनों से यह बात निकल कर आई है कि बाल मजदूरी करने वाले बच्चे बेरोजगार वयस्कों की ही संतानें होती हैं। बेरोजगारी और बाल मजदूरी में एक गहरा रिश्ता है।
इसके अंतरसंबंधों को समझने के लिए जरा बाल मजदूरी और बेरोजगारी के आंकड़ों पर गौर करते हैं। दुनिया में करीब 16.8 करोड़ बच्चे बाल मजदूरी करते हैं। जबकि बेरोजगारों की संख्या तकरीबन 20 करोड़ है। इसी तरह से भारत में गैरसरकारी आंकड़ों के मुताबिक तकरीबन 5 करोड़ बाल मजदूर हैं और तकरीबन इतनी ही संख्या बेरोजगारों की भी है। एक अध्ययन से पता चलता है कि बाल मजदूर उन माता-पिताओं की ही संताने होती हैं जिन्हें साल में 100 या 100 से अधिक दिनों तक रोजगार नहीं मिल पाता।
दरअसल बच्चे सस्ते मजदूर होते हैं। वयस्क मजदूरों की तुलना में उन्हें मामूली या न के बराबर मजदूरी की रकम दी जाती है। बच्चों से 15-20 घंटे तक काम भी कराया जा सकता है। जबकि वयस्क मजदूर 8 घंटे से अधिक काम करने पर ओवरटाइम और दूसरी सुविधाओं की मांग करेगा। ऐसे में नियोक्ता के लिए बाल मजदूर ज्यादा लाभकारी रहता है। इसी लालच में वह बाल मजदूरी को बढ़ावा देता है। इसके दूसरे पहलू पर विचार करें तो समझ में आता है कि अगर बाल मजदूरी न कराई जाए तो ऐसी स्थिति में इन बच्चों के माता-पिता को ही रोजगार मिलेगा।
ऐसे में निष्कर्ष यह निकलता है कि अगर बाल मजदूरी पर पूरी तरह से रोक लगा दी जाए तो ज्यादातर बेरोजगार वयस्कों को रोजगार मिल सकता है। ऐसी स्थित में बच्चे काम की बजाए पढ़ाई करेंगे और वे भविष्य में एक बेहतर नागरिक के रूप में तैयार होंगे।
सवाल- आप ने नेशनल चिल्ड्रेन ट्रिब्यूनल का प्रस्ताव दिया है इसकी रूप रेखा क्या होगी? ये किस तरह से बाल शोषण की रोकथाम में मदद करेगा।
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की तर्ज पर ही मैंने नेशनल चिल्ड्रेन ट्रिब्यूनल बनाने की मांग की है। यह समय की जरूत है। सुरक्षित बचपन के बगैर हम सुरक्षित भारत नहीं बना सकते हैं। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल एक शक्तिशाली न्यायिक बॉडी है। वह सख्त फैसले लेती है और इसकी वजह से पर्यावरण में सुधार भी हो रहा है। देश में करीब 40 फीसदी आबादी 18 साल से कम उम्र के बच्चों की है। ऐसे में उनके लिए भी अलग से एक ट्रिब्यूनल की व्यवस्था होनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट का रिटायर जज इस ट्रिब्यूनल का अध्यक्ष होगा। ट्रिब्यूनल बच्चों के अधिकारों की न केवल रक्षा करेगा और बल्कि उनके मामलों की त्वरित सुनवाई कर उन पर निर्णय भी लेगा। यह बच्चों के खिलाफ होने वाले हर प्रकार के अपराधों पर निगरानी रखेगा और एक्शन लेगा। इस ट्रिब्यूनल को इतना शक्तिशाली बनना होगा कि वह सरकारों और कारपोरेट से न केवल जवाब तलब कर सके, बल्कि नियमों का उल्घंन करने पर उन पर कोठर कार्रवाई भी कर सके।
लोगों के मन में यह भ्रांति है कि गरीबी की वजह से बाल मजदूरी होती है। तर्क दिया जाता है कि देश में इतनी गरीबी है कि गरीब का बच्चा काम नहीं करेगा तो भूखा मर जाएगा। लेकिन, हकीकत यह है कि बाल मजदूरी की वजह से ही गरीबी है। दुनिया के तमाम अध्ययनों से यह साबित हो चुका है कि बाल मजदूरी से गरीबी बढ़ती है। दुनिया के कई देशों के गैरसरकारी अध्ययनों से यह बात निकल कर आई है कि बाल मजदूरी करने वाले बच्चे बेरोजगार वयस्कों की ही संतानें होती हैं। बेरोजगारी और बाल मजदूरी में एक गहरा रिश्ता है।
इसके अंतरसंबंधों को समझने के लिए जरा बाल मजदूरी और बेरोजगारी के आंकड़ों पर गौर करते हैं। दुनिया में करीब 16.8 करोड़ बच्चे बाल मजदूरी करते हैं। जबकि बेरोजगारों की संख्या तकरीबन 20 करोड़ है। इसी तरह से भारत में गैरसरकारी आंकड़ों के मुताबिक तकरीबन 5 करोड़ बाल मजदूर हैं और तकरीबन इतनी ही संख्या बेरोजगारों की भी है। एक अध्ययन से पता चलता है कि बाल मजदूर उन माता-पिताओं की ही संताने होती हैं जिन्हें साल में 100 या 100 से अधिक दिनों तक रोजगार नहीं मिल पाता।
दरअसल बच्चे सस्ते मजदूर होते हैं। वयस्क मजदूरों की तुलना में उन्हें मामूली या न के बराबर मजदूरी की रकम दी जाती है। बच्चों से 15-20 घंटे तक काम भी कराया जा सकता है। जबकि वयस्क मजदूर 8 घंटे से अधिक काम करने पर ओवरटाइम और दूसरी सुविधाओं की मांग करेगा। ऐसे में नियोक्ता के लिए बाल मजदूर ज्यादा लाभकारी रहता है। इसी लालच में वह बाल मजदूरी को बढ़ावा देता है। इसके दूसरे पहलू पर विचार करें तो समझ में आता है कि अगर बाल मजदूरी न कराई जाए तो ऐसी स्थिति में इन बच्चों के माता-पिता को ही रोजगार मिलेगा।
ऐसे में निष्कर्ष यह निकलता है कि अगर बाल मजदूरी पर पूरी तरह से रोक लगा दी जाए तो ज्यादातर बेरोजगार वयस्कों को रोजगार मिल सकता है। ऐसी स्थित में बच्चे काम की बजाए पढ़ाई करेंगे और वे भविष्य में एक बेहतर नागरिक के रूप में तैयार होंगे।
सवाल- आप ने नेशनल चिल्ड्रेन ट्रिब्यूनल का प्रस्ताव दिया है इसकी रूप रेखा क्या होगी? ये किस तरह से बाल शोषण की रोकथाम में मदद करेगा।
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की तर्ज पर ही मैंने नेशनल चिल्ड्रेन ट्रिब्यूनल बनाने की मांग की है। यह समय की जरूत है। सुरक्षित बचपन के बगैर हम सुरक्षित भारत नहीं बना सकते हैं। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल एक शक्तिशाली न्यायिक बॉडी है। वह सख्त फैसले लेती है और इसकी वजह से पर्यावरण में सुधार भी हो रहा है। देश में करीब 40 फीसदी आबादी 18 साल से कम उम्र के बच्चों की है। ऐसे में उनके लिए भी अलग से एक ट्रिब्यूनल की व्यवस्था होनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट का रिटायर जज इस ट्रिब्यूनल का अध्यक्ष होगा। ट्रिब्यूनल बच्चों के अधिकारों की न केवल रक्षा करेगा और बल्कि उनके मामलों की त्वरित सुनवाई कर उन पर निर्णय भी लेगा। यह बच्चों के खिलाफ होने वाले हर प्रकार के अपराधों पर निगरानी रखेगा और एक्शन लेगा। इस ट्रिब्यूनल को इतना शक्तिशाली बनना होगा कि वह सरकारों और कारपोरेट से न केवल जवाब तलब कर सके, बल्कि नियमों का उल्घंन करने पर उन पर कोठर कार्रवाई भी कर सके।