अविश्वास प्रस्ताव लाए जाने से नरेंद्र मोदी की चार साल पुरानी सरकार को भले ही कोई डर नहीं रहा हो, लेकिन इसने सभी राजनीतिक दलों को 2019 के लोकसभा चुनावों के लिए खुद को कमर कसने का एक मौका जरूर दे दिया। सवाल यह है कि विभिन्न राजनीतिक पार्टियों की अविश्वास प्रस्ताव के मतदान से क्या हासिल करने की मंशा थी। पेश है एक विश्लेषण।
जानिए अविश्वास प्रस्ताव से किस पार्टी को हुआ फायदा, किसे पहुंचा नुकसान
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भाजपा को क्या मिला
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा)
भाजपा शुक्रवार के मतदान में विजेता बनकर उभरी। इसने दो तिहाई बहुमत के खुद के लक्ष्य से कहीं ज्यादा विश्वास मत हासिल किया जो सदन के 70 फीसदी से भी ज्यादा था। दोपहर में पार्टी ने जरूर झटके का सामना किया जब राहुल गांधी ने व्यक्तिगत और आक्रामक हमला किया। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी के भाषण के साथ ही पार्टी ने महसूस किया कि पूरी बहस फिर से उनकी पकड़ में आ गई है। पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह ने ट्वीट किया कि यह जीत 2019 के चुनावों की एक झांकी है।
शिवसेना को कुछ मिला भी!
शिवसेना
शिवसेना सदन की कार्यवाही से बाहर रही। गुरुवार दोपहर को सरकार का समर्थन करने का फैसला करने के बाद, फिर उसी शाम को अपना फैसला पलट दिया और आखिरकार अविश्वास प्रस्ताव और मतदान का बहिष्कार करने का निर्णय लिया। पार्टी के हर क्षण बदलते फैसले भाजपा के साथ उसके जटिल संबंध को दर्शाते हैं। यह केंद्र और महाराष्ट्र में सरकार में सहयोगी है। फिर भी, यह नाराज है और मानती है कि बीजेपी ने उसकी जगह कम कर दी है। यह अंदर नहीं है, लेकिन यह बाहर भी नहीं है।
एआईएडीएमके ने खोल दिए पत्ते
अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एआईएडीएमके)
तमिलनाडु की सत्तारूढ़ पार्टी ने सरकार के पक्ष में मतदान किया। भाजपा के पक्ष में पार्टी की नजदीकी, खास तौर से जयललिता की मृत्यु के बाद जगजाहिर थी। इसने राजनीतिक और नीतिगत मुद्दों पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से एनडीए का समर्थन किया है। ऐसी उम्मीद की जा रही थी कि वे मतदान से दूर रहेंगे। लेकिन इस खुले समर्थन का असर तमिलनाडु में देखने को मिलेगा, जहां एआईएडीएमके बंटा हुआ है और बाहरी चुनौतियों का सामना कर रहा है।
प्रस्ताव लाने वाली टीडीपी को क्या हासिल हुआ?
तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी)
टीडीपी ने सदन में अपने प्रस्ताव से बहस शुरू की थी। वह निश्चित तौर पर इस बात से खुश नहीं होगी कि सदन में हुई बहुत से विषयों पर चर्चा हुई लेकिन उनका आंध्र प्रदेश को विशेष दर्जा देने से कोई खास ताल्लुक नहीं थी। लेकिन तथ्य यह है कि संसद ने टीडीपी द्वारा लाए गए प्रस्ताव पर बहस किया, जिसका फायदा पार्टी को अपने राज्य में मिलेगा कि उसने राज्य के हितों के लिए केंद्र और दिल्ली को चुनौती दे दी।