इशरत जहां मामले में अधिकारियों की बातचीत लीक होने के बाद चिदंबरम ने बीजेपी को घेरा
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कांग्रेस नेता और पूर्व गृह मंत्री पी चिदंबरम ने इशरत जहां मामले में दाखिल किए गए हलफनामे और उसको लेकर गलत अफवाह फैलाने के लिए मोदी सरकार को जिम्मेदार ठहराया है। उन्होंने मोदी सरकार पर आरोप लगाया कि उन्होंने इस मामले में गलत बयानबाजी और फर्जी रिपोर्ट बनाकर लोगों को गुमराह कर रहे हैं। उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक खबर को इसके लिए आधार बनाया। इसमें जांच अधिकारी व एक अन्य अधिकारी की फोन पर बातचीत का एक ऑडियो टेप जारी किया गया है।
इशरत जहां मामले से जुड़ी फाइलों के गायब होने और उसकी खोज के लिए गठित की गई एक सदस्यीय जांच आयोग की रिपोर्ट के सामने आने के बाद चिदंबरम ने कहा कि न्यूज रिपोर्ट्स ने इशरत जहां मामले में पूर्व सरकार द्वारा दाखिल की गई दो फाइलों और उनको लेकर एनडीए सरकार द्वारा फैलाई गई फर्जी विवाद की पोल खोल दी है। उन्होंने कहा, 'इसका मतलब यह हुआ कि जांच अधिकारी द्वारा पेश की गई गलत रिपोर्ट भी सच्चाई को छिपा नहीं पाई। असल मुद्दा यह था कि इशरत जहां और उसके तीन साथियों का एनकाउंटर फर्जी था या असली? इस बात का खुलासा जुलाई 2013 से लंबित चल रहे उस मामले के कोर्ट के फैसले के बाद ही सामने आ पाएगा।'
आयोग ने अपने जांच रिपोर्ट में उस वक्त के संयुक्त सचिव के बयान के हवाले से कहा है कि जांच से जुड़ी फाइल से संबंधित कुछ दस्तावेज उच्चाधिकारियों के पास भेजी गई थी लेकिन जब वह फाइल वापस आई तो उसमें वह दस्तावेज नहीं थे। 6 अगस्त 2009 को सामने आए एक हलफनामे में केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के बीच गुप्त सूचनाओं को साझा किया गया था। वहीं 7 सितंबर 2009 को चिदंबरम ने न्यायाधीश एसपी तमांग को दी गई रिपोर्ट में इस बात का खुलासा किया था कि इशरत जहां एनकाउंटर 'फर्जी एनकाउंटर' था।
'दुर्भाग्यपूर्ण कदम उठाए गए'
वहीं इस मामले में गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू ने कहा, ' हमें भी एक सदस्यीय जांच कमेटी की रिपोर्ट मिली है। हमने रिपोर्ट देखी, लेकिन अभी भी कई दस्तावेज नहीं मिल पाए हैं।'
उन्होंने गायब हुई फाइलों से जुड़े सवाल का जवाब देते हुए कहा कि फाइलों को गायब करने के पीछे तो मकसद था वह साफ है। आखिर क्यों एक आतंकवादी को एक हलफनामें के जरिए मासूम घोषित किया गया जो उनकी मंशा का प्रत्यक्ष गवाह है। रिजिजू ने कहा कि पूर्वी की यूपीए सरकार के दौरान कई दुर्भाग्यपूर्ण कदम उठाए गए, खासकर चिदंबरम के कार्यकाल में। देखते हैं आगे क्या हो सकता है।
गौरतलब है कि इशरत जहां एनकाउंटर को यूपीए सरकार ने एक फर्जी एनकाउंटर करार देते हुए मौजूदा गुजरात सरकार पर सवाल उठाए थे। यूपीए सरकार ने दावा किया था कि इशरत जहां एनकाउंटर पूरी तरह फर्जी है लेकिन राज्य सरकार ने इसका खंडन किया था। गुजरात सरकार के मुताबिक इशरत और उसके तीन साथी गुजरात सरकार के मौजूदा मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या करने के लिए आए थे लेकिन वो नाकाम रहे।
क्या है मीडिया रिपोर्ट का खुलासा?
दरअसल, इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर में यह दावा किया गया है कि इशरत जहां केस से जुड़ी फाइलों के गायब होने की जांच जिस अधिकारी को सौंपी गई थी उसने किसी अन्य अधिकारी इस बात की ट्रेनिंग दी कि उसे क्या बोलना है? उसने यह ट्रेनिंग एक फोन पर दी।
रिपोर्ट के मुताबिक इशरत जहां एनकाउंटर केस में 'गायब कागजातों' की जांच का नेतृत्व करने वाले केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधिकारी बीके प्रसाद ने ना सिर्फ एक गवाह से पूछे जाने वाले सवाल बताए, बल्कि उसे उसका क्या जवाब देना है उसकी भी ट्रेनिंग दी। प्रसाद ने अन्य अधिकारी से बताया कि जब उससे यह पूछा जाए कि क्या तुमने यह फाइल देखी है? तो उसे जवाब देना है कि उसने यह फाइल नहीं देखी।
इस ऑडियो टेप के सामने आने के बाद गृहमंत्री राजनाथ सिंह द्वारा गठित की गई इस जांच कमेटी पर सवालिया निशान लग गया। इस जांच का मकसद यूपीए सरकार के दूसरे हलफनामे- जिसमें इशरत के कथित तौर पर लश्कर से संबंध और उसकी हत्या के जांच की इजाजत और उसकी परिस्थियों का पता लगाना था। हालांकि, गुरुवार को दाखिल की गई रिपोर्ट में गायब कागजातों पर कोई निष्कर्ष नहीं निकल पाया।