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34 साल बाद हुआ देश की शिक्षा नीति में परिवर्तन, अब कुछ ऐसी होगी शिक्षा व्यवस्था

Wed, 29 Jul 2020 08:54 PM IST
गौरव पाण्डेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: गौरव पाण्डेय Updated Wed, 29 Jul 2020 08:54 PM IST
सार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई बैठक में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बुधवार को नई शिक्षा नीति को मंजूरी दे दी। इसके साथ ही मानव संसाधन विकास मंत्रालय का नाम बदलते हुए शिक्षा मंत्रालय कर दिया गया है। केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने इस फैसले को बेहद अहम बताते हुए कहा कि 34 साल से शिक्षा नीति में कोई परिवर्तन नहीं हुआ था। उन्होंने उम्मीद जताई कि देशवासी इसका स्वागत करेंगे। बैठक के बाद उच्च शिक्षा सचिव अमित खरे और स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता सचिव अनिता करवल ने प्रेस वार्ता के दौरान एक प्रस्तुति दी जिसमें नई शिक्षा नीति के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई।

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New Education Policy got permission from Cabinet, here is all you you need to know about new education system
केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर (फाइल फोटो) - फोटो : पीटीआई

विस्तार

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के पूर्व अध्यक्ष के कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता वाली समिति ने पिछले वर्ष मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक को नई शिक्षा नीति का मसौदा सौंपा था। इस दौरान ही निशंक ने मंत्रालय का कार्यभार संभाला था। नई शिक्षा नीति के मसौदे को विभिन्न पक्षकारों की राय के लिए सार्वजनिक किया गया था और मंत्रालय को इस पर दो लाख से अधिक सुझाव प्राप्त हुए थे।

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नई शिक्षा नीति के प्रमुख बिंदु...

  • नई शिक्षा नीति के अनुसार बोर्ड परीक्षाएं जानकारी के अनुप्रयोग पर आधारित होंगी, यानि अधिक व्यावहारिक होंगी।
  • बोर्ड परीक्षा को दो भागों में बांटा जा सकता है जो वस्तुनिष्ठ और विषय आधारित हो सकते हैं।
  • नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत एमफिल पाठ्यक्रमों को बंद किया जाएगा।
  • मल्टीपल एंट्री और एग्जिट व्यवस्था (बहु स्तरीय प्रवेश एवं निकासी) में पहले साल के बाद सर्टिफिकेट, दूसरे साल के बाद डिप्लोमा और तीन-चार साल बाद डिग्री दी जाएगी।
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  • उच्च शिक्षा में प्रमुख सुधारों में 2035 तक 50 फीसदी सकल नामांकन अनुपात का लक्ष्य और एक से ज्यादा प्रवेश/निकास का प्रावधान शामिल है।
  • देश में उच्च शिक्षा के लिए एक ही नियामक होगा। इसमें अनुमति और वित्त के लिए अलग-अलग प्रावधान होंगे। यह नियामक 'ऑनलाइन सेल्फ डिस्क्लोजर बेस्ड ट्रांसपेरेंट सिस्टम' पर काम करेगा।
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  • विधि (कानून) और चिकित्सा कॉलेजों को छोड़कर सभी उच्च शिक्षण संस्थान एक ही नियामक द्वारा संचालित होंगे। निजी और सार्वजनिक उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए साझा नियम होंगे।
  • चार साल का डिग्री प्रोग्राम फिर एमए और उसके बाद बिना एमफिल के सीधा पीएचडी कर सकते हैं।
  • जो छात्र शोध के क्षेत्र में जाना चाहते हैं उनके लिए चार साल का डिग्री प्रोग्राम होगा, जबकि जो लोग नौकरी में जाना चाहते हैं वो तीन साल का ही डिग्री प्रोग्राम करेंगे। 
  • लक्ष्य निर्धारित किया गया है कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का छह फीसदी शिक्षा में लगाया जाए जो अभी 4.43 फीसदी है।
  • अमेरिका के एनएसएफ (नेशनल साइंस फाउंडेशन) की तर्ज पर यहां एनआरएफ (राष्ट्रीय शोध फाउंडेशन) लाया जाएगा। 
  • राष्ट्रीय शोध फाउंडेशन में विज्ञान के साथ सामाजिक विज्ञान भी शामिल होगा। ये बड़े प्रोजेक्ट्स को वित्तीय मदद उपलब्ध कराएगा। ये शिक्षा के साथ शोध में हमें आगे आने में मदद करेगा।
  • हिंदी और अंग्रेजी भाषा के अलावा आठ क्षेत्रीय भाषाओं में भी ई-कोर्स होगा। वर्चुअल लैब के कार्यक्रम को आगे बढ़ाया जाएगा।
  •  शिक्षा (टीचिंग, लर्निंग और एसेसमेंट) में तकनीकी को बढ़ावा दिया जाएगा। तकनीकी के माध्यम से दिव्यांगजनों में शिक्षा को बढ़ावा दिया जाएगा।
  • शिक्षा का माध्यम पांचवी कक्षा तक मातृभाषा, क्षेत्रीय भाषा या घर की भाषा में होगा। बालिकाओं के लिये लैंगिक शिक्षा कोष की बात कही गई है।
  • राष्ट्रीय पाठ्यचर्या 2005 के 15 वर्ष हो गए हैं, अब नई पाठ्यचर्या आएगी। शिक्षकों की शिक्षा के पाठ्यक्रम के भी 11 साल हो गए हैं, इसमें भी सुधार होगा।
  • बच्चों के रिपोर्ट कार्ड के स्वरूप मे बदलाव करते हुए समग्र मूल्यांकन पर आधारित रिपोर्ट कार्ड की बात कही गई है।
  • हर कक्षा में जीवन कौशल परखने पर जोर होगा ताकि जब बच्चा 12वीं कक्षा से निकलेगा तो उसके पास बेहतर कौशल होगा। 

1986 में तैयार की गई थी वर्तमान शिक्षा नीति

बता दें कि वर्तमान में हमारे देश में जो शिक्षा नीति लागू है वह साल 1986 में तैयार की गई थी। इसे 1992 में संशोधित किया गया था। नयी शिक्षा नीति लाने का मुद्दा साल 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी के चुनावी घोषणा पत्र में शामिल था। इसका मसौदा तैयार करने वाले विशेषज्ञों ने पूर्व कैबिनेट सचिव टीएसआर सुब्रमण्यम के नेतृत्व वाली समिति द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट पर भी विचार किया।

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