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...जब आजाद हिंद फौज के 2300 सैनिकों पर अंग्रेजों ने चलाई मशीनगन, हत्याकांड की कहानी चश्मदीदों की जुबानी

Sat, 23 Jan 2021 04:19 PM IST
Harendra Chaudhary जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Sat, 23 Jan 2021 04:19 PM IST
सार

सुभाष चंद्र बोस की 125वीं जयंती मनाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता 85 सदस्यों वाली कमेटी के कुछ सदस्य इस संस्थान में पहुंचे हैं। ऐसी संभावना है कि बंगाल चुनाव से पहले यहां नेताजी सुभाष चंद्र बोस की याद में कोई स्मारक या म्यूजियम आदि बनाने की घोषणा हो सकती है...

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netaji subhash chandra bose jayanti: How British Army assassin 2300 soldiers of Azad Hind Fauj in Nilganj, the story of the assassination was witnessed by eyewitnesses
Central Research Institute for Jute and Allied Fibers - फोटो : Amar Ujala (File)

विस्तार

आजाद हिंद फौज के 2300 सैनिकों को एक ही रात में ब्रिटिश फौज ने मशीनगन चलाकर मौत के घाट उतार दिया था। इस हत्याकांड को एक रणनीति के तहत अंजाम दिया गया। ब्रिटिश आर्मी ने इसके लिए पश्चिम बंगाल के नीलगंज इलाके को चुना था। आजाद हिंद फौज के सैनिकों को पहले वहां पर एकत्रित किया गया। उसके बाद 25 सितंबर 1945 की रात को वह इलाका खून से लाल हो गया। नदी का पानी लाल था। पेड़ों के तनों पर खून लगा हुआ था। नौवी नदी पर टेंट लगा दिए गए ताकि किसी को कुछ दिख न सके। इसके बाद वहां तेल के बड़े ड्रम लाए गए। लोगों को छोड़िये, उस हत्याकांड की गवाही तो इलाके के पशु पक्षी भी चिल्ला-चिल्ला कर दे रहे थे। आखिर नीलगंज में उस रात क्या हुआ था, उस हत्याकांड को जिन लोगों ने अपनी आंखों से देखा था, पढ़िये उन्होंने क्या कुछ कहा है।

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इस घटना को लेकर केंद्रीय गृह मंत्रालय और पीएमओ तक पत्राचार कर चुके सीआरपीएफ के पूर्व एसआई तमाल सान्याल बताते हैं कि यह घटना 1945 में हुई थी। देश आजाद हो गया, मगर उसके बाद अब तक इतिहास का सबसे बड़ा और रोंगटे खड़ा कर देने वाला हत्याकांड दबा रहा। जिस जगह पर इस हत्याकांड को अंजाम दिया गया, आजादी के बाद वहां भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का सेंट्रल इंस्टीट्यूट फॉर जूट एंड एलायड रिसर्च खोल दिया गया। हैरानी की बात तो ये रही कि आसपास के जो लोग इस घटना के चश्मदीद थे, उन्हें कभी इस संस्थान के अंदर ही नहीं जाने दिया गया। वे लोग संस्थान के भीतर जाकर आजाद हिंद फौज के शहीदों को श्रद्धांजलि देना चाहते थे। अब पीएमओ ने नीलगंज के इस संस्थान की सुध ली है।

सुभाष चंद्र बोस की 125वीं जयंती मनाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता 85 सदस्यों वाली जो कमेटी गठित की गई है, उसके कुछ सदस्य इस संस्थान में पहुंचे हैं। ऐसी संभावना है कि बंगाल चुनाव से पहले यहां नेताजी सुभाष चंद्र बोस की याद में कोई स्मारक या म्यूजियम आदि बनाने की घोषणा हो सकती है। बतौर तमाल सान्याल, नेताजी मिशन ने अपनी मैगजीन ‘अर्घ्य’ के पहले अंक में नीलगंज में हुए हत्याकांड को लेकर कई चश्मदीद लोगों के बयान प्रकाशित किए थे।

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चश्मदीद सत्या बाग ने क्या देखा था

मैगजीन के पेज नंबर 24-25 पर लिखा है कि उस वक्त सत्या बाग हाई स्कूल के छात्र थे। नृपेंद्र नाथ मुखर्जी और विजय नाहर सहित कई लोग आजाद हिंद फौज का प्रचार करने के लिए आते थे। एक दिन मालूम हुआ कि आजाद हिंद फौज के हजारों सैनिकों को पकड़ कर नीलगंज में लाया गया है। तब यह जगह ब्रिटिश सेना के नजरबंदी केंद्र के तौर पर इस्तेमाल की जा रही थी। नीलगंज कैंप के निकट बह रही नौवी नदी के पश्चिम किनारे की 10-15 बीघा जमीन पर टेंट लगा दिए गए। वहां बने कार शेड में तेल के ड्रम रख दिए गए।

उस दिन सत्या बाग जब स्कूल जा रहा था तो उसने देखा कि वहां पकड़े गए सैनिक नारे लगा रहे थे। नेताजी जिंदाबाद, आजाद हिंद सरकार जिंदाबाद व जयहिंद, ऐसी आवाजें आती रहीं। आसपास के इलाके में यह बात ज्यादा लोगों को मालूम नहीं थी। रात को बंदूकों का मुंह खोल दिया गया। उसके बाद लोगों को मालूम चला कि यहां क्या हुआ है। बंदूकों की आवाज सुनकर नौवी नदी के निकट स्थित जंगल में पशु-पक्षी चिल्ला रहे थे। कैंप के आसपास खून बिखरा पड़ा था। शवों को नौवी नदी पर लाया गया। अगले दिन लोगों ने जब कैंप में आना चाहा तो उन्हें गेट पर ही रोक दिया गया।

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राजेन सरदार के अनुसार, पूरी रात गोलियों की आवाज आती रही। सरदार, कुछ लोगों को साथ लेकर मोहनपुर की तरफ बढ़े। उन्होंने देखा, पूरा रास्ता खून से सना है। वहां ट्रक खड़े हुए थे। उनमें जवानों के शव थे। अगले दिन कैंप को खाली कर दिया गया। इसके बाद वहां पहुंचे लोगों ने देखा कि कैंप में मृत सैनिकों के अंग पड़े हुए थे। पेज नंबर 25 पर चश्मदीद गणेश चंद्र मेती के बारे में लिखा है। वे पीओ मल्लिकपोर के जमातगढ़ इलाके के रहने वाले थे। उनकी पांच बीघा जमीन को ब्रिटिश सेना ने अपने कैंप में मिला लिया था। उसे कोई मुआवजा भी नहीं मिला। वह देखता था कि कैंप में रोजाना सैनिकों को पकड़ कर लाया जा रहा है। आजाद हिंद फौज के ब्रिगेडियर और एक डॉक्टर, अपने सैनिकों के साथ मित्रता का व्यवहार करते थे। वे उन्हें आजादी का सपना दिखाते रहते थे। हत्याकांड के बाद शवों को ट्रकों में भरकर नदी पर ले जाया गया। कुछ शवों को गंगा और नौवी नदी में फेंका गया, जबकि अनेक शवों को एक साथ जला दिया गया था।

पेज 27 पर धीरेंद्र नाथ घोष के बारे में लिखा है। उस वक्त वे 16-17 साल के थे। नभारंतो गांव के रहने वाले घोष के मुताबिक, उस वक्त कैंप के चारों तरफ दीवार नहीं थी। आजाद हिंद फौज के सैनिकों को टोमी गन से मारा गया था। बाद में जवानों के शवों को नदी में फेंक दिया गया। पेज नंबर 28-29 पर चश्मदीद गोपाल साधु खान के बारे में लिखा है। उनके मुताबिक, नीलगंज में बंदी कैंप बनाया गया था। तारों से उस इलाके की बाड़बंदी की गई थी। रात को उसने गोलियों की आवाज सुनी। बहुत से लोग अपने घरों से बाहर निकल आए। सुबह के चार बजे उन्होंने देखा कि शवों को ट्रकों में लादा जा रहा है।

पेज नंबर 29-30 पर शिब शंकर घोष के बारे में लिखा है। उन्होंने भी नरसंहार को अपनी आंखों से देखा था। तारापदा जना के अनुसार, नीलगंज के बाजार में उसकी टेलर की दुकान थी। वह रोजाना कैंप के सामने से गुजरता था। कैंप से जिंदाबाद और जण गण मण की आवाजें आती रहती थीं। कैंप का एक कंपाउंडर उसके पास आता था। उसे पहलवान के नाम से बुलाते थे। हत्याकांड वाली रात को साढ़े नौ बजे उसने गोलियों की आवाज सुनी। वह समझ गया कि आजाद हिंद फौज के सैनिकों के साथ कुछ गलत हुआ है। अगले दिन जब वह दुकान पर जा रहा था, तो रास्ते पर खून बिखरा हुआ था। इसके बाद जब वह कंपाउंडर दुकान पर आया तो उसने घटना की पुष्टि कर दी।

छपुरिया गांव के अब्दुर रज्जाक मंडल ने भी उस हत्याकांड के बारे में बताया है। मैगजीन के पेज नंबर 33 पर उसने अपनी बात कही है। घटना की अगली सुबह जब वह घी दाह प्राइमरी स्कूल में जा रहा था, तो उसने देखा कि सड़क पर खून बिखरा हुआ था।

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