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हस्तशिल्प: विस्मृत शिल्प को पुनर्जीवित करने का वक्त, दुनियाभर में पहुंचे इसकी चमक
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हस्तशिल्प
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अमर उजाला
विस्तार
दुनिया का हर देश संयुक्त राष्ट्र (यूएन) द्वारा प्रस्तावित, 17 सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) को 2030 तक प्राप्त करने का प्रयास कर रहा है। पांचवीं सबसे बड़ी वैश्विक अर्थव्यवस्था और एक बड़ी युवा आबादी होने के नाते भारत से इसमें एक अद्वितीय और निर्णायक भूमिका निभाने की उम्मीद है। गरीबी का अंत, भूख का उन्मूलन, लैंगिक समानता आदि न केवल कुछ वैश्विक लक्ष्य हैं, बल्कि किसी भी समाज की बुनियादी जरूरत हैं। इन्हें स्थायी रूप से हासिल करने के लिए एक समग्र दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है।
अब सवाल उठता है कि जब दुनिया रोबोटिक्स और एआर/वीआर जैसी नवीन तकनीकों के उपयोग की ओर बढ़ रही है, तो क्या भारत में पश्चिम का अनुसरण करने से ही समावेशी विकास और सशक्तीकरण सुनिश्चित करना संभव है? यदि हम अपने समृद्ध इतिहास और संस्कृति को देखते हैं, तो हमें वैश्विक लक्ष्यों को प्राप्त करने के उपाय दिखते हैं। बेशक प्रौद्योगिकी और बुनियादी ढांचे में विकास एवं नवाचार की दिशा में प्रगति महत्वपूर्ण है, पर भारत की पुरानी विरासत यानी हस्तशिल्प को संभालना भी जरूरी है।
भारत अपने समृद्ध पारंपरिक शिल्प, जैसे मिट्टी के बर्तनों, लकड़ी व पत्थर की नक्काशी, धातु के काम, पेंटिंग, मुद्रण, कढ़ाई, बुनाई आदि के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। प्राचीन काल से प्रचलित भारतीय मलमल, मुद्रित और चित्रित कपड़ा, कढ़ाई वाला कपड़ा, जैसे शिल्प उत्पाद अपनी सुंदरता और शिल्प कौशल के लिए पश्चिमी देशों में मशहूर रहे हैं। अभी भारतीय हस्तशिल्प मुख्यतः अमेरिका, ब्रिटेन, संयुक्त अरब अमीरात, जर्मनी, नीदरलैंड, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया, जापान, कनाडा आदि देशों में निर्यात किए जाते हैं। हस्तशिल्प का निर्यात वर्ष 2021-22 के दौरान कुल निर्यात का पांच फीसदी था।
एक श्रम गहन क्षेत्र होने के नाते हस्तशिल्प न केवल लाखों लोगों को रोजगार प्रदान करता है, बल्कि स्थानीय रूप से उपलब्ध कच्चे माल, स्थानीय जनशक्ति और उत्पादों का विवेकपूर्ण उपयोग भी करता है, जो कम से कम कार्बन पदचिह्न छोड़ने के चलते पर्यावरण के अनुकूल है। टिकाऊपन हमेशा भारतीय शिल्प संस्कृति में शामिल रही है, जिससे आसानी से एसडीजी लक्ष्य-सतत उत्पादन और खपत हासिल किया जा सकता है।
पूर्व से पश्चिम, उत्तर से दक्षिण तक भारत की प्रत्येक संस्कृति कम से कम एक शिल्प का उत्पादन करती है। कच्चे माल की खेती से लेकर प्रसंस्करण और अंतिम उत्पाद निर्माण तक शिल्प उत्पादन के सभी चरणों में देश के दूरदराज क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को आजीविका मिलती है। महिलाएं अपने बच्चों और अन्य घरेलू कामों की देखभाल करते हुए शिल्प निर्माण का कार्य कर सकती हैं, जिससे रोजगार में लैंगिक समानता के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है। हाल ही में नई सकारात्मक लहर ने लोगों को जागरूक उपभोग, महिला सशक्तीकरण, वोकल फॉर लोकल आदि के लिए प्रेरित किया है, जो शिल्प जागरूकता, शिल्प संवर्धन और विभिन्न रूपों में शिल्प उपयोग की दिशा में अधिक काम करने का संकेत देता है।
यह विस्मृत शिल्प को पुनर्जीवित करने और डिजाइन हस्तक्षेप के माध्यम से उनकी खोई हुई चमक को वापस लाने का समय है, ताकि भारतीय हस्तशिल्प को दुनिया के हर कोने तक ले जाया जा सके। शिल्प की प्रामाणिकता बनाए रखने से उच्च रिटर्न मिलता है और शिल्प में डिजाइन हस्तक्षेप, व्यापक बाजार तक पहुंच सुनिश्चित करता है, जो शिल्प के लिए बेहतर भविष्य सुनिश्चित करेगा। इसके अलावा, अपने शुद्धतम रूप में भव्य पैमाने पर शिल्प को बढ़ावा देने से पर्यटन में भी वृद्धि होगी।
डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया, वोकल फॉर लोकल जैसी सरकार की सक्रिय पहलों से आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलेगा और शिल्प सशक्तीकरण निश्चित रूप से अमृत काल के दौरान विकास को गति प्रदान करेगा। हालांकि शिल्प पारिस्थितिकी तंत्र के उत्कर्ष के लिए सक्षम वातावरण प्रदान करने की जरूरत है।
-लेखिका, सहायक प्रोफेसर, टेक्सटाइल डिजाइन, निफ्ट, कांगड़ा।