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लॉकडाउन 2.0 में 40 लाख ट्रकों की जरूरत, नहीं दौड़े तो बिगड़ सकता है रसोई का बजट

Wed, 15 Apr 2020 05:38 PM IST
Harendra Chaudhary जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Wed, 15 Apr 2020 05:38 PM IST
सार

  • देश में रोजाना 15 हजार करोड़ रुपये का खुदरा व्यापार
  • 19 दिनों में पौने तीन लाख करोड़ रुपये का नुकसान होने की संभावना
  • लॉकडाउन 1.0 में करीब 4 लाख ट्रक सड़कों पर खड़े
  • कहीं ड्राइवर नहीं है, तो कहीं माल उतारने के लिए मजदूर का है टोटा

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nearly 40 lakhs trucks required on road during lockdown 2.0 to smoothing the supply system
India lockdown Trucks - फोटो : PTI (फाइल फोटो)

विस्तार

देश में कोरोना का संक्रमण रोकने के लिए लॉकडाउन 2.0 लागू हो गया है। अभी तक जरूरी वस्तुओं की सप्लाई में कोई बाधा नहीं आई है, लेकिन 15 अप्रैल से शुरू हुए लॉकडाउन 2.0 में सप्लाई चेन को बरकरार रखने के लिए जरूरी है कि 40 लाख ट्रक बिना किसी देरी के दौड़ना शुरू करें।
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अगर ऐसा नहीं होता है, तो रसोई का बजट बिगड़ जाएगा। कॉन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) और ऑल इंडिया ट्रांसपोर्टर वेलफेयर एसोसिएशन के अनुसार, लॉकडाउन 2.0 में लोगों को खाद्य वस्तुओं की किल्लत या महंगाई का सामना न करना पड़े, इसके लिए केंद्र सरकार को 40 लाख ट्रकों की आवाजाही सुनिश्चित करनी होगी।

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देश में रोज 15 हजार करोड़ रुपये का खुदरा व्यापार

कैट के महामंत्री प्रवीण खंडेलवाल का कहना है कि देश में रोजाना 15 हजार करोड़ रुपये का खुदरा व्यापार होता है। लॉकडाउन 1.0 में अगर 19 दिनों की बात करें तो पौने तीन लाख करोड़ रुपये का नुकसान होने की संभावना है।

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इस दौरान जरूरी वस्तुओं की जो सप्लाई हुई है, उसके जरिए 70 से 100 करोड़ रुपये प्रतिदिन का कारोबार हुआ है। चूंकि कोई भी शहर या गांव का व्यापारी अधिकांश दो सप्ताह का माल अपने पास रखता है। इसमें दाल, चावल, आटा व तेल आदि शामिल है।

फल-सब्जियों का स्टॉक तो मुश्किल से दो-तीन का ही रहता है। पहले लॉकडाउन में जो भी स्टॉक था, वह खत्म हो गया है। उस दौरान दिक्कत इसलिए नहीं आई, क्योंकि माल की सप्लाई होलसेलर से रिटेलर तक होनी थी। आटा, दाल और दूसरे खाद्यान्न पदार्थों के लिए कुछ फैक्ट्री काम करती रहीं।

इससे लॉकडाउन 1.0 की जरूरतें पूरी हो गई। कहीं कोई हायतौबा देखने को नहीं मिली।

लॉकडाउन 2.0 के सामने हैं ये चुनौतियां

प्रवीण खंडेलवाल के अनुसार, लॉकडाउन 2.0 में सबसे बड़ी जरूरत ट्रांसपोर्ट सेक्टर को सक्रिय बनाने की है। चूंकि अब खेत से लेकर खाद्यान्न पदार्थ तैयार करने वाली इंडस्ट्री चलाने की बात कही जा रही है, इसके लिए जरूरी है कि कम से कम 40 लाख ट्रकों को चलाने की व्यवस्था हो।

इसमें कई तरह की दिक्कतें हैं। जैसे, पर्याप्त संख्या में पास नहीं मिल रहे हैं। बहुत से कर्मी अपने गांव चले गए हैं, उन्हें जरूरी वस्तुओं की सप्लाई बरकरार रखने के लिए वापस बुलाना होगा।

इसके लिए ट्रांसपोर्ट का कोई जरिया तलाशना पड़ेगा। दिल्ली एनसीआर की बात करें, तो जरूरी वस्तुओं की सप्लाई चेन को जारी रखने के लिए केवल बीस फीसदी स्टाफ मौजूद है।
 

गृह मंत्रालय आदेश जारी कर देता है कि राज्यों में ट्रकों को न रोका जाए, लेकिन ऐसा हो नहीं पाता। विभिन्न राज्यों की सीमाओं पर ट्रक रोके जाते हैं। कई तरह की औपचारिकताएं पूरी करने के लिए कहा जाता है।

कैट ने अपने सदस्यों से बातचीत कर डेढ़ करोड़ व्यापारियों से जरूरी वस्तुओं की सप्लाई चेन जारी रखने की गुजारिश की थी, जो उन्होंने मान ली। लॉकडाउन 1.0 में इसके लिए करीब 40 लाख दुकानें खोली गई थी। लॉकडाउन 2.0 में अगर केंद्र और राज्य सरकार का पूर्ण सहयोग मिलता है तो ही हम एक करोड़ दुकान खुलवा सकेंगे।

ट्रांसपोर्ट संचालन में कई तरह की दिक्कतें

ऑल इंडिया ट्रांसपोर्टर वेलफेयर ऐसोसिएशन के अध्यक्ष प्रदीप सिंघल के अनुसार, लॉकडाउन 2.0 में केवल वेयर हाउस के लिए ही कम से कम 15 लाख ट्रक चाहिए। यहां पर तैयार माल अगर दुकानदारों तक पहुंचाना है तो उसके लिए तीस लाख अतिरिक्त ट्रक चलाने होंगे।

बहुत से ट्रांसपोर्टर अभी ट्रक बाहर निकालने में हिचक रहे हैं। उन्हें चिंता है कि माल समय पर लदेगा या नहीं। अगर ये सब हो गया तो वापसी पर माल मिलेगा या नहीं। बीच में पुलिस जाने देगी या नहीं, उन्हें ऐसी चिंता लगी रहती है। दूसरे, बहुत से ट्रक ड्राइवर अपने गांव चले गए हैं।

अब उन्हें वापस लाना भी एक चुनौती है। वे ट्रक तक कैसे पहुंचेंगे, इसके लिए सरकार को ही कुछ करना होगा। प्रवीण खंडेलवाल बताते हैं कि लॉकडाउन 1.0 के चलते करीब 4 लाख ट्रक सड़कों पर खड़े हैं। किसी का ड्राइवर नहीं है तो किसी को माल उतरवाने के लिए मजदूर नहीं मिल रहे हैं।



कई फैक्ट्रियों में ताला लगा है। कहीं पास की दिक्कत है। अगर लॉकडाउन 2.0 में 40 लाख ट्रकों को तुरंत काम पर नहीं लगाया जाता है, तो जरूरी वस्तुओं की कीमतों में उछाल आना तय है।

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