NDA meet: मोदी को विपक्षी गठबंधन से खतरा कहां है, 'परसेप्शन' की लड़ाई में कौन रहेगा आगे?
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विस्तार
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा सहित राजग बैठक में शामिल होने वाले (NDA Meet) सभी सदस्य यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि विपक्षी दलों के गठबंधन से उन्हें कोई खतरा नहीं है। लेकिन भाजपा नेताओं की 'आक्रामकता' यह बताने के लिए काफी है कि वह विपक्षी गठबंधन को लेकर बेहद चिंतित है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी विपक्षी दलों की बैठक पर हमला बोला है और उसे भ्रष्टाचारियों का सम्मेलन बताया है। इससे भी विपक्षी दलों की एकता बैठक का महत्व समझ में आता है। विपक्षी दलों की बैठक के ठीक एक दिन पहले भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने प्रेस कांफ्रेंस कर यह बताने की कोशिश की कि उनके साथ विपक्षी दलों से ज्यादा 38 दल हैं, यह बताता है कि भगवा खेमा विपक्षी एकता के खतरे को भांप रहा है।
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भाजपा नेतृत्व इस खतरे की हर संभव काट खोजने की पूरी कोशिशों में भी जुटा हुआ है। 38 छोटे-छोटे दलों का साथ दिखाकर जनता के बीच यही संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि मोदी की लोकप्रियता बरकरार है और 2024 में उनकी दावेदारी कहीं से कमजोर नहीं है और वह एक बार फिर सरकार बनाने के लिए तैयार हैं। सत्ता पक्ष और विपक्ष के अपने-अपने दावों के बीच सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि विपक्ष मोदी को कितना और कहां नुकसान पहुंचा सकता है?
224 सीटों पर भाजपा का दावा मजबूत
2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 224 लोकसभा सीटों पर 50 फीसदी से ज्यादा मतों के साथ जीत हासिल की थी। इनमें सबसे ज्यादा सीटें उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, दिल्ली, गुजरात, राजस्थान और पूर्वोत्तर राज्यों की हैं। भाजपा का दावा है कि इन सीटों पर विपक्षी दलों के पूरे वोट एक साथ आ जाने के बाद भी उसको कोई खतरा होने वाला नहीं है। लेकिन चूंकि पीएम नरेंद्र मोदी की मतदाताओं के बीच लोकप्रियता बरकरार है, लगभग नौ सालों के शासन के बाद भी सरकार पर भ्रष्टाचार के कोई आरोप नहीं हैं, उसने गुजरात, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड जैसे राज्यों में दुबारा सरकार बनाकर अपनी पकड़ साबित भी की है, और उसकी कल्याणकारी योजनाओं के प्रति लाभार्थी वर्ग में आकर्षण बरकरार है, भाजपा का अनुमान है कि वह इस बढ़त को बनाए रखने में सफल रहेगी।
बदला है माहौल
लेकिन यह ध्यान रखना चाहिए कि 2019 का लोकसभा चुनाव उसी साल 14 फरवरी को पुलवामा के अवंतीपुरा में हुई आतंकी घटना के बाद हुए थे। सरकार ने इसके बदले में 26 फरवरी को बालाकोट के आतंकी ठिकानों पर हमला कर दिया था और इसे मोदी के कट्टर राष्ट्रवाद और मजबूत नेतृत्व का प्रमाण बताया था। इस घटना के बाद पैदा हुए राष्ट्रवाद के खुमार ने भाजपा को जबरदस्त राजनीतिक लाभ दिया और उसने 303 सीटों का आंकड़ा छू लिया। लेकिन इस बार इस तरह का माहौल नहीं है। ऐसे में यह दावा नहीं किया जा सकता कि भाजपा इस बार भी अपनी बढ़त बरकरार रख पाएगी।
गैर भाजपाई मतदाता हुए एकजुट
दरअसल, पश्चिम बंगाल, हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में हुए विधानसभा चुनावों ने भाजपा के लिए एक ऐसी खतरे की घंटी बजाई है, जिसे उसने समय रहते नहीं सुना, तो उसको बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है। वह खतरे की घंटी यह है कि इन राज्यों में राजनीतिक दलों से ज्यादा गैर भाजपाई विचारधारा के मतदाताओं ने एक गैर भाजपा सरकार बनाने के लिए पूरी एकजुटता दिखाई। इसका लाभ विपक्षी दलों को हुआ और वह सरकार बनाने में कामयाब हो गई।
गैर भाजपाई मतदाताओं की यह एकजुटता कई कारणों से देखी जा रही है। मुसलमान मतदाता अभी भी भाजपा के प्रति आशंकित हैं। तीन तलाक विरोधी कानून बनाने के बाद अब समान नागरिक संहिता का मुद्दा भी उछाला जा रहा है। मुस्लिम धार्मिक-राजनीतिक नेता इसे एंटी-मुस्लिम कदम करार देने की कोशिश कर रहे हैं। इससे पूरा मुस्लिम मतदाता विपक्ष विशेषकर कांग्रेस के पीछे लामबंद हो रहा है।
इसके साथ ही सेना में अग्निवीर योजना लाने से नाराज युवा, पुरानी पेंशन को समाप्त करने से सरकार से खफा पूर्व और वर्तमान सरकारी कर्मचारी और कांग्रेस की मुफ्त की घोषणाओं से आकर्षित गरीब लोगों के एक वर्ग ने विपक्ष के लिए एक मजबूत जनाधार तैयार किया है। कांग्रेस ने मुफ्त के चुनावी वादों को और ज्यादा मजबूती से फेंकने की रणनीति बनाई है। ऐसे में यह एकजुटता और मजबूत हो सकती है।
कहां है नुकसान
भाजपा को सबसे ज्यादा नुकसान बिहार में हो सकता है जहां जदयू-राजद के साथ आने से जातिगत समीकरण भाजपा के विरोध में जा सकते हैं। महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे और अजित पवार के भाजपा के साथ आ जाने के बाद भी इन नेताओं के बड़े जननेता न होने के कारण ज्यादातर गैर भाजपाई मतदाता अपना रुख नहीं बदलेंगे और वे भाजपा के विरुद्ध मतदान कर सकते हैं। ऐसे में यह वोट एकजुट होकर कांग्रेस को मजबूत कर सकता है। इसी तरह पश्चिम बंगाल में भी मतदाताओं की एकजुटता भाजपा को नुकसान पहुंचा सकती है जहां से उसने पिछले चुनाव में 18 सीटें हासिल की थीं।
नुकसान बचाने के लिए भाजपा क्या कर सकती है
राजनीतिक विश्लेषक सुनील पांडेय ने अमर उजाला से कहा कि इन संभावित नुकसानों से बचने के लिए भाजपा पूरी मजबूती से यह प्रचारित करने की कोशिश कर रही है कि विपक्षी दलों का गठबंधन भ्रष्ट और परिवारवादी नेताओं का जमघट है। लेकिन यह समझना चाहिए कि इन नेताओं ने भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच भी अपनी पार्टी और समर्थकों की बदौलत जनता में अपनी पकड़ बनाए रखने में कामयाब रहे हैं। ऐसे में भाजपा को इन मतदाताओं को अपने साथ लाने के लिए उनके फायदे वाली योजनाएं बनानी पड़ेंगी। अगर भाजपा ओबीसी-दलित और महादलित जातियों का विपक्ष से ज्यादा बड़ा गठजोड़ खड़ा कर मनोवैज्ञानिक बढ़त लेने की कोशिश में कामयाब रहेगी तो उसे फायदा हो सकता है। बावजूद इसके विपक्षी एकता की इस बड़ी कोशिश से भाजपा भीतर ही भीतर चिंतित भी है और नए सिरे से रणनीति भी बनाने में जुटी है। ऐसे में एनडीए की विस्तारित बैठक से यह संकेत मिल जाएंगे कि विपक्ष के महागठबंधन से निपटने को लेकर आगे की रणनीति क्या होगी।