NDA: सहयोगी दलों के अंतर्विरोध से कैसे निपटेगी भाजपा? सीटों पर मच सकता है घमासान
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विस्तार
सीटों की तालमेल को लेकर इंडिया गठबंधन में ही नहीं, एनडीए में भी अंतर्विरोध सतह पर आ सकता है। इसका बड़ा कारण है कि कई दल अभी से एक दूसरे के विरुद्ध तलवार निकालने लगे हैं, तो कई अभी से ज्यादा सीटों की दावेदारी करने में जुट गए हैं। राजग गठबंधन में ज्यादा भागीदारों के कारण लोकसभा चुनाव में उसके पास सहयोगी दलों की भावनाओं को संतुष्ट करने के लिए भी बहुत कम जगह होगी। ऐसे में आपस में तालमेल गड़बड़ा सकता है। भाजपा इस समस्या से कैसे निपटेगी, यह बड़ा प्रश्न है।
भाजपा के लिए सबसे अधिक लोकसभा सीटों के कारण उत्तर प्रदेश की अहमियत सबसे ज्यादा है। मिशन 80 की तैयारियों में जुटी भाजपा यहां से सभी सीटों को जीतकर अपनी बढ़त बनाए रखना चाहती है। लेकिन सुभासपा, अपना दल (एस) और निषाद पार्टी के साथ आने से उसके लिए सबको सीटों में भागीदारी देना अनिवार्य होगा। कुछ नए क्षेत्रीय दल भी शीघ्र ही उसका हिस्सा बन सकते हैं। ऐसे में सीटों के तालमेल को लेकर पार्टी की परेशानी बढ़ सकती है। पिछले लोकसभा चुनाव में ही यह तनाव सतह पर आ गया था, जब अपना दल ने अधिक सीटों की दावेदारी कर भाजपा की समस्या बढ़ा दी थी।
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चर्चा है कि सुभासपा के ओम प्रकाश राजभर के योगी आदित्यनाथ से तालमेल बहुत सही नहीं है। जबकि राजभर अपने लिए गोरखपुर, आजमगढ़, जौनपुर और वाराणसी क्षेत्र की उन्हीं सीटों पर अपनी दावेदारी ठोंक रहे हैं, जहां भाजपा की अपनी स्थिति पहले से ही काफी मजबूत है। ऐसे में दोनों दलों के बीच तनाव बढ़ सकता है।
भाजपा बिहार की निषाद समुदाय की पार्टी वीआईपी को भी अपने खेमे में लाने के लिए प्रयासरत है। वीआईपी एनडीए खेमे में आने के लिए यूपी में अपने लिए सीटों की मांग कर रही है, जबकि यूपी में निषाद समुदाय की निषाद पार्टी पहले ही मल्लाह समुदाय के मतदाताओं के दावेदार के रूप में उपस्थित है। ऐसे में इस वर्ग के नए दावेदार के आना भी निषाद पार्टी को असहज कर सकता है। यह स्थिति भी भाजपा के लिए परेशानी खड़ी कर सकती है।
बिहार में घमासान
इंडिया के दलों के बीच आपसी तालमेल के बीच भाजपा के लिए बिहार में अपनी सीटों को बनाए रखने की चुनौती बढ़ गई है। यदि राजद-जदयू के बीच सीटों और वोट ट्रांसफर की बेहतरीन तस्वीर बनी, तो भाजपा के लिए यहां से दहाई अंक में सीटों का निकलना भी मुश्किल हो सकता है। लेकिन एनडीए में सबसे ज्यादा घमासान यहीं से सामने आ रही है। भाजपा की सहयोगी पार्टी लोजपा में अभी भी खेमेबाजी कम नहीं हो रही है।
पशुपति पारस और चिराग पासवान के बीच असली लोजपा होने का घमासान अभी थमा नहीं है। वहीं, पशुपति कुमार पारस ने हाजीपुर सीट पर अभी से दावा ठोक दिया है। लेकिन पिता की विरासत पर दावा ठोक रहे चिराग इस सीट पर चुनाव लड़ने के इच्छुक बताए जाते हैं। ऐसे में लोजपा में सीटों पर विवाद बढ़ सकता है।
वहीं, विकासशील इंसान पार्टी यानी वीआईपी के मुकेश सहनी अभी से यह दावा कर रहे हैं कि वे उसी के खेमे में जाएंगे, जो उन्हें ज्यादा सीटों को देने को तैयार होगा। एनडीए में जाने की स्थिति में वे न केवल बिहार में अपने लिए लोजपा जितनी यानी छह सीटें मांग रहे हैं, बल्कि उत्तर प्रदेश में दो और झारखंड में भी एक सीट पर दावेदारी कर रहे हैं। ऐसे में भाजपा के लिए उनको साथ ले पाना आसान नहीं होगा।
पूर्वोत्तर में भी विवाद
पूर्वोत्तर में भाजपा ने अनेक छोटे-छोटे दलों को साथ लाकर अपने सहयोगी दलों की संख्या बड़ा दिखाने की कोशिश की है। लेकिन उसके इस कदम ने उसी को परेशानी में डाल दिया है। पूर्वोत्तर में कुल 26 सीटें हैं। इन सभी दलों को भागीदारी देने के लिए उन्हें कम से कम एक सीट भी दी जाए, तो भाजपा के अपने खाते में सीटों की संख्या बहुत कम हो जाएगी। जबकि उसके अपने कार्यकर्ता भी लोकसभा चुनाव की तैयारियों में जुटे हैं। यदि उन्हें टिकट न मिले तो उनके बीच भी विद्रोह बढ़ सकता है। ऐसे में लोकसभा चुनाव आते-आते भाजपा को अपने सहयोगियों को संभालकर रखना मुश्किल हो जाएगा।