मराठा सरदार शरद पवार ने राजनीतिक शतरंज में दिखाई अपनी पावर
- अंत तक सस्पेंस बनाए रखने में रहे कामयाब, नहीं चली भाजपा की चाल
- कांग्रेस और एनसीपी का आखिरी तक बचाए रखा सम्मान
- शिवसेना को ले आए धर्म निरपेक्षता के धरातल पर
- कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से किया वादा निभाया
- कांग्रेस-एनसीपी ने जितना खोया, उससे ज्यादा पाया
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विस्तार
शरद पवार मराठा राजनीति में निराला दमखम रखते हैं। अपनी पार्टी को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा दिलाकर एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने इसे साबित कर दिया था। एक बार फिर महाराष्ट्र में शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस की सरकार बनाने की पिच तैयार करके उन्होंने खुद की बादशाहत साबित कर दी है।
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद एनसीपी प्रमुख ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से चर्चा की थी। इस चर्चा में शरद पवार ने सोनिया गांधी के सामने कुछ प्रस्ताव रखा था। सोनिया ने भी शरद पवार को आगे बढ़ने के लिए अपनी स्वीकृति दे दी थी और पवार उनसे किया वादा निभाने में सफल रहे। पवार के इस राजनीतिक कौशल का अब कई कांग्रेसी नेता भी लोहा मान रहे हैं।
कायम रखा सस्पेंस
शिवसेना के राज्यसभा सांसद संजय राउत शरद पवार के राजनीतिक कौशल की तारीफ कहते हैं कि उन्हें समझ पाने के लिए 100 बार जन्म लेना पड़ेगा। सच में महाराष्ट्र में सरकार बनाने का दावा करने के लिए तैयार खड़ी शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस के इस मोड़ तक पहुंचने का एनसीपी प्रमुख ने अंत तक सस्पेंस बनाए रखा।
सोनिया गांधी अचानक रुक गईं
नवंबर के दूसरे सप्ताह में शिवसेना-एनसीपी-भाजपा सरकार का गठन होना तय माना जा रहा था। राज्यपाल ने शिवसेना को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया था और कांग्रेस अध्यक्ष अहमद पटेल, केसी वेणुगोपाल, एके एंटनी के समेत अन्य के साथ बैठक कर रही थी।
एक तरह से शिवसेना को समर्थन देने की चिट्ठी सौंपी जानी थी। मगर अचानक सोनिया गांधी की टेलीफोन पर शरद पवार से चर्चा हुई और सारा खेल बदल गया। इसका कारण यह था कि गठबंधन के स्वरूप को लेकर एनसीपी प्रमुख शरद पवार ही पूरी तरह से आश्वस्त नहीं थे। पवार ने इसे साफगोई के साथ कांग्रेस अध्यक्ष को बताया।
कांग्रेस अध्यक्ष को समझते देर नहीं लगी और उन्होंने समर्थन पत्र देने में समय ले लिया। शिवसेना को भी कुछ समझ में नहीं आया। उद्धव ठाकरे पुत्र आदित्य के साथ शरद पवार से मिलने पहुंच गए और इससे पहले संजय राउत लीलावती अस्पताल में सीने में दर्द की शिकायत के साथ भर्ती हो गए।
क्यों हुई देरी?
शरद पवार और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी दोनों कर्नाटक में हुई गलती नहीं करना चाहते थे। शरद पवार की राजनीतिक प्रतिष्ठा दांव पर लगी थी। इसलिए पवार हर कदम फूंक-फूंककर रख रहे थे।
सोनिया गांधी को उद्धव ठाकरे के कांग्रेस और एनसीपी के साथ बने रहने का भरोसा चाहिए था। कांग्रेस पार्टी के रणनीतिकारों को शिवसेना द्वारा धर्म निरपेक्षता का सम्मान करने की गारंटी चाहिए थी। इसका रास्ता न्यूनतम साझा कार्यक्रम (सीएपी) था। शरद पवार को राज्य सरकार को निष्कंटक चलाने में आपसी तालमेल की गारंटी चाहिए थी। इसका उपाय तीनों दलों के प्रभाव वाली समन्वय समिति थी।
कांग्रेस और एनसीपी को शिवसेना को मुख्यमंत्री पद देने में आपत्ति नहीं थी, लेकिन पद पर आदित्य ठाकरे या शिवसेना के अन्य विधायक के स्थान पर राजनीति में अनुभवी उद्धव ठाकरे चाहिए थे। इसके साथ-साथ कांग्रेस और एनसीपी को शिवसेना को सीएम पद देने के बाद राज्य सरकार में अपनी पार्टी का सम्मानजनक स्थान चाहिए था ताकि यह गठबंधन और सरकार दोनों लंबे समय तक स्थायी रह सके।
सभी ने मानी शर्त
एनसीपी और कांग्रेस की पूरी रणनीति का केंद्र शरद पवार थे। उद्धव ठाकरे की आक्रामक राजनीति शरद पवार से मिले भरोसे पर थी। यह भरोसा पवार ने संजय राउत को दिया था। भरोसे को आधार देने के लिए पवार उन्हें देखने अस्पताल गए थे। राउत के करीबी बताते हैं कि पवार ने वहां उन्हें फिर ढांढस बंधाया और कहा कि जल्दबाजी से बचना ठीक रहेगा।
कांग्रेस पार्टी के सूत्र बताते हैं पहले दो स्थितियां रखी गई। पहली शिवसेना भाजपा और एनडीए को लेकर अपनी स्थिति स्पष्ट करे। अलग हो। दूसरी राज्य सरकार का गठन न्यूनतम साझा कार्यक्रम बनाकर उसके आधार पर होगा।
शिवसेना की शर्त पार्टी का ही मुख्यमंत्री बनाए जाने की थी। बताते हैं इसको लेकर तीनों दलों के प्रमुखों में सैद्धांतिक सहमति बन गई। इसके तहत शिवसेना अपने नेता अरविंद सावंत से केन्द्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा देने के लिए कह दिया। धीरे-धीरे सभी मुद्दों पर आपसी बातचीत से सहमति बन गई।
पवार देते रहे गच्चा
भाजपा राजनीति का अवसर देख रही थी तो पवार अपने अनुभव से शतरंज की बाजी खेल रहे थे। उनके शांत, संयम और सधे बयानों से राजनेताओं का ही असमंजस बढ़ रहा था। पवार सोनिया गांधी, उद्धव ठाकरे, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मिलते रहे।
मीडिया के सामने आने से भी परहेज नहीं किया। अपने बयान में सरकार के गठन को लेकर बातचीत को टालते रहे। माना जा रहा है कि पवार की यह राजनीति कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी समझ रही थी। उद्धव ठाकरे और संजय राउत उन पर भरोसा करके चल रहे थे, लेकिन कई बार उनके चेहरे पर शिकन का भाव साफ देखा गया।
कांग्रेस के अहमद पटेल, केसी वेणुगोपाल, एके एंटनी, मल्लिकार्जुन खडग़े सब बारीक निगाह लगाकर पवार पर निर्भर थे। बताते हैं अंततक पवार की कोशिश कांग्रेस और एनसीपी पर अपनी मजबूत पकड़ के आकलन की थी। अंत में अब उन्होंने महाराष्ट्र में भावी सरकार के गठन की घोषणा कर दी है।