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हरियाणा: पीएम मोदी-राहुल भी नहीं तोड़ सके वोटरों की खामोशी, इस जवाब से उम्मीदवार हुए बेहाल
Sun, 20 Oct 2019 09:46 PM IST
अमित कुमार
जितेंद्र भारद्वाज, नई दिल्ली
जितेंद्र भारद्वाज, नई दिल्ली
Published by: अमित कुमार
Updated Sun, 20 Oct 2019 09:46 PM IST
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नरेंद्र मोदी, राहुल गांधी (फाइल फोटो)
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प्रदेश के इतिहास में यह पहला विधानसभा चुनाव है, जिसमें वोटरों की प्रत्यक्ष सहभागिता न के बराबर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी भी वोटरों की खामोशी नहीं तोड़ सके। अनुच्छेद 370 को लेकर मोदी और उनके मंत्री खूब गरजे, लेकिन मतदाता अपने काम में मस्त रहे। अब जबकि वोटिंग शुरू होने में चंद घंटे शेष बचे हैं, डोर टू डोर प्रचार के दौरान वोटरों के एक जवाब ने उम्मीदवारों को बेहाल कर दिया है।
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उम्मीदवार जिस भी द्वार जाते हैं, उन्हें जवाब मिलता है कि आप ही बतायें कि किसे वोट दे दें। वोटरों का यह ‘हाजिर जवाब’ वाला अन्दाज उम्मीदवारों को पसीना-पसीना कर दे रहा है। बता दें कि अभी तक जितने भी विधानसभा चुनाव हुए हैं, उनमें जनता की प्रत्यक्ष भागीदारी देखने को मिली है। इस बार का विधानसभा चुनाव अनूठा माना जा रहा है। चुनाव प्रचार में उम्मीदवार हैं, उनके समर्थक हैं और वे पार्टी कार्यकर्ता जिन्हें कोई जिम्मेदारी मिली है, कुछ सक्रिय नजर आ रहे हैं।
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आम वोटर पूरी तरह शांत है, खामोश है। जिस किसी भी पार्टी का उम्मीदवार उनके द्वार आता है, सबको एक ही जवाब मिलता है, आप ही बताओ हम किसे वोट दें। प्रदेश की राजनीति के जानकार चंद्रप्रकाश बताते हैं, इस दफा वोटर पूरी तरह शांत है। वे सार्वजनिक तौर पर किसी के साथ नहीं आ रहे हैं। जो भी प्रत्याशी उनके पास आता है, वे उसके पक्ष में वोट देने का भरोसा देने की बजाए खुद सवाल कर बैठते हैं कि जिसे आप कह देंगे, उसे ही वोट दे देंगे।
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उनके इस जवाब से उम्मीदवार परेशान हो जाता है। हार थककर वोटरों की खामोशी को वह अपने पक्ष में मानने लगता है। उनके बाद जब कोई दूसरी पार्टी का प्रत्याशी उनके पास आता है तो वह भी उनकी चुप्पी को अपने खाते में मान कर लौट जाता है। यह सब इसलिए हो रहा है कि प्रदेश में कोई बड़ा और प्रभावी चुनावी मुद्दा नहीं
है।
कांग्रेस पार्टी आखिरी पड़ाव में चुनाव को कांटे की टक्कर पर ले आई
चंद्रप्रकाश के मुताबिक, इस बार कांग्रेस पार्टी में स्टार प्रचारकों का टोटा रहा है। सोनिया गांधी की एक रैली रद्द हो गई, जबकि बाकी कई स्टार प्रचारक भी नहीं पहुंचे। केवल भूपेन्द्र हुड्डा और कुमारी शैलजा ही एक जिले से दूसरे जिले में दौड़ते रहे। चुनाव प्रचार के बीच पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर बागी हो गए। उन्होंने पार्टी को अलविदा कह दिया। जिस वक्त कांग्रेस पार्टी अपनी अंदरूनी लड़ाई में उलझी थी, उसी समय मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर अपनी जन आशीर्वाद यात्रा पूरी कर चुके थे।
इसके बाद भाजपा के स्टार प्रचारकों ने प्रदेश में डेरा डाल लिया। पीएम मोदी और अमित शाह के अलावा दर्जनों राष्ट्रीय नेता प्रचार में हिस्सा लेने पहुंचे। खास बात यह रही कि इतना कुछ होने के बाद भी कांग्रेस पार्टी चुनाव के आखिरी पड़ाव में मुकाबले को कांटे का बनाने में कामयाब हो गई। इसका सबसे बड़ा कारण कांग्रेस के दमदार उम्मीदवार हैं। अधिकांश सीटों पर जो उम्मीदवार हैं, वे लम्बे समय तक प्रदेश की राजनीति में सक्रिय रहे हैं। मंत्री, विधायक और चेयरमैन के पदों पर काम कर चुके हैं।
खट्टर के कई मन्त्री कड़े मुकाबले में फंसे हैं
शोधार्थी रविंद्र कुमार बताते हैं, भाजपा का नारा 75 पार, कितना सही होगा, यह तो चुनावी नतीजे ही बताएंगे। अभी तक 22 सीटें ऐसी हैं, जहां भाजपा जीत में है। कांग्रेस के पास ऐसी सात सीटें हैं। बाकी सीटों पर कांग्रेस-भाजपा के बीच कांटे का मुकाबला है। यहां तक कि खट्टर सरकार में मंत्री रहे ज्यादातर उम्मीदवार नेक टू नेक फाइट में चल रहे हैं। कैप्टन अभिमन्यु, ओमप्रकाश धनखड़, कविता जैन, कंवरपाल गुर्जर, कृष्णलाल पंवार और कृष्ण बेदी कड़े मुकाबले में फंसे हैं।
रविंद्र कुमार के मुताबिक, पिछले बीस दिन की बात करें तो भाजपा के 65 के पार जाने के संकेत मिल रहे थे। दस दिन में ये ग्राफ नीचे आ गया। अब हालत यह है कि खुद की जीत आसान बताने वाले भाजपाई धुरंधर पसीने से तरबतर हैं। लोग कहते हैं, ठीक है कि खट्टर सरकार में कई अच्छे काम भी हुए हैं। एक बड़ी दिक्कत भी है। वह यह है कि खट्टर किसी से मिलते जुलते नहीं हैं।