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Narendra Dabholkar Case: 2013 में हत्या, सीबीआई जांच से फैसले तक; नरेंद्र दाभोलकर हत्याकांड की पूरी कहानी

Fri, 10 May 2024 12:07 PM IST
शिवेंद्र तिवारी स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: शिवेंद्र तिवारी Updated Fri, 10 May 2024 12:07 PM IST
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सार
Narendra Dabholkar Murder Case: सामाजिक कार्यकर्ता नरेंद्र दाभोलकर की हत्या के मामले में अदालत ने 10 मई को अपना फैसला सुना दिया है। 2013 में दाभोलकर की हत्या पुणे में कर दी गई थी। 2014 में इस मामले को सीबीआई को सौंप दिया गया था।
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Narendra Dabholkar murder case timeline from CBI investigation to verdict
नरेंद्र दाभोलकर हत्याकांड - फोटो : AMAR UJALA

विस्तार

सामाजिक कार्यकर्ता डॉक्टर नरेंद्र दाभोलकर की हत्या के मामले में अदालत ने फैसला सुना दिया है। पुणे की एक अदालत ने दाभोलकर की हत्या के मामले में आज दो आरोपियों को दोषी ठहराया और तीन को बरी कर दिया। दाभोलकर महाराष्ट्र में अंधविश्वास के खिलाफ आंदोलन चलाने के लिए जाने जाते थे। 2013 में नरेंद्र दाभोलकर की हत्या कर दी गई थी। मई 2014 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने दाभोलकर हत्या मामले को सीबीआई को सौंपने का आदेश दिया था। 


आइये जानते हैं कि नरेंद्र दाभोलकर की हत्या कब हुई थी? पूरी घटना क्या थी? मामला सीबीआई तक कैसे पहुंचा? आरोपियों के खिलाफ क्या कार्रवाई हुई? अदालत में क्या हुआ? अभी इस मामले में क्या हुआ है? 

नरेंद्र दाभोलकर
नरेंद्र दाभोलकर - फोटो : Maharashtra Andhashraddha Nirmoolan Samiti
नरेंद्र दाभोलकर की हत्या कब हुई थी?
20 अगस्त 2013 को पुणे में मोटरसाइकिल सवार दो हमलावरों ने सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की हत्या कर दी थी। घटना के वक्त दाभोलकर सुबह की सैर के लिए घर से निकले। ओमकारेश्वर (महर्षि विट्ठल रामजी शिंदे) पुल पर सुबह 7:15 बजे दाभोलकर पर हमला किया गया। दाभोलकर पर पांच गोलियां चलाई गईं। दो गोलियां मिसफायर हुईं, लेकिन दो गोलियां दाभोलकर के सिर में और एक छाती में लगीं। जब वे गिर पड़े, तो दोनों हमलावर पास में खड़ी एक मोटरसाइकिल से भाग निकले। दाभोलकर की मौके पर ही मौत हो गई। 

दो जाने-माने हिस्ट्रीशीटर दाभोलकर की हत्या में मुख्य संदिग्ध के रूप में नामित किए गए थे। आरोपियों को घटना के दिन ही गिरफ्तार कर लिया गया। हिस्ट्रीशीटर के पास से हथियार और कारतूस बरामद हुए थे जो दाभोलकर के शरीर से बरामद गोलियों से मेल खाते थे। हालांकि, दोनों संदिग्धों पर कभी औपचारिक रूप से हत्या का आरोप नहीं लगाया गया और इसके तुरंत बाद उन्हें जमानत दे दी गई। इस मामले की जांच बाद में सीबीआई को सौंप दी गई।

दाभोलकर की हत्या के बाद महाराष्ट्र में अंधविश्वास विरोधी कानून लागू 
दाभोलकर की हत्या ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। सर्जन अमित थडानी की पुस्तक 'रेशनलिस्ट मर्डर्स' में लिखते हैं कि महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने डॉ. दाभोलकर की हत्या को प्रगतिशील महाराष्ट्र की छवि पर आघात बताया था। एक साक्षात्कार में चव्हाण ने दावा किया था कि गोडसे की विचारधारा मानने वाले लोग दाभोलकर की हत्या के लिए जिम्मेदार हैं। उधर राज्य में अंधविश्वास विरोधी कानून लागू करने की जबरदस्त बहस चल रही थी। 

मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि अंधविश्वास विरोधी विधेयक पारित करवाना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। तत्कालीन केंद्रीय कृषि मंत्री और एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने कहा कि जिस प्रगतिशील विचार के लिए उन्होंने अपनी जान दी, वह राज्य में नहीं मरेगा। ऐसा लगता है कि उनके विचारों के खिलाफ किसी ने उनकी हत्या की। अखिल भारतीय अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के प्रमुख श्याम मानव ने आरोप लगाया कि महाराष्ट्र में फासीवादी मानसिकता अपनी सीमा पार कर चुकी है और इसे समाज के सामाजिक ताने-बाने के लिए खतरा बताया। इस बीच चव्हाण के नेतृत्व वाली महाराष्ट्र सरकार ने अंधविश्वास विरोधी कानून लागू करा दिया, जिसे वह 2003 से पारित कराना चाहती थी। दूसरी ओर डॉ. दाभोलकर की हत्या का मामला भी लगातार चर्चा में बना हुआ था। 
 

मामले की शुरुआती जांच
पुलिस की जांच शुरू की। हत्यारे घटनास्थल के आसपास के सीसीटीवी कैमरों में रिकॉर्ड तो हुए, लेकिन तस्वीरें इतनी धुंधली थीं कि उन्हें स्पष्ट रूप से पहचाना नहीं जा सका। हत्या के कुछ चश्मदीद गवाह थे जिनमें दो सफाईकर्मी शामिल थे। इनमें से कोई भी गोलीबारी की जगह के नजदीक नहीं था। एक गवाह जिसने घटना को करीब से देखा था उसने बताया था कि हमलावर 7756 नंबर वाली गाड़ी से भागे थे। 

पुणे पुलिस ने हत्या की व्यापक जांच शुरू की, जिसमें 96 मॉर्निंग वॉकर, पुणे, नासिक और ठाणे की विभिन्न जेलों में बंद 200 अपराधी और गैंगस्टर समेत करीब 1,500 लोगों से पूछताछ की गई। दादर स्टेशन और अन्य स्थानों सहित 16 स्थानों से 8 करोड़ फोन कॉल का डेटा, जहां दाभोलकर पिछले दिन गए थे और 110 सीसीटीवी कैमरों से फुटेज भी जुटाई गई। पुलिस ने पुणे और अन्य आसपास के शहरों में 7756 नंबर और इसी तरह के दिखने वाले नंबर वाली काली मोटरसाइकिलों की एक सूची भी तैयार की, लेकिन इससे कोई सुराग नहीं मिला।

जिस दिन दाभोलकर को गोली मारी गई, उसी शाम गोविंद नारायण कामत नाम के व्यक्ति ने विश्रामबाग पुलिस स्टेशन पुणे में एक प्राथमिकी दर्ज कराई। कामत ने दावा किया कि उन पर डॉ. सुषमा कोठारी और डॉ. लोब ने हमला किया, दोनों आरोपी डॉ. दाभोलकर की संस्था के खिलाफ केस लड़ रहे थे। अपनी प्राथमिकी में उन्होंने संदेह जताया कि दाभोलकर की हत्या के पीछे उनका हाथ है। हालांकि, इस दावे के समर्थन में कोई सबूत नहीं दिया गया। डॉ. सुषमा कोठारी ने कामत के खिलाफ हमले के लिए जवाबी शिकायत दर्ज कराई। उन्हें पूछताछ के लिए हिरासत में लिया गया था। पुणे पुलिस द्वारा की गई पूछताछ में दाभोलकर की हत्या में उनकी या उसके सहयोगी की संलिप्तता का पता नहीं चला और उनमें से किसी को भी गिरफ्तार या आरोपित नहीं किया गया।

सीबीआई जांच की मांग 
'द रेशनलिस्ट मर्डर्स' किताब के अनुसार, केतन तिरोडकर नाम के व्यक्ति ने बॉम्बे हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की, जिसमें दाभोलकर हत्या मामले को केंद्रीय एजेंसी को सौंपने की मांग की गई। तिरोडकर को पुलिस पर भरोसा नहीं था। जनहित याचिका में दावा किया गया था कि पुणे पुलिस को ज्योतिष चिकित्सकों की संभावित संलिप्तता के बारे में कुछ जानकारी मिली थी, जिनके खिलाफ दाभोलकर आंदोलन शुरू करने वाले थे। मई 2014 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने तिरोडकर के पक्ष में अपना फैसला सुनाया और दाभोलकर हत्या मामले को सीबीआई को सौंपने का आदेश दिया।

मामले में किसकी-किसकी गिरफ्तारी हुई?
20 अगस्त 2013 को सुबह करीब 10 बजे हत्या के ठीक तीन घंटे बाद पहली गिरफ्तारी हुई। दो चर्चित हथियार डीलर और हिस्ट्रीशीटर मनीष नागोरी और विकास खंडेलवाल को ठाणे एंटी एक्सटॉर्शन सेल और मुंब्रा पुलिस ने कोपरखैराने, नवी मुंबई से एक असंबंधित कथित जबरन वसूली मामले में गिरफ्तार किया।
  
दोनों व्यक्तियों से बरामद हथियारों में एक 7.65 मिमी की देसी पिस्तौल, चार कारतूस और दो जिंदा गोलियां शामिल थीं। जब्त किए गए हथियारों को जांच के लिए फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) कलिना में जमा किया गया था। कुछ महीने बाद एफएसएल कलिना ने रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें कहा गया कि पुलिस ने अपराध स्थल से दो जिंदा कारतूस सहित चार कारतूस बरामद किए थे, जो नागोरी और खंडेलवाल से बरामद एक ही 7.65 मिमी पिस्तौल से चलाए गए थे। रिपोर्ट में कहा गया है कि दाभोलकर के शरीर में मिली गोली के निशान बरामद कारतूसों से मिलते-जुलते थे और हो सकता है कि नागोरी और खंडेलवाल से जब्त हथियार से चलाई गई हो। 

इसके बाद 20 जनवरी 2014 को पुलिस ने दाभोलकर की हत्या के लिए मनीष नागोरी और विकास खंडेलवाल को औपचारिक रूप से गिरफ्तार किया। खंडेलवाल ने पुलिस को दिए अपने बयान में स्वीकार किया कि उसके पास एक काले रंग की हीरो होंडा मोटरसाइकिल है। दोनों ने दावा किया कि हत्या के समय वे घर पर सो रहे थे और इस बात से इनकार किया कि उनके पास से बरामद हथियारों का इस्तेमाल दाभोलकर की हत्या में किया गया था।

द रेशनलिस्ट मर्डर्स किताब के अनुसार, पर्याप्त परिस्थितिजन्य साक्ष्य के बावजूद मामले में कोई आरोप पत्र दायर नहीं किया गया। गिरफ्तार किए गए दो व्यक्तियों नागोरी और खंडेलवाल को न्यायिक मजिस्ट्रेट (प्रथम श्रेणी) एबी शेख की अदालत में पेश किया गया, जहां उन्होंने सनसनीखेज दावा किया कि उन्हें दाभोलकर की हत्या की बात स्वीकार करने के लिए मुंबई एटीएस प्रमुख राकेश मारिया द्वारा 25 लाख रुपये की पेशकश की गई थी और हिरासत में उन्हें प्रताड़ित किया गया था और नार्कोएनेलिसिस और लाई डिटेक्टर टेस्ट से गुजरना पड़ा था। हालांकि, न्यायाधीश ने उनके बयान को रिकॉर्ड पर नहीं लिया और उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया। बाद में नागोरी ने आरोप लगाने के लिए माफी मांगी और कहा कि यह भावनात्मक था।

मार्च 2014 में पहचान के लिए एक परेड आयोजित की गई थी। गवाह स्पष्ट रूप से लाइन-अप में नागोरी या खंडेलवाल को पहचान नहीं पाए। विनय केलकर, जिस गवाह की जानकारी पर हत्यारों के स्केच तैयार किए गए थे, परेड में मौजूद नहीं थे।

21 अप्रैल 2014 को पुणे पुलिस ने स्थानीय अदालत में एक हलफनामा दायर किया। इस हलफनामे में पुलिस ने कहा कि उनके पास नागोरी और खंडेलवाल के खिलाफ आरोप पत्र दायर करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हैं और दोनों को जमानत दे दी गई। अदालत ने जमानत देते हुए जांच में खामियों के लिए सह-सहायक आयुक्त राजेंद्र भामरे को कारण बताओ नोटिस जारी किया। नागोरी और खंडेलवाल अन्य आरोपों में जेल में बंद रहे।

दाभोलकर मामले में आरोप पत्र
नागोरी और खंडेलवाल के खिलाफ मामले वापस नहीं लिए गए, भले ही सीबीआई के आरोप पत्र में दोनों व्यक्तियों में से किसी का भी उल्लेख नहीं है। जुलाई 2016 में मनीष नागोरी और विकास खंडेलवाल ने अदालत के समक्ष एक आवेदन दायर किया जिसमें मामले में उनके खिलाफ आरोप हटाने की मांग की गई। सीबीआई ने आखिरकार 5 अप्रैल 2019 की रात को कोल्हापुर जेल के बाहर पहली बार नागोरी से मुलाकात की। सीबीआई ने नागोरी से अनौपचारिक रूप से पूछताछ की, जिन्होंने दावा किया कि वे दाभोलकर या उनके काम के बारे में कुछ भी नहीं जानते थे और उनकी हत्या से उनका कोई लेना-देना नहीं था। नागोरी ने तब आरोप लगाया कि सीबीआई ने उनसे एक बयान पर हस्ताक्षर करने की कोशिश की थी और उन्होंने इनकार कर दिया था और मांग की थी कि उनके बयान की वीडियो रिकॉर्डिंग की जाए।

गोवा पुलिस ने 6 दिसंबर 2013 को दाभोलकर मामले में मंगेश चौधरी और मुमताज मुन्नाभाई रसूल अंसारी नामक दो लोगों को गिरफ्तार किया था। पुलिस ने कोई भी विवरण देने से इनकार कर दिया। दोनों का आपराधिक इतिहास था। पूछताछ करने पर उन्होंने दाभोलकर की हत्या की बात कबूल कर ली। हालांकि, मुंबई लाए जाने पर उन्होंने अपने बयान वापस ले लिए और दावा किया कि उन्होंने डर के कारण अपना अपराध कबूल कर लिया था। बाद में दोनों को बिना किसी आरोप के छोड़ दिया गया। दाभोलकर की हत्या के 1.5 साल से अधिक समय बाद भी कोई सुराग नहीं मिला, इसलिए जांच धीरे-धीरे पूरी तरह से रुक गई। 

डॉ. दाभोलकर की हत्या के तीन साल बाद 6 सितंबर 2016 को सीबीआई ने अपना आरोप पत्र दाखिल किया। नरेंद्र दाभोलकर हत्या मामले में अपने पहले आरोप पत्र में डॉ. वीरेंद्रसिंह तावड़े को मुख्य साजिशकर्ता के रूप में नामित किया गया। दाभोलकर के हत्यारों की पहचान विनय पवार और सारंग अकोलकर के रूप में की गई और उन्हें फरार घोषित किया गया। सीबीआई ने दावा किया कि उनके पास ऐसे चश्मदीद गवाह हैं जिन्होंने हत्यारों की पहचान की है। सीबीआई ने एक चश्मदीद गवाह के रूप में विनायक बुवासाहेब पलासकर को पेश किया। पलासकर ने विनय पवार की पहचान दाभोलकर के हत्यारे के रूप में की।

घटना के करीब 11 साल बाद फैसला
6 सितंबर 2019 को सीबीआई ने दाभोलकर हत्या मामले में सचिन अंदुरे और कलास्कर के खिलाफ पूरक आरोप-पत्र दाखिल किया। 2019 के अंत में सीबीआई ने दावा किया कि विक्रम भावे मास्टरमाइंड थे। सीबीआई ने इस मामले में वीरेंद्र सिंह तावड़े, सचिन आंदुरे और शरद कालस्कर को गिरफ्तार किया था। सीबीआई ने इन तीनों के अलावा वकील संजीव पुनालेकर और उनके सहायक विक्रम भावे के खिलाफ 2019 में आरोप पत्र दायर किया था। सीबीआई ने आरोपियों के खिलाफ गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत भी आरोप लगाए थे। तावड़े, आंदुरे और कालस्कर जेल में हैं। जबकि पुनालेकर और भावे जमानत पर बाहर हैं।

2023 में दाभोलकर की बेटी मुक्ता ने इस बात पर दुख जताया कि 10 साल बीत गए लेकिन दाभोलकर की हत्या के पीछे के मास्टरमाइंड को गिरफ्तार नहीं किया गया है। पिछले महीने सुनवाई के दौरान अतिरिक्त विशेष सत्र न्यायाधीश ए ए जाधव ने मामले में फैसला सुनाने के लिए 10 मई की तारीख तय की थी। करीब तीन साल तक चली सुनवाई के बाद सत्र न्यायाधीश पीपी जाधव ने  फैसला सुनाया। अदालत ने दाभोलकर की हत्या के मामले में आज दो आरोपियों को दोषी ठहराया और तीन को बरी कर दिया। आरोपी सचिन अंदुरे, शरद कालस्कर को दोषी ठहराया गया और पांच लाख रुपये के जुर्माने के साथ आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। डॉ. वीरेंद्र सिंह तावड़े, विक्रम भावे और संजीव पुनालेकर को बरी कर दिया गया। 
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