नामवर सिंहः हिंदी साहित्य से उठ गई छतनार वृक्ष की छाया
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हिन्दी साहित्य के प्रख्यात समालोचक, गहन अध्येता और प्राध्यापक नामवर सिंह ने पिछले छह दशक से अधिक समय से अपनी गरिमामय उपस्थिति के साथ न सिर्फ हिंदी आलोचना को साहित्य के केंद्र में बनाए रखा, बल्कि लेखकों और पाठकों को रचना को देखने और समझने की नई दृष्टि भी दी। 28 जुलाई 1926 को बनारस के जीयनपुर गांव में जन्मे नामवर सिंह ने 93 साल की उम्र में 19 फरवरी को दिल्ली में अंतिम सांस ली। इससे पूरा हिंदी जगत शोक में डूबा हुआ है।
डॉ. नामवर सिंह हिन्दी आलोचना की वाचिक परम्परा के आचार्य कहे जाते हैं। जैसे बाबा नागार्जुन घूम-घूमकर किसानों और मजदूरों की सभाओं से लेकर छात्र-नौजवानों, बुद्धिजीवियों और विद्वानों तक की गोष्ठियों में अपनी कविताएं बेहिचक सुनाकर जनतान्त्रिक संवेदना जगाने का काम करते रहे, वैसे ही नामवर जी घूम-घूमकर वैचारिक लड़ाई लड़ते रहे, रूढ़िवादिता, अंधविश्वास, कलावाद, व्यक्तिवाद आदि के खिलाफ चिन्तन को ही प्रेरित करते रहे हैं। इस वैचारिक, सांस्कृतिक अभियान में नामवर जी एक तो विचारहीनता की व्यवहारिक काट करते रहे हैं, दूसरे वैकल्पिक विचारधारा की ओर से लोकशिक्षण भी करते रहे।
डॉ सिंह तीन-चार दशक तक लगातार आलोचना साहित्य के शीर्ष पर बने रहे। साहित्य की दुनिया में उनकी वही भूमिका रही जो हिंदी सिनेमा में अमिताभ बच्चन की रही। नामवर जी हिन्दी के सर्वोत्तम वक्ता माने जाते थे। उनके व्याख्यान में भाषा के प्रवाह के साथ विचारों की लय होती थी। इस लय का निर्माण विचारों के तारतम्य और क्रमबद्धता से होता था। अनावश्यक तथ्यों और प्रसंगों से वे बचते रहे और रोचकता का भी हमेशा ध्यान रखते रहे।
उन्होंने काशी विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में एमए और पीएचडी करने के बाद काशी हिंदू विश्वविद्यालय में अध्यापन किया। 1959 में चकिया चन्दौली के लोकसभा चुनाव में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से चुनाव लड़े और असफल होने के बाद बीएचयू छोड़ दिया। इसके बाद वह दिल्ली आ गए थे, यहां उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में भारतीय भाषा केंद्र की स्थापना की। नामवर सिंह ने हिंदी साहित्य में आलोचना और साक्षात्कार विधा को नई पहचान ही नहीं बल्कि नई ऊंचाई भी दी।
डॉ सिंह से जब भी पूछा जाता कि इतने दशकों तक आलोचक के तौर पर काम करने के बाद यदि कोई इच्छा रह गई हो, जिसे आप याद करना चाहते हैं, तो वो गालिब का शेर 'हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले' याद करते हुए कहते थे, 'मेरी कई तमन्नाएं अधूरी हैं, क्या कहूं और क्या न कहूं और हर इच्छा बाकाफी बलवती है।'
हिंदी साहित्य पर कई दशक तक राज करने वाले डॉ. सिंह को कई बड़े सम्मानों से नवाजा जा चुका है। हिन्दी जगत में उत्कृष्ट योगदान और हिन्दी भाषा और साहित्य के क्षेत्र में समर्पित भाव से काम करने वाले सिंह को साल 1971 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। वहीं, 1991 में उन्हें हिन्दी अकादमी के सर्वोच्च सम्मान शलाका सम्मान और 1993 में हिंदी अकादमी, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के 'साहित्य भूषण सम्मान' से पुरस्कृत किया गया था।
एक बार किसी साक्षात्कार में हिंदी साहित्य के मशहूर लेखक काशीनाथ सिंह जी से जब नामवर सिंह के बारे में पूछा गया, तो उनके भाई काशीनाथ सिंह बड़ी दिलचस्प बात बताई। उन्होंने कहा, 'मैं सन् 1953 से भइया को देख रहा हूं। असल में वे एक योगी का जीवन जीते रहे हैं। उन्हें साहित्यिक योगी कह सकते हैं। किताब-कॉपी, पढ़ाई-लिखाई के सिवा उन्होंने जीवन में कुछ जाना ही नहीं।'
आगे उन्होंने कहा, 'अपने जीवन के संदर्भ में जब वे नागफनी का जिक्र करते हैं, तो इशारा उनके संघर्षों की तरफ होता है। नागफनी में कांटे ज्यादा होते हैं। उनकी जिंदगी भी कांटों भरी रही है। दो विश्वविद्यालयों से वे निकाले गए। एक जगह उन्हें मुकदमे का भी सामना करना पड़ा। जोधपुर जाने से पहले पांच साल बेकार रहे। जिस आदमी से मिलनेवालों का दिन-रात तांता लगा रहता हो, उसका यूं अकेला पड़ जाना सालता है। पांच वर्षों तक कोई आदमी झांकने तक नहीं आया कि नामवर कैसे हैं। दूसरे, उनकी बातें भी तो कभी-कभी बहुतों के लिए नागफनी हुआ करती हैं। आलोचना में भी तो नागफनी के कांटे दिखाई पड़ते हैं, तो उसकी ओर भी इशारा है। लेकिन, असल में भइया छतनार वृक्ष रहे। एक विशाल वृक्ष। सबको छाया देनेवाले और उसी तरह अडिग भी रहे।'
काशीनाथ जी सही कहते हैं। सबको छाया देने वाला वृक्ष। वो वृक्ष जिसकी छाया अब हिन्दी साहित्य को राहत और ठंडक नहीं देगी।