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मुस्लिम राष्ट्रीय मंच का एलान: महिलाओं की शादी की न्यूनतम उम्र और समान अधिकारों के लिए करेंगे राष्ट्रव्यापी आंदोलन
Sat, 05 Mar 2022 08:18 PM IST
गौरव पाण्डेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: गौरव पाण्डेय
Updated Sat, 05 Mar 2022 08:18 PM IST
सार
मंच का मानना है कि शरिया कानून के नाम पर मुस्लिम पर्सनल लॉ बच्चियों के साथ खिलवाड़ कर रहा है और इस पर राष्ट्रव्यापी आंदोलन की जरूरत है।
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : पिक्साबे
विस्तार
देश के मुस्लिम समाज में महिलाओं को बराबरी का अधिकार दिलाने के लिए मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ने राष्ट्रव्यापी आंदोलन चलाने की घोषणा की है। मंच ने कहा कि भारत का मुस्लिम समाज जबरदस्ती थोपी गई कुरीतियों को लेकर जागरूक हो चुका है। अब समाज तीन तलाक, हलाला, बहुविवाह, हिजाब, तालीम, रोजगार, बाल विवाह जैसे मुद्दों पर राष्ट्रव्यापी मंथन और बदलाव चाहता है।
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मंच ने कहा कि अब मुस्लिम महिलाएं भी बराबरी का हक चाहती हैं। उनका कहना है कि जिस प्रकार मंदिरों, गिरिजाघरों और गुरुद्वारों में महिलएं पूजा-अर्चना करती हैं उसी तरह मस्जिदों में भी महिलाओं के लिए नमाज अदा करने की व्यवस्था होनी चाहिए। मुस्लिम महिलाओं को भी कम से कम जुमे के साथ-साथ ईद और बकरीद की नमाज पढ़ने का अधिकार मिलना चाहिए।
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यूपी और उत्तराखंड के 40 जिलों का मंच ने किया दौरा
इसे लेकर जारी एक विज्ञप्ति में कहा गया है कि मंच ने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के लगभग 40 जिलों का दौरा किया। इससे पता चला है कि मुस्लिम महिलाओं और बुद्धिजीवियों को महसूस हो रहा है कि इस्लाम में सुधार की जरूरत है। उलेमा भी मानते हैं कि कुरान शरीफ में जिन बातों का जिक्र नहीं है उन्हें भी जबरन शरिया का हिस्सा बना कर भारतीय मुस्लिमों पर थोपा जा रहा है।
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इसने कहा कि बड़ी तादाद में मुसलमानों का मानना है कि जिस तरह तीन तलाक को लेकर मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ने समाज को जागरूक किया और अदालत में भी इसके खिलाफ याचिका डाली, उसी तरह विवाह की न्यूनतम आयु को लेकर भी मंच और सभ्य समाज मिलकर जनांदोलन शुरू करें। मंच का मानना है कि अब विवाह की न्यूनतम उम्र की सीमा को लेकर कानून बनना चाहिए।
शरिया कानून के नाम पर बच्चियों से हो रहा खिलवाड़
मंच का मानना है कि शरिया कानून के नाम पर मुस्लिम पर्सनल लॉ बच्चियों के साथ खिलवाड़ कर रहा है और इस पर राष्ट्रव्यापी आंदोलन की जरूरत है। इस्लामी कानून बच्चियों में माहवारी शुरू होते ही उसे निकाह के योग्य मान लेता है। अब चाहे बच्ची की उम्र 11 या 12 वर्ष की क्यों न हों। ऐसे में 20 -22 वर्ष की आयु तक पहुंचने तक लड़की चार से छह बच्चों की मां बन चुकी होती है।
मुस्लिम मंच का कहना है कि इन बातों को ध्यान में रखते हुए मुस्लिम समाज के उत्थान और बदलाव के प्रति देशभर में जागरूकता अभियान और जन आंदोलन चलाया जाएगा। मंच के विभिन्न प्रकोष्ठ अपनी भूमिका को निभाते हुए समाज के विभिन्न तबकों को साथ लेकर सुधार की योजना तैयार करेंगे। इन योजनाओं को क्रमबद्ध रूप से पूरे देश में अभियान के तौर पर चलाया जाएगा।