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मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सचिव बोले- समलैंगिकता स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Mon, 16 Jul 2018 12:31 PM IST
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समलैंगिकता को अपराध मानने वाली धारा 377 की सुनवाई से अब तक खुद को दूर रखने वाला ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड अब इस मामले पर खुलकर सामने आ गया है। बोर्ड का कहना है कि केंद्र सरकार द्वारा समलैंगिकता को अपराध करार देने वाले प्रावधान(धारा-377) को निरस्त करने की गुहार वाली याचिकाओं का विरोध नहीं करने का निर्णय प्रतिबंध के पक्ष में था। बोर्ड ने सरकार के इस फैसले पर नाराजगी जताई है कि उसने इस मसले को सुप्रीम कोर्ट के विवेक पर छोड़ दिया।
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सचिव जफरयाब जिलानी ने रविवार को कहा कि समलैंगिकता 'स्वास्थ्य के लिए हानिकारक' है और सरकार को इस मामले पर खड़े होकर अदालत में लड़ना चाहिए। उन्होंने कहा कि हम धारा 377 का समर्थन करते हैं। यह अपराध ही रहना चाहिए। पारंपरिक इस्लामी कानून और लॉ बोर्ड में भी समलैंगिकता पर प्रतिबंध लगा हुआ है।
बता दें कि केंद्र सरकार ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर कहा था कि वह समलैंगिक वयस्कों द्वारा सहमति से बनाए गए संबंध को अपराध की श्रेणी में रखने के प्रावधान (धारा-377) को निरस्त करने वाली याचिकाओं का विरोध नहीं करेगी और इसे अदालत के विवेक पर छोड़ दिया है। हालांकि सरकार ने संविधान पीठ से समलैंगिकों के बीच विवाह, गोद लेने और एलजीबीटी समुदाय के अन्य नागरिक अधिकारों पर गौर न करने का आग्रह किया है।
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गौरतलब है कि भारत में समलैंगिक यौन संबंध बनाना अपराध की श्रेणी में आता है। आईपीसी की धारा 377 के तहत अगर कोई पुरुष, महिला या पशु के साथ अप्राकृतिक रूप से संबंध बनाता है तो इस अपराध के लिए उसे 10 साल या आजीवन कारावास की सजा सुनाई जा सकती है।
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मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सचिव जफरयाब जिलानी ने रविवार को कहा कि समलैंगिकता 'स्वास्थ्य के लिए हानिकारक' है और सरकार को इस मामले पर खड़े होकर अदालत में लड़ना चाहिए। उन्होंने कहा कि हम धारा 377 का समर्थन करते हैं। यह अपराध ही रहना चाहिए। पारंपरिक इस्लामी कानून और लॉ बोर्ड में भी समलैंगिकता पर प्रतिबंध लगा हुआ है।
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बता दें कि केंद्र सरकार ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर कहा था कि वह समलैंगिक वयस्कों द्वारा सहमति से बनाए गए संबंध को अपराध की श्रेणी में रखने के प्रावधान (धारा-377) को निरस्त करने वाली याचिकाओं का विरोध नहीं करेगी और इसे अदालत के विवेक पर छोड़ दिया है। हालांकि सरकार ने संविधान पीठ से समलैंगिकों के बीच विवाह, गोद लेने और एलजीबीटी समुदाय के अन्य नागरिक अधिकारों पर गौर न करने का आग्रह किया है।
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गौरतलब है कि भारत में समलैंगिक यौन संबंध बनाना अपराध की श्रेणी में आता है। आईपीसी की धारा 377 के तहत अगर कोई पुरुष, महिला या पशु के साथ अप्राकृतिक रूप से संबंध बनाता है तो इस अपराध के लिए उसे 10 साल या आजीवन कारावास की सजा सुनाई जा सकती है।