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Mumbai: पानसरे की किताब का हवाला देने पर प्रोफेसर के खिलाफ कार्रवाई की मांग, हाईकोर्ट ने लगाई पुलिस को फटकार

Sat, 27 Jul 2024 09:44 PM IST
मेघा झा न्यूज डेस्क, अमर उजाला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला Published by: मेघा झा Updated Sat, 27 Jul 2024 09:44 PM IST
सार

सतारा जिले के एक पुलिस स्टेशन के सब-इंस्पेक्टर ने अगस्त 2023 में भेजे गए एक पत्र को प्रोफेसर ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। पुलिस ने कोर्ट को कहा कि पत्र बिना शर्त वापस ले लिया जाएगा। शुक्रवार को याचिका का निपटारा कर दिया गया।

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Mumbai: Demand for action against professor for citing Pansare's book, HC reprimanded police
अदालत (सांकेतिक) - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक प्रोफेसर के खिलाफ कार्रवाई की मांग करने पर सतारा पुलिस की जमकर फटकार लगाई। कोर्ट ने पुलिस से पूछा कि यह किस तरह का लोकतंत्र है और पूछा कि क्या प्रोफेसर के खिलाफ कोई अपराध बनता है। दरअसल प्रोफेसर ने एक कार्यक्रम के दौरान उत्तेजित छात्रों को शांत करते हुए दिवंगत कार्यकर्ता गोविंद पानसरे की किताब "शिवाजी कोन होता" का हवाला दिया था। 
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दरअसल पिछले साल क्रांति दिवस (9 अगस्त) को एक प्रोफेसर ने आदरणीय हस्तियों पर एक व्याख्यान दिया था। भाषण के दौरान छात्रों का एक वर्ग उत्तेजित हो गया। क्योंकि छात्रों को लगा कि उक्त हस्तियों के बारे में कुछ अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया गया था। अदालत में दाखिल एक याचिका में वकील ने कहा गया है कि व्याख्यान के दौरान मौजूद अहेर ने दावा किया कि उन्होंने स्थिति को शांत करने का प्रयास किया। लेकिन ऐसा करने के लिए पानसरे की पुस्तक का हवाला दिया।
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जस्टिस रेवती मोहिते-डेरे और पृथ्वीराज के चव्हाण की खंडपीठ डॉ. मृणालिनी अहेर की याचिका पर सुनवाई की। सतारा जिले के एक पुलिस स्टेशन के सब-इंस्पेक्टर ने अगस्त 2023 में भेजे गए एक पत्र को चुनौती दी। पुलिस ने कोर्ट को कहा कि पत्र बिना शर्त वापस ले लिया जाएगा। शुक्रवार को याचिका का निपटारा कर दिया गया। प्रोफेसर ने दावा किया कि पत्र में बेशर्मी से और अपनी शक्तियों का पूरी तरह से अतिक्रमण करते हुए पचवाड़ में यशवंतराव चव्हाण कॉलेज के प्रिंसिपल से अहेर के खिलाफ जांच करने को कहा। साथ ही पुलिस स्टेशन को उसकी रिपोर्ट सौंपने के लिए कहा गया है।
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प्रधानाचार्य अहेर ने दावा किया कि कुछ उत्तेजित और बेईमान दर्शकों ने उन पर हमला करने की कोशिश की। उन्होंने आरोप लगाया कि वह साथी प्रोफेसर के व्यवहार की निंदा करने के बजाय उनका समर्थन कर रही थीं। उन्होंने बताया कि मौके पर मौजूद इंस्पेक्टर ने प्रिंसिपल से प्रोफेसर के खिलाफ विभागीय जांच करने का आदेश दिया। उन्होंने अपनी याचिका में कहा कि नियुक्ति प्राधिकारी न होने के बावजूद पुलिस अधिकारी के अनुरोध पर इस तरह के मामले की जांच शुरू करना ही गैरकानूनी है। हाई कोर्ट की पीठ ने पुलिस इंस्पेक्टर से सवाल किया कि क्या उन्होंने किताब पढ़ी है? क्या याचिकाकर्ता के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के बावजूद क्या कोई अपराध बनता है?


हाई कोर्ट ने कहा कि पुलिस अधिकारी अपनी शक्तियों का अतिक्रमण नहीं कर सकता। वे कॉलेज प्रिंसिपल को कार्रवाई करने के लिए नहीं कह सकते थे न ही निर्देश जारी कर सकते थे। अदालत ने राज्य को अधिकारी के खिलाफ सख्त कदम उठाने की चेतावनी दी। हालांकि अभियोजन पक्ष द्वारा अदालत को यह बताए जाने के बाद कि संचार बिना शर्त वापस ले लिया जाएगा। प्रोफेसर की याचिका का निपटारा कर दिया गया। बता दें कि 16 फरवरी, 2015 को महाराष्ट्र के कोल्हापुर में पानसरे को गोली मार दी गई थी और 20 फरवरी को उनकी मौत हो गई थी।
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