Mulayam Singh Yadav: क्या अब दिल्ली का रुख करेंगे अखिलेश, सामने हैं ये तीन सबसे बड़ी चुनौतियां!
Mulayam Singh Yadav: राजनीतिक विश्लेषक और उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार रहे जेपी शुक्ला कहते हैं कि भले ही मुलायम सिंह यादव बीते कुछ समय से अपनी बीमारी के चलते राजनीतिक रूप से सक्रिय न रहे हों, लेकिन उनका सदन में बने रहना और पार्टी के संरक्षक के तौर पर रहना ही पार्टी को ऑक्सिजन देता था...
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समाजवादी पार्टी के संरक्षक और देश के कद्दावर नेता मुलायम सिंह यादव के निधन के बाद अखिलेश यादव के सामने कई तरह की चुनौतियां भी खड़ी हो गई हैं। राजनैतिक विश्लेषकों का कहना है कि इन चुनौतियों से निपटने की रणनीति ही अखिलेश यादव को मुलायम सिंह यादव की जगह पर अब उनको पूरे देश में स्थापित करेंगी। क्योंकि मुलायम सिंह यादव का कद देश के उन चुनिंदा नेताओं में शुमार किया जाता था, जो देश की राजनीति में गिने-चुने नेताओं को मिला है। सवाल यह भी उठ रहे हैं कि क्या मुलायम सिंह यादव के न रहने के बाद अब अखिलेश यादव दिल्ली का रुख करेंगे।
परिवार को साथ लेकर चलने की चुनौती
दरअसल मुलायम सिंह यादव बीते कुछ दिनों से बहुत ज्यादा बीमार थे, लेकिन उनकी छतरी के नीचे समाजवादी पार्टी का पूरा कुनबा फलफूल रहा था। राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार जेपी शुक्ला कहते हैं कि अखिलेश यादव के सामने मुलायम सिंह यादव के न रहने के बाद निश्चित तौर पर चुनौतियां तो आएंगी हीं। इसमें पहली चुनौती तो परिवार को साथ लेकर चलने की है। दूसरी सबसे बड़ी चुनौती अखिलेश यादव के लिए खुद को राष्ट्रीय स्तर पर मुलायम सिंह यादव की तरह स्थापित करने की होगी। अखिलेश यादव के लिए तीसरी और सबसे अहम चुनौती राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर नेतृत्व के सामंजस्य को लेकर चलना होगा। विश्लेषकों का कहना है कि अखिलेश यादव इन चुनौतियों से जितना बेहतर तरीके से निपटेंगे, उससे पार्टी सिर्फ राज्य ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर एक अपने मुकाम की ओर बढ़ सकती है।
राजनीतिक विश्लेषक और उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार रहे जेपी शुक्ला कहते हैं कि भले ही मुलायम सिंह यादव बीते कुछ समय से अपनी बीमारी के चलते राजनीतिक रूप से सक्रिय न रहे हों, लेकिन उनका सदन में बने रहना और पार्टी के संरक्षक के तौर पर रहना ही पार्टी को ऑक्सीजन देता था। शुक्ला कहते हैं कि अब मुलायम सिंह यादव के न रहने से यह कमी न सिर्फ अखिलेश यादव बल्कि पार्टी को खलेगी और उनके सामने नई चुनौतियां भी पेश करेगी। सबसे बड़ी चुनौती अखिलेश यादव के सामने खुद को मुलायम सिंह यादव की तरह अब राष्ट्रीय स्तर के बड़े नेता के तौर पर पेश करने की होगी। राष्ट्रीय स्तर पर अभी भी खासतौर से सदन में मुलायम सिंह यादव जैसे अनुभवी नेता गिने-चुने ही हैं। ऐसे में अखिलेश यादव को अब राष्ट्रीय स्तर पर उनकी कमी को पूरा करने के लिए नई रणनीति तो बनानी ही पड़ेगी। अब इसके लिए वह खुद संसद में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए चुनावी मैदान में आएंगे या फिर अपने परिवार से किसी को आगे करके संसद में अपना प्रतिनिधित्व और मुलायम सिंह यादव की कमी को पूरा करने के लिए नई रणनीति अपनाएंगे। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि मुलायम सिंह यादव के चचेरे भाई और समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता प्रोफेसर रामगोपाल यादव बीते तीन दशक से सदन में समाजवादी पार्टी का प्रतिनिधित्व करते आए हैं।
सामंजस्य और एकजुटता के साथ राजनीतिक पारी आगे बढ़ा रहे हैं अखिलेश
राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तो इस बात की हो रहीं कि मुलायम सिंह यादव की बीमारी के दौरान अखिलेश यादव और शिवपाल यादव में नजदीकियां बढ़ी हैं। लेकिन सवाल यही है क्या यह नजदीकियां राजनैतिक रूप से भी एकजुटता की ओर ले कर जाएगी या नहीं। वरिष्ठ पत्रकार जेपी शुक्ला कहते हैं कि राजनीतिक गलियारे में यह चुनौतियां तो मानी जा रही हैं, लेकिन हकीकत में अखिलेश यादव ने पारिवारिक खास तौर से शिवपाल यादव को लेकर शुरुआत से ही अपनी एक लाइन पर चले हैं। मुलायम सिंह यादव के रहते हुए भी शिवपाल यादव को लेकर अखिलेश यादव का मत स्पष्ट था। ऐसे में यह कहना कि अखिलेश यादव के सामने परिवार को लेकर एक बड़ी चुनौती होगी, इसका कोई बहुत महत्त्व नजर नहीं आता है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि सिर्फ शिवपाल यादव को छोड़ दिया जाए, तो अखिलेश यादव अपने बाकी सभी पारिवारिक सदस्यों के साथ बेहतर सामंजस्य और आपसी एकजुटता के साथ राजनीतिक पारी को आगे बढ़ा रहे हैं। इस पूरी राजनीतिक पारी में उनका साथ मुलायम सिंह यादव के जीवित रहते हुए भी प्रोफेसर रामगोपाल यादव देते रहे थे। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि हालांकि बड़े राजनीतिक परिवार में यह चुनौतियां तो निश्चित तौर पर आती ही हैं।
केंद्र में स्थापित करने की चुनौती
मुलायम सिंह यादव के ना रहने के बाद तीसरी सबसे बड़ी चुनौती अखिलेश यादव के लिए केंद्र और राज्य की राजनीति में सामंजस्य स्थापित करने के साथ पार्टी को मजबूत करने की होगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मुलायम सिंह यादव की केंद्र की राजनीति में सक्रियता भले कम हो गई थी, लेकिन उनकी उपस्थिति न सिर्फ पार्टी को बल्कि अखिलेश यादव को बहुत मजबूत करती रहती थी। यही वजह है कि अखिलेश यादव लोकसभा का चुनाव जीतने के बाद भी राज्य की राजनीति में अपनी सक्रिय भूमिका अदा करते हुए नेता विपक्ष के तौर पर विधानसभा में बैठे। राजनैतिक विश्लेषक एसएन चतुर्वेदी कहते हैं कि अखिलेश यादव को अब इस दिशा में निश्चित तौर पर सोचना होगा। क्योंकि मुलायम सिंह यादव के ना रहने से अब केंद्र में भी उतनी ही मजबूती से अखिलेश यादव को अपनी उपस्थिति दर्ज करानी होगी। इसके साथ-साथ उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी समाजवादी पार्टी का रुतबा कायम करने और बनाए रखने की बड़ी चुनौती भी रहेगी। चतुर्वेदी कहते हैं कि मुलायम सिंह यादव के दिल्ली में रहने से ही अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश में बेहतर तरीके से राजनीतिक पारी को आगे बढ़ा रहे थे। अब अखिलेश यादव के लिए उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि केंद्र की राजनीति में भी उसी सक्रियता के साथ अपनी भागीदारी को बढ़ाना होगा।
मुलायम सिंह यादव के बाद सदन में उनके भाई प्रोफेसर रामगोपाल यादव वरिष्ठ और अनुभवी सांसदों में गिने जाते हैं। बीते तीन दशक से प्रोफेसर रामगोपाल यादव समाजवादी पार्टी का प्रतिनिधित्व लोकसभा और राज्यसभा में करते रहे हैं। उत्तर प्रदेश की राजनीति को करीब से समझने वाले जटाशंकर सिंह कहते हैं कि रामगोपाल यादव और मुलायम सिंह यादव के सदन में मौजूद रहने से अखिलेश यादव पूरी सक्रियता के साथ उत्तर प्रदेश पर फोकस पार्टी को मजबूत कर रहे थे। लेकिन अब उन्हें अपनी भूमिका और रणनीति में निश्चित तौर पर बदलाव भी करने होंगे। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है तो इस बात की भी शुरू हो गई है कि मुलायम सिंह यादव की रिक्त हुई लोकसभा सीट पर अखिलेश यादव के परिवार से ही कोई करीबी चुनावी मैदान में उतरेगा।