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मुख्यमंत्री बिहार के: कुर्सी के लिए पार्टी तोड़ी, साथी को तीन दिन का सीएम बनाया, पर 50 दिन भी नहीं चली सरकार
Fri, 22 Aug 2025 11:08 AM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Fri, 22 Aug 2025 11:08 AM IST
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सार
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BP Mandal, Mukhyamantri Bihar Ke
- फोटो :
Amar Ujala
विस्तार
चिराग पासवान ने हाल ही में बिहार का विधानसभा चुनाव लड़ने की इच्छा जताई है। चिराग अभी सांसद हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने 1967-68 के दौर की यादें ताजा कर दीं। तब एक सांसद ने राज्य में मंत्री बनने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा दिया। इस बाबत उस नेता को पार्टी के संस्थापक की नाराजगी भी झेलनी पड़ी। हालांकि, रार का असर यह हुआ कि सांसद ने मुख्यमंत्री बनने के लिए बगावती तेवर अपना लिया। बगावत की और मुख्यमंत्री भी बना।‘मुख्यमंत्री बिहार के’ की छठवीं कड़ी में आज बात बिहार के सातवें मुख्यमंत्री बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल की। बीपी मंडल को उनके मुख्यमंत्री कार्यकाल से ज्यादा उनके नेतृत्व में बनाए गए मंडल आयोग के लिए याद किया जाता है। इस आयोग की सिफारिश पर ही पिछड़ा वर्ग को आरक्षण मिला। आइये जानते हैं बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल की पूरी कहानी।
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कौन थे बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल और क्या है उनकी कहानी?
1. विधायक से सांसद बनने तक की कहानीबिहार के मधेपुरा के करीब मुरहो गांव है। बीपी मंडल मूलतः इसी गांव से हैं। हालांकि, 1918 में उनका जन्म उत्तर प्रदेश के वाराणसी में हुआ था। वे यादव समाज से आते हैं। उनके पिता रासबिहारी लाल मंडल उस समय के एक बड़े जमींदार थे और कांग्रेस के संस्थापक सदस्यों में से एक रहे। बीपी मंडल शुरुआती पढ़ाई के बाद दरभंगा में हाईस्कूल करने आ गए। कहते हैं कि जमींदार परिवार से आने के बावजूद बिंदेश्वरी प्रसाद को पहली बार जातिवाद का अंदाजा यहीं हुआ। यहां के राज हाई स्कूल में जब वह और उनके कुछ साथी खाना खाने गए तो उन्होंने देखा कि यहां खाना उच्च जाति के छात्रों को दिया जाता है। जब वे खाना खा लेते हैं, इसके बाद ही पिछड़ी जाति के छात्र खाना खाते हैं।
बीपी मंडल को यह तरीका ठीक नहीं लगा और अपने साथ वाले कुछ लड़कों को जुटाकर उन्होंने स्कूल और हॉस्टल प्रशासन के खिलाफ प्रदर्शन शुरू कर दिए। देखते ही देखते उनकी बात कानों में गूंजने लगी और भेदभाव से जुड़ी व्यवस्था का अंत कर दिया गया। स्कूली पढ़ाई पूरी करके मंडल ने पटना कॉलेज में दाखिला लिया। यहां से वे पढ़ाई पूरी करने के बाद 1941 के करीब भागलपुर जिला परिषद में निर्विरोध निर्वाचित हो गए। यानी 23 साल की उम्र में उनका राजनीतिक सफर शुरू हुआ।
चुनावी सियासत की कहानी
खैर कहानी आगे बढ़ती है और आता है साल 1952, जब स्वतंत्र भारत में पहली बार चुनाव हुए। इस चुनाव में तब मधेपुरा विधानसभा सीट से लड़ रहे थे समाजवादी नेता भूपेंद्र नारायण मंडल, जो कि कांग्रेस की नीतियों के खिलाफ रहे थे। बिहार के पहले मुख्यमंत्री रहे श्रीकृष्ण सिन्हा ने उनके खिलाफ ऐसे नेता को उतारने की जुगत भिड़ाई, जो खुद मंडल समाज का प्रतिनिधित्व करता हो और कांग्रेस का उम्मीदवार बन सके। यहीं से उठा बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल का नाम। कांग्रेस ने उन्हें टिकट दिया और बीपी मंडल ने जीत भी हासिल की। हालांकि, वे खुद भूपेंद्र नारायण की समाजवादी नीतियों के प्रशंसक बन चुके थे।
1957 में बीपी मंडल को चुनाव में हार मिली। यह हार उन्हें भूपेंद्र नारायण से ही मिली, जो 1952 में चुनाव हारे थे। 1962 में बीपी मंडल एक बार फिर विधायक बने।
खैर कहानी आगे बढ़ती है और आता है साल 1952, जब स्वतंत्र भारत में पहली बार चुनाव हुए। इस चुनाव में तब मधेपुरा विधानसभा सीट से लड़ रहे थे समाजवादी नेता भूपेंद्र नारायण मंडल, जो कि कांग्रेस की नीतियों के खिलाफ रहे थे। बिहार के पहले मुख्यमंत्री रहे श्रीकृष्ण सिन्हा ने उनके खिलाफ ऐसे नेता को उतारने की जुगत भिड़ाई, जो खुद मंडल समाज का प्रतिनिधित्व करता हो और कांग्रेस का उम्मीदवार बन सके। यहीं से उठा बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल का नाम। कांग्रेस ने उन्हें टिकट दिया और बीपी मंडल ने जीत भी हासिल की। हालांकि, वे खुद भूपेंद्र नारायण की समाजवादी नीतियों के प्रशंसक बन चुके थे।
1957 में बीपी मंडल को चुनाव में हार मिली। यह हार उन्हें भूपेंद्र नारायण से ही मिली, जो 1952 में चुनाव हारे थे। 1962 में बीपी मंडल एक बार फिर विधायक बने।
विधायक रहते हुए बीपी मंडल काफी सक्रिय रहे। एक मौके पर उनका अपनी ही पार्टी के खिलाफ उठाया गया एक कदम पूरे देश के अखबारों की सुर्खियों में दर्ज हो गया। दरअसल, हुआ कुछ यूं था कि बिहार के पामा गांव में कुछ स्थानीय जमींदारों ने पिछड़ी कुर्मी जाति के गांव पर हमला कर दिया था। इस घटना के बाद क्षेत्र में पुलिस की तरफ से बर्बरता की बातें सामने आने लगीं। मंडल ने इसके खिलाफ आवाज उठाई और अपनी सरकार से दोषियों पर कार्रवाई के साथ पीड़ितों को मुआवजा देने की मांग की। लेकिन पार्टी के कुछ नेताओं ने उनका विरोध कर दिया। नाराज मंडल ने विधानसभा में ही ट्रेजरी बेंच को छोड़कर विपक्ष के साथ अपनी ही सरकार के खिलाफ प्रदर्शन में जुट गए। इसका असर यह हुआ कि अगले दिन सभी अखबारों में बीपी मंडल फ्रंट पेज पर थे। सत्तासीन सरकार को अपने ही विधायक की एक हरकत की वजह से काफी फजीहत झेलनी पड़ी।
इस पूरे दौर तक मंडल की डॉ. राममनोहर लोहिया के करीबी बन चुकी थी। लोहिया ने विधानसभा में अपनी ही सरकार का विरोध करने वाले बीपी मंडल की क्षमताओं के पहचान लिया था। साथ ही भूपेंद्र नारायण के समाजवाद से बीपी मंडल की करीबी को भी लोहिया ने भांप लिया। इसके चलते 1967 में लोकसभा चुनाव से ठीक पहले बीपी मंडल ने कांग्रेस छोड़ दी और लोहिया के नेतृत्व वाली संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (संसोपा) का दामन थाम लिया। मंडल चुनाव जीते और इस बार मधेपुरा सीट से सांसद बने।
2. मुख्यमंत्री बनने की दास्तां
लोकसभा चुनाव के बाद जब बिहार में विधानसभा चुनाव हुए और इसमें पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनी तो बीपी मंडल की दिलचस्पी राज्य में बढ़ गई। दरअसल, विधानसभा में कांग्रेस की हार की बड़ी वजह संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी रही, जो कि उस वक्त संयुक्त विधायक दल (संविद) गठबंधन की सबसे ज्यादा सीटें पानी वाली पार्टी थी।
जब बिहार की पहली गैर-कांग्रेसी सरकार में मंत्रिमंडल का बंटवारा चल रहा था, तब बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल को मंत्रियों के नाम पर फैसला करने के लिए पटना बुलाया गया। सांसद होने के बावजूद उन्होंने खुद अपना नाम मंत्री पद के लिए बढ़ा दिया। उस वक्त राम मनोहर लोहिया केरल के दौरे पर थे और फोन या अन्य संपर्क की व्यवस्थाएं मौजूद नहीं थीं, इसलिए मंडल का नाम मंत्रिमंडल में शामिल हो गया।
लोकसभा चुनाव के बाद जब बिहार में विधानसभा चुनाव हुए और इसमें पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनी तो बीपी मंडल की दिलचस्पी राज्य में बढ़ गई। दरअसल, विधानसभा में कांग्रेस की हार की बड़ी वजह संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी रही, जो कि उस वक्त संयुक्त विधायक दल (संविद) गठबंधन की सबसे ज्यादा सीटें पानी वाली पार्टी थी।
जब बिहार की पहली गैर-कांग्रेसी सरकार में मंत्रिमंडल का बंटवारा चल रहा था, तब बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल को मंत्रियों के नाम पर फैसला करने के लिए पटना बुलाया गया। सांसद होने के बावजूद उन्होंने खुद अपना नाम मंत्री पद के लिए बढ़ा दिया। उस वक्त राम मनोहर लोहिया केरल के दौरे पर थे और फोन या अन्य संपर्क की व्यवस्थाएं मौजूद नहीं थीं, इसलिए मंडल का नाम मंत्रिमंडल में शामिल हो गया।
मंडल का नाम बिहार के नए मंत्रिमंडल में शामिल तो हो गया, लेकिन संसोपा के संविधान के मुताबिक, कोई भी सांसद, प्रदेशाध्यक्ष या पार्टी का पदाधिकारी सरकार में पद नहीं ले सकता था। लोहिया का मानना था कि सांसद के किसी राज्य की राजनीति में दखल से संवैधानिक संकट पैदा हो सकता है। एक नेता की पद पाने की इच्छा के कारण उपचुनाव कराना पड़ सकता है। ऐसे में जब लोहिया बिहार लौटे और उन्हें बीपी मंडल के मंत्री बनने की जानकारी मिली तो उन्होंने इस पर सख्त आपत्ति जताई। लोहिया का यह विरोध मंडल को चुभ गया और उन्होंने कुछ ही समय बाद अपनी अलग पार्टी- शोषित दल बनाने का एलान कर दिया।
इसके आगे की कहानी को मुख्यमंत्री बिहार के सीरीज की पांचवीं कड़ी में बताया गया है (यहां क्लिक कर पढ़ सकते हैं) कि कैसे कांग्रेस के नेता कृष्ण बल्लभ सहाय ने बीपी मंडल को संसोपा से विधायक तोड़ने का लालच दिया। संसोपा के एक नेता सतीश प्रसाद सिंह की मुख्यमंत्री महामाया प्रसाद सिन्हा से बगावत किस तरह बीपी मंडल को उनके करीब ले आई। इसके बाद संविद सरकार के विधायकों की टूट और सतीश प्रसाद सिंह का चार दिन का मेकशिफ्ट मुख्यमंत्री बनना किस तरह बिहार की राजनीति में बदलाव लाया। अब कहानी उससे आगे की...
महामाया सरकार गिरने के बाद बीपी मंडल सांसद थे, इसलिए उन्होंने विधायक बनने के लिए सतीश प्रसाद सिंह को चार दिन का सीएम बनने को कहा। सतीश प्रसाद कैबिनेट ने मंडल को विधान परिषद के लिए नामित कर उनका सीएम बनने का रास्ता भी साफ कर दिया। आखिरकार सतीश प्रसाद सिंह के इस्तीफा देने के बाद 1 फरवरी 1968 को बीपी मंडल कांग्रेस और बागियों के समर्थन के साथ बिहार के मुख्यमंत्री बन गए।
हालांकि, इससे पहले कि बीपी मंडल मुख्यमंत्री के तौर पर बड़े फैसले कर पाते, उन्हें समर्थन देने वाली कांग्रेस में ही फूट पड़ने लगी। दरअसल, कांग्रेस में ही शोषित दल को समर्थन देने की वजह से विवाद की स्थिति पैदा हो गई थी। पूर्व मुख्यमंत्री बिनोदानंद झा के धड़े ने केबी सहाय के गुट का विरोध शुरू कर दिया था। बीएन झा के अलावा कांग्रेस के ही एक और प्रभावशाली नेता पंडित हरिनाथ मिश्र ने भी शोषित दल के साथ गठबंधन बनाने का विरोध कर दिया था। उन्होंने केबी सहाय के नेतृत्व वाले गुट को बगावत की धमकी तक दे दी।
हालांकि, इससे पहले कि बीपी मंडल मुख्यमंत्री के तौर पर बड़े फैसले कर पाते, उन्हें समर्थन देने वाली कांग्रेस में ही फूट पड़ने लगी। दरअसल, कांग्रेस में ही शोषित दल को समर्थन देने की वजह से विवाद की स्थिति पैदा हो गई थी। पूर्व मुख्यमंत्री बिनोदानंद झा के धड़े ने केबी सहाय के गुट का विरोध शुरू कर दिया था। बीएन झा के अलावा कांग्रेस के ही एक और प्रभावशाली नेता पंडित हरिनाथ मिश्र ने भी शोषित दल के साथ गठबंधन बनाने का विरोध कर दिया था। उन्होंने केबी सहाय के नेतृत्व वाले गुट को बगावत की धमकी तक दे दी।
दूसरी ओर कांग्रेस में जारी इस अंतर्कलह की भनक संयुक्त विधायक दल के बचे-खुचे सदस्यों को लग गई। ऐसे में विपक्ष की तरफ से 18 मार्च को विधानसभा में अविश्वास प्रस्ताव लाने का फैसला हुआ। कांग्रेस के बागी नेताओं, जिनमें तब हरिनाथ मिश्र, एलएन सुधांशु, दीप नारायण सिंह, कृष्ण कांत सिंह और भोला पासवान शास्त्री शामिल थे, ने अविश्वास प्रस्ताव पेश होने से एक दिन पहले 17 मार्च 1968 को ही एलान कर दिया था कि वे सदन में अपनी पार्टी के व्हिप के खिलाफ जाकर वोट करेंगे। कांग्रेस नेताओं ने यह किया भी और महज 47 दिन पुरानी बीपी मंडल सरकार औंधे मुंह गिर गई।
उस वक्त की मीडिया रिपोर्ट्स को देखा जाए तो स्टेट्समैन, न्यू एज जैसे अखबारों में छपा था कि शोषित दल खुद भी अपने शासन के हाथ से जाने का जिम्मेदार था। इस पार्टी के पास तब जनता के लिए कोई लक्ष्य, कोई योजना और कार्यक्रम न होने का आरोप लगा था। कई राजनीतिक जानकारों ने इस दल को स्वार्थी नेताओं का साथ करार दिया था।
उस वक्त की मीडिया रिपोर्ट्स को देखा जाए तो स्टेट्समैन, न्यू एज जैसे अखबारों में छपा था कि शोषित दल खुद भी अपने शासन के हाथ से जाने का जिम्मेदार था। इस पार्टी के पास तब जनता के लिए कोई लक्ष्य, कोई योजना और कार्यक्रम न होने का आरोप लगा था। कई राजनीतिक जानकारों ने इस दल को स्वार्थी नेताओं का साथ करार दिया था।
कुछ इस तरह बीपी मंडल का मुख्यमंत्री के तौर पर कार्यकाल खत्म हो गया। मंडल सीएम पद से भले ही हट गए, लेकिन उन्होंने अपनी ही छोड़ी हुई लोकसभा सीट पर एक बार फिर चुनाव की तैयारियां शुरू कर दीं। इस बार मंडल निर्दलीय ही चुनाव में उतरे और जीत भी दर्ज की। हालांकि, 1971 के लोकसभा चुनाव में वे अपनी सीट नहीं बचा पाए। इंदिरा गांधी की लहर में कांग्रेस को जबरदस्त बहुमत मिला और मधेपुरा सीट से भी इंदिरा गांधी की कांग्रेस के राजेंद्र प्रसाद यादव विजयी रहे।
3. वह जिम्मेदारी, जिसने बना दिया अमर शख्सियत
1977 में इमरजेंसी के बाद जब भारत में फिर चुनाव हुए तो जनता पार्टी के साथ बीपी मंडल संसद पहुंच गए। अपनी इस सांसदी के दौरान उन्हें सबसे अहम जिम्मेदारी मिली। यह जिम्मेदारी थी पिछड़ा वर्ग आयोग के नेतृत्व की। 1978 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया और सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े नागरिकों पर रिपोर्ट तैयार करने का जिम्मा मंडल को सौंपा।
1979 में मंडल आयोग ने अपना काम शुरू किया और दिसंबर 1980 को तत्कालीन गृह मंत्री ज्ञानी जैल सिंह को अपनी रिपोर्ट सौंप दी। इस रिपोर्ट में पिछड़ा वर्ग को सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में 27 फीसदी आरक्षण देने की मांग की गई थी। कांग्रेस के शासन में यह रिपोर्ट पूरी तरह से गायब रही। हालांकि, 1990 में जब वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने इस रिपोर्ट को लागू कर दिया। बाद में मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने के फैसले को वकील इंद्रा साहनी ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। देशभर में इसके खिलाफ बवाल हुआ। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने आरक्षण को सही माना।
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1977 में इमरजेंसी के बाद जब भारत में फिर चुनाव हुए तो जनता पार्टी के साथ बीपी मंडल संसद पहुंच गए। अपनी इस सांसदी के दौरान उन्हें सबसे अहम जिम्मेदारी मिली। यह जिम्मेदारी थी पिछड़ा वर्ग आयोग के नेतृत्व की। 1978 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया और सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े नागरिकों पर रिपोर्ट तैयार करने का जिम्मा मंडल को सौंपा।
1979 में मंडल आयोग ने अपना काम शुरू किया और दिसंबर 1980 को तत्कालीन गृह मंत्री ज्ञानी जैल सिंह को अपनी रिपोर्ट सौंप दी। इस रिपोर्ट में पिछड़ा वर्ग को सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में 27 फीसदी आरक्षण देने की मांग की गई थी। कांग्रेस के शासन में यह रिपोर्ट पूरी तरह से गायब रही। हालांकि, 1990 में जब वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने इस रिपोर्ट को लागू कर दिया। बाद में मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने के फैसले को वकील इंद्रा साहनी ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। देशभर में इसके खिलाफ बवाल हुआ। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने आरक्षण को सही माना।
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