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मुख्यमंत्री बिहार के: बिहार के पहले गैर-कांग्रेसी CM की कहानी, अपनी सरकार के खिलाफ आंदोलन कर बने ‘जायंट किलर’

Wed, 23 Jul 2025 12:39 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Wed, 23 Jul 2025 12:39 PM IST
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सार
बिहार के पांचवें मुख्यमंत्री महामाया प्रसाद सिन्हा को छात्रों के सबसे बड़े हिमायती नेता के तौर पर पहचाना जाता है। वे जब मुख्यमंत्री नहीं थे, तब उन्होंने अलग-अलग मौकों पर छात्र हितों के लिए अपनी ही सरकार के खिलाफ आंदोलन में हिस्सा लिया। इससे कांग्रेस के उस वक्त के सीएम उनसे काफी नाराज भी रहे थे।
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Mukhyamantri Bihar Ke Series Bihar Chief Minister Mahamaya Prasad Sinha first non congress CM in state Know
बिहार के मुख्यमंत्री रहे महामाया प्रसाद सिन्हा। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

बिहार में गठबंधन सरकारों का लंबा इतिहास रहा है। राज्य में पहली बार गठबंधन की सरकार 1967 में अस्तित्व में आई थी। महामाया प्रसाद इसके मुखिया थे। मुख्यमंत्री बनने के चंद महीने पहले तक कांग्रेस में रहे महामाया प्रसाद अपनी ही सरकार के खिलाफ छात्र आंदोलन में उतर गए थे। बाद में कांग्रेस के तत्कालीन मुख्यमंत्री के खिलाफ चुनाव लड़े। उन्हें हराकर ‘जायंट किलर’ का तमगा पाया। ‘मुख्यमंत्री बिहार के’ सीरीज में आज बात बिहार के पांचवें मुख्यमंत्री- महामाया प्रसाद सिन्हा की।  


यहां पढ़ें 'मुख्यमंत्री बिहार के' सीरीज की पिछली कड़ियां
1. मुख्यमंत्री बिहार के: बेटे को लड़ाने की मांग पर चुनाव में न उतरने की धमकी दी, तिजोरी में मिली इतनी 'संपत्ति'

2. मुख्यमंत्री बिहार के: जिस सीएम जिसने कहा- जहरीली मछली से जा सकती है मेरी जान; कामराज प्लान ने ले ली थी कुर्सी
3. मुख्यमंत्री बिहार के: इस सीएम को कभी कहा गया जमींदारों का दुश्मन, छात्र आंदोलन में चली गोली ने छीन ली कुर्सी

पहले जानें- बिहार में पहली गठबंधन सरकार की नींव कैसे पड़ी?
'मुख्यमंत्री बिहार के' की पिछली कड़ी में हमने कृष्ण बल्लभ सहाय के कार्यकाल की बात की थी। उनके कार्यकाल के दौरान कांग्रेस में अंतर्कलह चरम पर था। मसलन- लोकसभा चुनाव से लेकर विधानसभा चुनाव तक में केबी सहाय पर टिकट बंटवारे में भेदभाव के आरोप लगे। इससे नाराज होकर कांग्रेस के कई नेता पार्टी छोड़कर चले गए। दूसरी तरफ बिहार में 1965 और 1966 में मानसून में कमी भी देखी गई और इस दौरान केंद्र की कांग्रेस की सरकार की तरफ से मदद भी उचित मात्रा में नहीं पहुंची। इससे जनता में जबरदस्त रोष उभरा। 

हालांकि, बिहार से कांग्रेस के जाने की सबसे बड़ी वजह बना एक छात्र आंदोलन, इस दौरान गोली चलने की घटना की वजह से कृष्ण बल्लभ सहाय के खिलाफ आक्रोश चरम पर था। इस घटना को लेकर विपक्षी दल भी पहली बार लामबंद दिखे और छात्रों की आवाज बुलंद करते हुए कांग्रेस को खरी-खरी सुनाते रहे। नतीजतन राज्य में एक ऐसा गठबंधन अस्तित्व में आया, जो कि सत्ता पाने के लिए एकजुट हो गया और कांग्रेस की बिहार से पहली बार विदाई का कारण बना।

महामाया प्रसाद कैसे बने मुख्यमंत्री?
बिहार में फरवरी 1967 में विधानसभा चुनाव हुए। 318 सीटों में कांग्रेस को महज 128 सीटें मिलीं। राम मनोहर लोहिया के नेतृत्व वाली संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (एसएसपी) को 68 सीट पर जीत मिली। इसके अलावा जनसंघ को 26, भाकपा को 24 और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (पीएसपी) को 18 सीटें मिली। कांग्रेस में केबी सहाय से नाराज होकर अलग दल बनाने वाले महामाया प्रसाद सिन्हा भी चुनाव में सफल हुए और उनके जन क्रांति दल ने इस चुनाव में 13 सीटें जीतीं। इसके साथ ही बिहार में कांग्रेस को सत्ता से हटाने के लिए साथ आया संयुक्त विधायक दल, जिसमें नौ दल शामिल थे। इसमें दक्षिणपंथी पार्टी- जनसंघ और वामपंथी दल- भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) भी शामिल थी। 

चुनाव में जीत के बाद से ही इस गठबंधन में मुख्यमंत्री के चेहरे पर सहमति नहीं बन पा रही थी। बताया जाता है कि संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (एसएसपी) के सबसे बड़ी पार्टी होने की वजह से इसके नेता कर्पूरी ठाकुर के मुख्यमंत्री बनने की सबसे ज्यादा चर्चा थी, लेकिन गठबंधन के साथी दलों को उनका नाम स्वीकार नहीं था। खासकर रामगढ़ के राजा इस मामले में कर्पूरी ठाकुर के समर्थन में नहीं थे। 

इसी गठबंधन में अचानक जन क्रांति दल (जेकेडी) के महामाया प्रसाद सिन्हा का नाम तेजी से सीएम पद के लिए उभरने लगा। वजह यह थी कि महामाया प्रसाद सिन्हा तब छात्रों के बीच जाकर उनके आंदोलनों का नेतृत्व करने के लिए चर्चित थे। इससे जुड़े कुछ किस्से भी महामाया के पक्ष में हवा बनाने में अहम साबित हुए। ऐसे ही दो किस्से आपको बताते हैं…

पहला किस्सा
साल था 1956 जब महामाया प्रसाद सिन्हा तत्कालीन मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिन्हा से नाराज होकर कांग्रेस छोड़ चुके थे। वजह थी बस के किराए को लेकर शुरू हुआ छात्रों का उग्र प्रदर्शन, जिसे तितर-बितर करने के लिए पुलिस को गोलियां चलानी पड़ीं और इसमें एक छात्र की मौत हो गई। इसके बाद महमाया प्रसाद ने श्रीकृष्ण सिन्हा की सरकार के खिलाफ छात्रों के एक आंदोलन का नेतृत्व किया। बताया जाता है कि छात्रों के ऐसे ही कुछ प्रदर्शनों में महामाया प्रसाद इस कदर जुड़े थे कि कई बार वे भाषण देते-देते अपनी छाती पीटकर रोने लगते, जिससे उनका कुर्ता तक फट जाता। महामाया प्रसाद कई मौकों पर छात्रों को जिगर के टुकड़े बुलाते दिख जाते थे। आखिरकार छात्रों को मनाने के लिए तब खुद प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु दिल्ली से पटना पहुंचे थे और गांधी मैदान में उन्होंने छात्रों को संबोधित करते हुए पूरे मामले को ही शांत कर दिया था। बताया जाता है कि इस प्रदर्शन के बाद छात्रों के बीच उनकी लोकप्रियता इस कदर बढ़ी थी कि 1957 में उन्होंने मुजफ्फरपुर सीट से सरकार के ताकतवर मंत्री और श्रीकृष्ण सिन्हा के करीबियों में आने वाले भूमिहार नेता महेश प्रसाद सिन्हा को हरा दिया था।  

दूसरा किस्सा
1967 में केबी सहाय सरकार के खिलाफ छात्रों का गुस्सा भड़का तो महामाया प्रसाद सिन्हा ने एक बार फिर छात्रों के साथ आंदोलन में जुट गए। कुछ साल पहले ही वे कांग्रेस से वापस जुड़े थे। हालांकि, अब छात्र आंदोलन के शुरू होने के साथ ही उन्होंने फिर से कांग्रेस से राहें अलग कर लीं और राजा कामाख्या नारायण सिंह के साथ जन क्रांति दल की स्थापना की। इतना ही नहीं छात्र आंदोलन के बाद इस बार उन्होंने सीधा तत्कालीन मुख्यमंत्री केबी सहाय के खिलाफ पटना पश्चिम सीट से चुनाव लड़ने का फैसला किया। इस चुनाव में उन्हें अपनी लोकप्रियता का फायदा मिला और उन्होंने सीएम सहाय को 20 हजार वोटों के अंतर से पटखनी दी। इस तरह उन्होंने कांग्रेस से दूर होकर मुख्यमंत्री को हराने का जो कारनामा किया, उसने उन्हें न सिर्फ बड़े नेताओं के शिकारी का तमगा दिलाया, बल्कि मुख्यमंत्री पद के लिए उनकी दावेदारी का रास्ता भी साफ किया। गठबंधन में कर्पूरी ठाकुर को उपमुख्यमंत्री पद सौंपा गया। 

जिगर के टुकड़ों के लिए दिया अहम आदेश
5 मार्च 1967 को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद महामाया प्रसाद सिन्हा ने छात्रों से जुड़े कई अहम फैसले लिए। इनमें एक आदेश अपने जिगर के टुकड़ों- 'छात्रों के आंदोलनों पर गोली न चलाने देने से जुड़ा था। हालांकि, इससे पहले कि मुख्यमंत्री महामाया प्रसाद कुछ और बड़े फैसले ले पाते, उनके गठबंधन में रार दिखने लगी। कभी यह रार मंत्रिमंडल में पदों को लेकर दिखी तो कभी संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (संसोपा) के ज्यादा विधायक होने के बावजूद उसके नेताओं को प्राथमिकता न मिलने से जुड़े मसलों पर थी। इस तरह 1967 में बना यह गठबंधन महज एक साल से कुछ ज्यादा ही चल पाया। दरअसल, जनसंघ और भाकपा की विचारधारा में टकराव लगातार जारी रहा। दूसरी तरफ महामाया प्रसाद सिन्हा के कैबिनेट में सभी जातियों को बराबर प्रतिनिधित्व न देने का मुद्दा भी लगातार उठता रहा। इसके चलते पहले 10 महीने में बिहार में मंत्रिमंडल का पांच बार विस्तार हुआ। हालांकि, जनवरी 1968 में यह सरकार भी गिर गई। 

'मंडल कमीशन' वाले बीपी मंडल की बगावत की रही अहम भूमिका
महामाया प्रसाद के मुख्यमंत्री पद से हटने की एक बड़ी वजह थे बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल, जो कि सीएम की तरह ही महत्वाकांक्षी नेता थे। कभी कांग्रेस में रहे बीपी मंडल अपने राजनीतिक करियर के खातिर बाद में राम मनोहर लोहिया के साथ जुड़े थे। जिन लोहिया ने अपनी पार्टी संसोपा के सबसे ज्यादा विधायक होने के बावजूद मुख्यमंत्री पद 13 विधायकों वाले जन क्रांति दल को सौंपने का फैसला किया, उन्हीं के पार्टी से तब सांसद रहे मंडल ने अपने लिए बिहार सरकार में मंत्री पद की मांग कर दी। खुद लोहिया बीपी मंडल की इस मांग से सहमत नहीं थे। ऐसे में मंडल ने संसोपा का साथ छोड़ दिया और अपना अलग शोषित दल बनाया। 

कांग्रेस के नेता और बिहार के पूर्व सीएम केबी सहाय संयुक्त विधायक दल में फूट के इसी मौके के इंतजार में थे। इसी बीच जब परबत्ता से पहली बार चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे सतीश प्रसाद सिंह की सरकारी पदों पर कुछ नियुक्तियों को लेकर सीएम महामाया प्रसाद से कहासुनी हुई तो इसकी खबर पाते ही केबी सहाय ने सतीश प्रसाद से संपर्क किया। आगे का घटनाक्रम कुछ ऐसा हुआ कि सतीश प्रसाद सिंह को यादव समाज के प्रमुख नेता बीपी मंडल ने भी समर्थन दे दिया और कांग्रेस की मदद से लोहिया की कोशिशों से बने गठबंधन को गिराने का बीड़ा उठाया।

बताया जाता है कि इन नेताओं ने कांग्रेस विरोधी गठबंधन के 20-30 नेताओं को तोड़ लिया था। इसके बाद कांग्रेस ने उनकी मदद करते हुए विधानसभा में अविश्वास प्रस्ताव पेश किया। इसमें महामाया प्रसाद सिन्हा गठबंधन को साथ नहीं रख पाए और सरकार भी नहीं बचा पाए। इस तरह महामाया प्रसाद सिन्हा की सरकार पूरे एक साल भी नहीं चल पाई। जनवरी 1968 में उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। 

जमींदार परिवार से आते थे महामाया प्रसाद सिन्हा
1909 में जन्मे महामाया प्रसाद सिन्हा एक जमींदार परिवार से आते थे। पढ़ाई में भी वे काफी तेज थे। कहा जाता है कि महामाया प्रसाद अपनी युवावस्था में इतने ताकतवर थे कि वे अपनी कद काठी की वजह से भी छात्रों में पहचाने जाते थे। प्रदर्शनों के दौरान वे न सिर्फ सरकारी वाहन रोक देते थे, बल्कि लोहे की रॉड तक हाथों से मोड़ दिया करते थे। 
1929 में महज 20 साल की उम्र में महामाया प्रसाद भारतीय सिविल सेवा में जाने वाले थे, हालांकि इसी दौरान उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ असहयोग आंदोलन में हिस्सा लेने की ठानी। अंग्रेजों ने उन्हें अपने खिलाफ प्रदर्शन भड़काने के मामले में एक साल के लिए जेल में डाल दिया। बाद में उन्हें फिर गिरफ्तार किया गया और सात महीनों के लिए जेल में डाल दिया गया। बताया जाता है कि जेल में ही उन्हें लू लग गई थी और उनकी आवाज कुछ समय के लिए चली गई थी। 

जेल से बाहर आने के बाद महामाया प्रसाद 1931 में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति (एआईसीसी) का हिस्सा बन गए। वे जिला कांग्रेस समिति के अध्यक्ष भी रहे। भारत के पहले राष्ट्रपति रहे डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने एक मौके पर महामाया प्रसाद को कांग्रेस का बेहतरीन कार्यकर्ता और अपने बेटे की तरह बताया था।

जब आईएएस यशवंत सिन्हा से ही भिड़ गए थे मुख्यमंत्री महामाया प्रसाद
1967 में महामाया प्रसाद सिन्हा मुख्यमंत्री के तौर पर संथाल परगना (अब झारखंड में) में हुए कामों का जायजा ले रहे थे। सर्किट हाउस में बैठक के दौरान उन्हें प्रशासन के कामों को लेकर कई शिकायतें मिली थीं। इस दौरान महामाया प्रसाद सिन्हा के साथ मौजूद मंत्री भी प्रशासन से नाराजगी जाहिर कर रहे थे। यह वह समय था, जब संथाल परगना में जिला कलेक्टर थे आईएएस अफसर यशवंत सिन्हा। वही यशवंत सिन्हा जो कि बाद में देश के वित्त मंत्री और विदेश मंत्री रहे। 

यशवंत सिन्हा को मुख्यमंत्री और उनके साथी मंत्री की डांट बर्दाश्त नहीं हुई। सिन्हा ने कहा कि इस तरह का बर्ताव उन्हें पसंद नहीं है। इस पर जब महामाया प्रसाद सिन्हा ने आईएएस यशवंत सिन्हा को चेतावनी देते हुए कहा कि उन्हें अपने लिए नई नौकरी ढूंढना शुरू कर देना चाहिए तो यशवंत ने जवाब में कहा था कि मैं किसी दिन मुख्यमंत्री बन सकता हूं, लेकिन आप कभी आईएएस अफसर नहीं बन सकते। 

यशवंत सिन्हा ने बाद में सिविल सेवा से इस्तीफा दे दिया था और राजनीति से जुड़ गए। 1995 में वे बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तक बने। केंद्र सरकार में उन्हें कई अहम जिम्मेदारियां मिलीं, लेकिन वे कभी भी मुख्यमंत्री नहीं बन पाए। दूसरी तरफ जिन महामाया प्रसाद सिन्हा को यशवंत सिन्हा ने तब यह बात कही थी, वह कभी खुद ही भारतीय सिविल सेवा में चयन होने के बावजूद भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होने की वजह से इससे नहीं जुड़े थे।

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