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CAPF:सीएपीएफ बिल के खिलाफ मिल रहा सांसदों का साथ; 23 मार्च को जंतर-मंतर पर धरना, सरकार को नोटिस
सार
सीएपीएफ के पूर्व कैडर अफसरों ने बिल के खिलाफ राजनेताओं और राजनीतिक पार्टियों का समर्थन जुटाना शुरू कर दिया है। 'एलायंस ऑफ ऑल एक्स पैरामिलिट्री फोर्सेस वेलफेयर एसोसिएशन' इस मामले में जंतर-मंतर पर धरना देगा।
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सीएपीएफ बिल
- फोटो : एएनआई
विस्तार
कैबिनेट द्वारा केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सामान्य प्रशासन) विधेयक, 2026 को मंजूरी देने के बाद अब इसे संसद में पेश करने की तैयारी हो रही है। वहीं दूसरी तरफ, सीएपीएफ के पूर्व कैडर अफसरों ने इस विधेयक के खिलाफ लोकसभा और राज्यसभा सांसदों का समर्थन जुटाना शुरू कर दिया है। सांसदों को ज्ञापन दिया जा रहा है। फिलहाल नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, राष्ट्रीय जनता दल के राज्यसभा सांसद मनोज कुमार झा, तेजस्वी यादव, आप के राज्यसभा सांसद संजय सिंह और टीएमसी सहित कई दूसरे दलों के नेताओं से संपर्क किया जा रहा है। 'एलायंस ऑफ ऑल एक्स पैरामिलिट्री फोर्सेस वेलफेयर एसोसिएशन' ने इस मामले में 23 मार्च को जंतर मंतर पर धरना देने की घोषणा की है। इस बाबत एसोसिएशन ने प्रधानमंत्री कार्यालय को नोटिस दे दिया है।
सर्वोच्च अदालत का फैसला पलटने की कोशिश
बता दें कि अधिकांश नेताओं को सीएपीएफ की सुरक्षा मिली हुई है। यहां तक एसपीजी में भी ज्यादातर सुरक्षा कर्मी, सीएपीएफ से ही आते हैं। ऐसे में सुरक्षा कर्मियों से भी यह अपील की जा रही है कि वे अपने-अपने स्तर पर उक्त बिल को लेकर संबंधित नेता या नौकरशाह से बात करें। पूर्व एडीजी बीएसएफ एसके सूद बताते हैं कि केंद्र सरकार, केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सामान्य प्रशासन) विधेयक, 2026 के जरिए कैडर अफसरों के हितों पर कुठाराघात करना चाहती है। इनके पदोन्नति के अवसरों को खत्म करने की साजिश रची जा रही है। सरकार की जब सुप्रीम कोर्ट में नहीं चली तो अब वैधानिक हस्तक्षेप के जरिए सर्वोच्च अदालत का फैसला पलटने की कोशिश की जा रही है।
23 मार्च को जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण धरना
एसोसिएशन के महासचिव रणबीर सिंह का कहना है कि केंद्र सरकार द्वारा कैडर अफसरों के साथ लगातार किए जा रहे सौतेले व्यवहार को लेकर 23 मार्च को जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण तरीके से धरना दिया जाएगा। इस बाबत पीएमओ को नोटिस दे दिया गया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय को भी उक्त सूचना से अवगत कराया गया है। पूर्व एडीजी सीआरपीएफ एचआर सिंह ने सवाल करते हुए कहा, अब कैडर अफसरों के पास क्या विकल्प बचा है। ग्राउंड कमांडरों को पहली पदोन्नति मिलने में ही 15 साल लग रहे हैं। सिपाही से लेकर इंस्पेक्टर तक के रैंकों में भी यही स्थिति देखने को मिल रही है।
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ज्ञापन में कही गई ये बात
सत्ता पक्ष और विपक्ष के सांसदों को जो ज्ञापन दिया जा रहा है, उसमें कहा गया है कि केंद्रीय अर्धसैनिक बल, देश की आंतरिक सुरक्षा एवं सीमाओं की रक्षा की आधारशिला हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने 23 मई 2025 के अपने ऐतिहासिक निर्णय में यह घोषित किया कि सीएपीएफ के ग्रुप 'ए' कार्यकारी कैडर अधिकारी, वर्ष 1986 से संगठित ग्रुप 'ए' सेवा (ओजीएएस) के सदस्य हैं। इसके बावजूद सरकार ने अभी तक इसके लाभों से कैडर अधिकारियों को वंचित रखा है। न्यायालय ने कहा था, सेवा/भर्ती नियमों में सभी परिणामी लाभों सहित छह माह के भीतर आवश्यक संशोधन किए जाएं। छह माह के भीतर कैडर समीक्षा पूर्ण की जाए और दो वर्षों के भीतर महानिरीक्षक (आईजी-एसएजी) स्तर तक आईपीएस प्रतिनियुक्ति के पदों में चरणबद्ध तरीके से कमी की जाए। सरकार द्वारा दायर पुनर्विचार याचिका को 28 अक्तूबर 2025 को मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की पीठ द्वारा निरस्त कर दिया गया।
सरकार ने कही वैधानिक हस्तक्षेप की बात
सुप्रीम कोर्ट द्वारा पुनर्विचार याचिका को निरस्त किए जाने के बाद सरकार के लिए उक्त निर्णय अंतिम एवं बाध्यकारी हो गया था। सीआरपीएफ के पूर्व आईजी केके शर्मा के अनुसार, यह खेद का विषय रहा है कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित समय सीमा के भीतर न तो कैडर समीक्षा पूर्ण की गई और न ही सेवा नियमों में अपेक्षित संशोधन किए गए। नतीजा, 6 जनवरी को अवमानना याचिका दायर करनी पड़ी। इस मामले की सुनवाई के दौरान भारत सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता ने न्यायालय को सूचित किया कि केंद्र सरकार इस विषय में वैधानिक हस्तक्षेप पर विचार कर रही है। यह कथन सीएपीएफ के कैडर अधिकारियों के लिए अत्यंत अप्रत्याशित एवं निराशाजनक रहा। यह विधेयक पंद्रह वर्षों की लंबी और कठिन न्यायिक लड़ाई के बाद केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के अधिकारियों के पक्ष में आए सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के प्रभाव को समाप्त कर सकता है।
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सर्वोच्च अदालत का फैसला पलटने की कोशिश
बता दें कि अधिकांश नेताओं को सीएपीएफ की सुरक्षा मिली हुई है। यहां तक एसपीजी में भी ज्यादातर सुरक्षा कर्मी, सीएपीएफ से ही आते हैं। ऐसे में सुरक्षा कर्मियों से भी यह अपील की जा रही है कि वे अपने-अपने स्तर पर उक्त बिल को लेकर संबंधित नेता या नौकरशाह से बात करें। पूर्व एडीजी बीएसएफ एसके सूद बताते हैं कि केंद्र सरकार, केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सामान्य प्रशासन) विधेयक, 2026 के जरिए कैडर अफसरों के हितों पर कुठाराघात करना चाहती है। इनके पदोन्नति के अवसरों को खत्म करने की साजिश रची जा रही है। सरकार की जब सुप्रीम कोर्ट में नहीं चली तो अब वैधानिक हस्तक्षेप के जरिए सर्वोच्च अदालत का फैसला पलटने की कोशिश की जा रही है।
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23 मार्च को जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण धरना
एसोसिएशन के महासचिव रणबीर सिंह का कहना है कि केंद्र सरकार द्वारा कैडर अफसरों के साथ लगातार किए जा रहे सौतेले व्यवहार को लेकर 23 मार्च को जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण तरीके से धरना दिया जाएगा। इस बाबत पीएमओ को नोटिस दे दिया गया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय को भी उक्त सूचना से अवगत कराया गया है। पूर्व एडीजी सीआरपीएफ एचआर सिंह ने सवाल करते हुए कहा, अब कैडर अफसरों के पास क्या विकल्प बचा है। ग्राउंड कमांडरों को पहली पदोन्नति मिलने में ही 15 साल लग रहे हैं। सिपाही से लेकर इंस्पेक्टर तक के रैंकों में भी यही स्थिति देखने को मिल रही है।
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ज्ञापन में कही गई ये बात
सत्ता पक्ष और विपक्ष के सांसदों को जो ज्ञापन दिया जा रहा है, उसमें कहा गया है कि केंद्रीय अर्धसैनिक बल, देश की आंतरिक सुरक्षा एवं सीमाओं की रक्षा की आधारशिला हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने 23 मई 2025 के अपने ऐतिहासिक निर्णय में यह घोषित किया कि सीएपीएफ के ग्रुप 'ए' कार्यकारी कैडर अधिकारी, वर्ष 1986 से संगठित ग्रुप 'ए' सेवा (ओजीएएस) के सदस्य हैं। इसके बावजूद सरकार ने अभी तक इसके लाभों से कैडर अधिकारियों को वंचित रखा है। न्यायालय ने कहा था, सेवा/भर्ती नियमों में सभी परिणामी लाभों सहित छह माह के भीतर आवश्यक संशोधन किए जाएं। छह माह के भीतर कैडर समीक्षा पूर्ण की जाए और दो वर्षों के भीतर महानिरीक्षक (आईजी-एसएजी) स्तर तक आईपीएस प्रतिनियुक्ति के पदों में चरणबद्ध तरीके से कमी की जाए। सरकार द्वारा दायर पुनर्विचार याचिका को 28 अक्तूबर 2025 को मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की पीठ द्वारा निरस्त कर दिया गया।
सरकार ने कही वैधानिक हस्तक्षेप की बात
सुप्रीम कोर्ट द्वारा पुनर्विचार याचिका को निरस्त किए जाने के बाद सरकार के लिए उक्त निर्णय अंतिम एवं बाध्यकारी हो गया था। सीआरपीएफ के पूर्व आईजी केके शर्मा के अनुसार, यह खेद का विषय रहा है कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित समय सीमा के भीतर न तो कैडर समीक्षा पूर्ण की गई और न ही सेवा नियमों में अपेक्षित संशोधन किए गए। नतीजा, 6 जनवरी को अवमानना याचिका दायर करनी पड़ी। इस मामले की सुनवाई के दौरान भारत सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता ने न्यायालय को सूचित किया कि केंद्र सरकार इस विषय में वैधानिक हस्तक्षेप पर विचार कर रही है। यह कथन सीएपीएफ के कैडर अधिकारियों के लिए अत्यंत अप्रत्याशित एवं निराशाजनक रहा। यह विधेयक पंद्रह वर्षों की लंबी और कठिन न्यायिक लड़ाई के बाद केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के अधिकारियों के पक्ष में आए सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के प्रभाव को समाप्त कर सकता है।
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