MP Politics: एमपी की आदिवासी बाहुल सीटों को लेकर क्यों परेशान BJP-कांग्रेस, यहीं से निकलता है सत्ता का रास्ता
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विस्तार
मध्यप्रदेश में साल के अंत में विधानसभा चुनाव होने है। ऐसे में प्रदेश के आदिवासी सूबे की राजनीति का सेंटर पाइंट बन गए है। भाजपा ने फिर सत्ता पर काबिज होने के लिए पूरा फोकस आदिवासियों क्षेत्रों पर शिफ्ट कर दिया है। सीएम शिवराज एक के बाद एक घोषणाएं करते हुए नजर आ रहे हैं। इसी बात को भांपते हुए अब कांग्रेस ने भी अपना फोकस जनजातियों क्षेत्रों पर केंद्रित कर दिया है।
आदिवासियों को रिझाने के लिए भाजपा-कांग्रेस के अपने वादे
सरकार में बरकरार रहने का भाजपा का लक्ष्य हो या फिर सत्ता में वापसी का कांग्रेस की कोशिश, दोनों ही पार्टी की उम्मीदें आदिवासी क्षेत्रों से होकर निकलती हैं। जिस तरफ आदिवासी वोट बैंक का पलड़ा झुकेगा, सत्ता उसी के करीब होगी। इसलिए इन दिनों प्रदेश की राजनीति और चुनावी तैयारियों में आदिवासियों का भरपूर ध्यान रखा जा रहा है। दोनों ही दल इस समुदाय को अपने साथ जोड़ने की कवायद में जुटे हुए हैं। मध्यप्रदेश के एक प्रदेश पदाधिकारी का कहना है कि आदिवासी मतदाताओं पर पकड़ मजबूत करने के लिए सत्तारूढ़ भाजपा और प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस के बीच सियासी खींचतान तेज हो गई है। भाजपा सरकार ने आदिवासियों को साधने के लिए योजनाओं और घोषणाओं की बौछार कर दी है। भाजपा बैठकों के जरिए कार्यकर्ताओं को आदिवासियों के बीच पार्टी की बात रखने की ट्रेनिंग दे रही है।
इसके अलावा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी आदिवासियों को लेकर तैयारी शुरू कर दी है। मिशन 2023 को ध्यान में रखते हुए संघ बीते एक साल से आदिवासी इलाकों में विशेष अभियान चला रहा है। सूबे के आठ आदिवासी बहुल जिलों में संघ की शाखाओं को दोगुना करने का टारगेट रखा है। धर्मांतरण रोकने के लिए इन क्षेत्रों में जन जागरूकता, और संस्कारशालाएं भी बढ़ाई गई हैं। संघ ने आने वाले दिनों कई छोटे-बड़े कार्यक्रम और सभाएं इन्हीं जिलों में आयोजित करने की योजना बना रहा है।
यहीं नहीं, आदिवासियों को अपने पाले में फिर से मिलाने के लिए भाजपा हर संभव प्रयास कर रही है। चुनाव को ध्यान में रखते हुए पार्टी और सरकार ने अपना पूरा फोकस आदिवासियों वोटर्स पर शिफ्ट कर दिया है। आदिवासियों को लेकर भाजपा का आउटरीच प्रोग्राम हो या सरकार की ओर से योजनाओं की शुरुआत, आदिवासी अस्मिता से जुड़ी बिरसा मुंडा और टंट्या मामा जैसी विभूतियों का सम्मान हो या राजा शंकर शाह रघुनाथ शाह के शहीदी दिवस पर आयोजन, भोपाल के हबीबगंज रेलवे स्टेशन का रानी कमलापति के नाम पर नामकरण, भाजपा का आदिवासी और आदिवासी प्रतीकों पर फोकस साफ नजर आया है। प्रदेश की शिवराज सरकार ने आदिवासी समुदाय के बीच भगवान का दर्जा रखने वाले बिरसा मुंडा के नाम पर बिरसा मुंडा स्वरोजगार योजना, टंट्या मामा आर्थिक कल्याण योजना, मुख्यमंत्री जनजाति कल्याण योजना जैसी योजनाएं शुरू कीं। इसके अलावा आदिवासियों के लिए पशुधन योजना भी शुरू की गई।
कांग्रेस इस तरह साध रही आदिवासियों को
दूसरी तरफ कांग्रेस के चुनावी रणनीतिकार भी आदिवासी समुदाय को लुभाने में जुट गए हैं। कांग्रेस सड़क से लेकर विधानसभा तक आदिवासी वर्ग के मुद्दे उठाकर सरकार को घेरने की कोशिश कर रही है, वहीं योजनाओं को जाति-वर्ग में बांटने के बजाए सभी के लिए घोषित करते हुए आदिवासी वर्ग को भी साथ जोड़ रही है। हाल ही में हुए सीधी पेशाब कांड को पार्टी ने आदिवासी वर्ग के अपमान का मुद्दा बनाकर आदिवासी स्वाभिमान रैली भी निकाली।
कांग्रेस के पदाधिकारियों का कहना है कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ ने आदिवासी नेताओं और विधायकों को आदिवासी क्षेत्रों का दौरा करने और आदिवासियों के साथ संवाद स्थापित करने के निर्देश दे दिए हैं। पार्टी ने अगले छह माह के लिए प्लान ऑफ एक्शन भी तैयार किया है। इसके तहत पार्टी लगातार आदिवासी अंचल में पड़ने वाली विधानसभा सीटों पर मेहनत मशक्कत करेगी। पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आदिवासी बहुल क्षेत्र शहडोल दौरा हुआ था। अब कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी उसी जिले में ब्यौहारी में जनसभा करने आ रहे हैं। 2018 में जब कांग्रेस की सरकार बनी तो उसे जिताने में आदिवासी वोट बैंक का बड़ा रोल रहा था। 2018 के विधानसभा चुनावों में आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित 47 सीटों में से कांग्रेस को 30 सीटों पर जीत मिली थी।
जयस संगठन की एंट्री से भाजपा-कांग्रेस परेशान
इस बीच मध्य प्रदेश में अब तक कांग्रेस को समर्थन देने वाले जय आदिवासी युवा शक्ति संगठन जयस ने इस बार अपने दम पर चुनाव लड़ने का एलान कर दिया है। संगठन फिलहाल 80 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े करेगा। ये वो सीटें हैं जहां आदिवासी वोटर निर्णायक हैं। जयस के अकेले चुनाव लड़ने के एलान से कांग्रेस में बेचैनी पैदा हो गई है। वहीं भाजपा भी घबरा रही है। जयस जिन 80 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने वाला है, उनमें वह सीटें भी शामिल होंगी, जो कांग्रेस के कब्जे वाली आदिवासी सीटें हैं।
प्रदेश में यह आदिवासी सीटों का गणित
प्रदेश में आदिवासियों की बड़ी आबादी होने से 230 विधानसभा में से 84 सीटों पर उनका सीधा प्रभाव है। 2013 के विधानसभा चुनाव में आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित 47 सीटों में से भाजपा ने 31 सीटें जीती थीं। जबकि कांग्रेस के खाते में 15 सीट आई थीं। 2018 के चुनाव में भाजपा 47 में से सिर्फ 16 पर ही जीत दर्ज कर सकी थी। कांग्रेस ने 30 सीटें जीतीं और भाजपा सत्ता से बाहर हो गई थी। 2023 के चुनावों में सत्ता के शीर्ष तक पहुंचने के लिए आदिवासियों का साथ बेहद जरूरी है। यही वजह है कि भाजपा हो या कांग्रेस दोनों अपने-अपने तरीकों से आदिवासियों को रिझाने में कोई कोर कसर छोड़ना नहीं चाहते हैं।