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कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा, पहली पत्नी के लिए क्रूरता का कारण बनता है बहुविवाह
Sat, 12 Sep 2020 10:33 PM IST
गौरव पाण्डेय
पीटीआई, बंगलूरू
पीटीआई, बंगलूरू
Published by: गौरव पाण्डेय
Updated Sat, 12 Sep 2020 10:33 PM IST
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कर्नाटक उच्च न्यायालय ने कहा कि मुस्लिम पुरुष द्वारा दूसरी शादी करना भले ही कानूनी हो लेकिन यह पहली पत्नी के प्रति भारी क्रूरता का कारण बनता है।
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उच्च न्यायालय की कलबुर्गी खंडपीठ में न्यायमूर्ति कृष्ण एस दीक्षित और न्यायमूर्ति पी कृष्ण भट की पीठ ने हाल में निचली अदालत के फैसले को निरस्त करने की मांग वाली अपील को खारिज कर दिया था। इसमें याचिकाकर्ता युसूफ पाटिल की पहली पत्नी रमजान बी द्वारा शादी को खत्म करने की याचिका को न्यायोचित करार दिया गया था।
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पीठ ने अपनी टिप्पणी में कहा कि ‘हालांकि, मुस्लिमों में दूसरा विवाह कानूनी है, लेकिन अक्सर यह पहली पत्नी के खिलाफ भारी क्रूरता का कारण बनता है और इसलिए उसके द्वारा तलाक का दावा न्यायोचित है।’
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उल्लेखनीय है कि उत्तरी कर्नाटक के विजयपुरा जिला के मुख्यालय के रहने वाले पाटिल ने जुलाई 2014 में शरिया कानून के तहत बंगलूरू में रमजान बी से निकाह किया था। इस शादी के बाद पाटिल ने दूसरी शादी कर ली।
इसके बाद रमजान बी ने निचली अदालत में याचिका दायर कर क्रूरता और परित्याग करने के आधार पर शादी खत्म करने का अनुरोध किया। रमजान बी ने अपने पति और उसके माता-पिता पर उससे और अपने माता-पिता से दुर्व्यवहार करने का आरोप लगाया।
इसके खिलाफ पाटिल ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर कहा कि वह पहली पत्नी से प्यार करता है जो इस मामले में प्रतिवादी है। पाटिल ने अदालत से कहा कि उसने माता-पिता के भारी दबाव की वजह से दूसरी शादी की जो शाक्तिशाली और राजनीतिक रूप से प्रभावशाली हैं।
उसने दूसरे विवाह को न्यायोचित ठहराते हुए कहा कि शरिया कानून में मुस्लिमों को बहुविवाह की अनुमति है और इसलिए यह कृत्य क्रूरता के बराबर नहीं है और न ही संयुग्म (विवाह) के अधिकारों का विरोध करने का आधार है।
पीठ ने पाटिल के इस तर्क को खारिज कर दिया कि शरिया कानून बहुविवाह के साथ पहले विवाह को पुन: स्थापित करने की अनुमति देता है। पीठ ने टिप्पणी की, ‘अगर बताई गई परिस्थितियों को न्यायोचित माना जाए तो पति दो और शादियां कर सकता है और शरिया का सहारा ले सकता है।’