पेरिस समझौते से US पीछे हटा, दुनियाभर में विरोध, चीन-भारत पर बढ़ी जिम्मेदारी
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अमेरिका के पेरिस समझौते से अलग हो जाने के बाद दुनियाभर के देशों में बहस छिड़ गई है। गुरुवार को अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने समझौते से हटने की घोषणा की।उन्होंने भारत, रूस और चीन पर निशाना साधते हुए कहा था कि ये देश प्रदूषण रोकने के लिए कुछ नहीं कर रहे हैं, जबकि अमेरिका इसके लिए करोड़ों डॉलर दे रहा है।
अब अमेरिका के हट जाने के बाद भारत और चीन के ऊपर बड़ी जिम्मेदारियां आ गई हैं। दरअसल, ट्रंप का यह कदम कार्बन उत्सर्जन को कम करने की अंतरराष्ट्रीय कोशिशों को बड़ा झटका माना जा रहा है।
पीएम मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिन पिंग को इसकी पहले से ही भनक थी, इसलिए वे अक्सर कहते दिखे कि वे पेरिस समझौते को लेकर अपने किए वादों को पूरा करने में हमेशा तैयार हैं। इतना ही नहीं दोनों देशों ने इससे जुड़े दूसरे देशों को ऐसा ही करने की हिदायत भी दी।
चार देशों की यात्रा पर निकले पीएम मोदी ने बर्लिन में कहा कि जलवायु परिवर्तन के प्रति कोई कदम न उठाना एक अपराध जैसा है। चीन के राष्ट्रपति ने पिछले साल कहा था कि 2015 का पेरिस समझौता एक बड़ी उपलब्धि है और इस बड़ी जिम्मेदारी का एहसास हमारी आने वाली पीढ़ियों को जरूर होना चाहिए।
यूरोपियन लीडर्स ने पेरिस समझौते का पक्ष लेते हुए ट्रंप के इस कड़े रुख पर खासी नाराजगी जाहिर की है। जर्मनी, फ्रांस और इटनी ने ज्वाइंट स्टेटमेंट जारी की है जिसमें ट्रंप के फैसले का विरोध किया गयाहै। स्टेटमेंट में यूएस के फैसले पर अफसोस जाहिर करते हुए लिखा गया कि गृह, समाज और अर्थव्यवस्थाओं के लिए ये समझौता एक अहम उपकरण है।
यूरोपियन संघ के एग्ज्यूटिव कमीशन के हेड जीन क्लॉयड ने यूएस के इस फैसले को बेहद गलत माना है और बोले कि यूरोपीय संघ ट्रम्प प्रशासन की ओर एकतरफा निर्णय का विरोध करता है।
बर्लिन में चांसलर एजेंला मर्केल ने कहा कि ट्रंप का फैसला सही नहीं है और अब पेरिस समझौते के लिए गंभीर कदम उठाए जाएंगे।
इटली के प्रधान मंत्री पाओलो जेन्टिलोनी ने इससे किसी भी पीछे हटने के खिलाफ आग्रह किया। उन्होंने ट्विटर पर कहा कि इटली कार्बन उत्सर्जन को कम करने, नवीकरणीय ऊर्जा, सतत विकास के लिए प्रतिबद्ध है।"