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'राजा से ज्यादा वफादार': जजों पर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस भुइयां की तीखी टिप्पणी, न्याय व्यवस्था पर उठाए सवाल

Sun, 22 Mar 2026 05:54 PM IST
Pavan न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Pavan Updated Sun, 22 Mar 2026 05:54 PM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस भुइयां ने कहा कि न्यायपालिका को न तो सरकार का समर्थक बनना चाहिए और न ही हर समय आलोचक, बल्कि उसे संविधान का रक्षक बनकर काम करना चाहिए और जनता का भरोसा बनाए रखना चाहिए। वे सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन राष्ट्रीय सम्मेलन 2026 में बोल रहे थे। 

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'More loyal than the king': Justice Bhuyan's scathing remarks on judges, raise questions about judicial system
न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां - फोटो : ANI

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां ने न्यायपालिका की कार्यप्रणाली पर बड़ा बयान देते हुए कहा है कि कई जज राजा से ज्यादा वफादार जैसी मानसिकता से काम कर रहे हैं। इसका मतलब यह है कि कुछ जज जरूरत होने पर भी बेल (जमानत) नहीं देते, जिससे लोग महीनों और वर्षों तक जेल में पड़े रहते हैं। उन्होंने यह बात सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन राष्ट्रीय सम्मेलन 2026 में कही, जहां वे विकसित भारत में न्यायपालिका की भूमिका विषय पर बोल रहे थे।
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'जमानत न मिलने से बढ़ रही परेशानी'
जस्टिस भुइयां ने साफ कहा कि न्यायपालिका के अंदर ही कुछ लोग जांच एजेंसियों के प्रति जरूरत से ज्यादा झुकाव रखते हैं। इसका सीधा असर आम लोगों पर पड़ता है, क्योंकि उन्हें लंबे समय तक जेल में रहना पड़ता है, जबकि कई मामलों में वे दोषी भी साबित नहीं होते।
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'छोटी-छोटी बातों पर एफआईआर दर्ज हो रही'
उन्होंने चिंता जताई कि आजकल बहुत मामूली मामलों में भी एफआईआर दर्ज हो रही है। जैसे, सोशल मीडिया पोस्ट या मीम, छात्रों के प्रदर्शन, सामान्य विरोध या आंदोलन। इन मामलों में जांच चलती रहती है और बाद में ये केस सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच जाते हैं, जिससे कोर्ट का समय भी बहुत खर्च होता है।

पीएमएलए और यूएपीए का ज्यादा इस्तेमाल
जस्टिस भुइयां ने धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) और गैरकानूनी गतिविधियां निवारण अधिनियम (यूएपीए) जैसे कानूनों के ज्यादा इस्तेमाल पर भी सवाल उठाए। उन्होंने आंकड़े बताते हुए कहा- पीएमएलए में हजारों केस दर्ज हुए, लेकिन बहुत कम मामलों में ट्रायल पूरा हुआ। यूएपीए में भी गिरफ्तारी बहुत ज्यादा, लेकिन सजा बहुत कम। उदाहरण के तौर पर साल 2019 में 1984 गिरफ्तारियां, लेकिन सिर्फ 34 को सजा मिली है, वहीं साल 2022 में 2636 गिरफ्तारियां, लेकिन सिर्फ 41 को सजा मिली। यानि औसतन सिर्फ 4% मामलों में ही सजा हो रही है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब 95% लोगों के बरी होने की संभावना है, तो उन्हें वर्षों तक जेल में क्यों रखा जाए?


विकसित भारत में असहमति जरूरी
जस्टिस भुइयां ने कहा कि असली विकसित भारत वही होगा जहां असहमति को अपराध न माना जाए और अलग-अलग विचारों को सहन किया जाए। इसके साथ ही समाज में बराबरी और न्याय हो। उन्होंने कहा कि अगर लोग अपने विचार भी नहीं रख सकते, तो वह विकसित समाज नहीं हो सकता।

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सरकार सबसे बड़ी मुकदमेबाज
उन्होंने यह भी कहा कि देश में सबसे ज्यादा केस सरकार ही करती है। कई बार अधिकारी बिना वजह अपील कर देते हैं, जिससे कोर्ट पर बोझ बढ़ता है। उन्होंने बताया कि एक जज को रोज 400-500 केस सुनने पड़ते हैं, कई बार जज थकान और दबाव में काम करते हैं।

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