मानसून सत्र: हंगामे के कारण सदन नहीं चलने पर हर घंटे स्वाह हो जाते हैं डेढ़ करोड़ रुपये
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
बुधवार से शुरू हुए संसद का मानसून सत्र के लिए भाजपा और कांग्रेस एक दूसरे को डील की पेशकश करती रही हैं ताकि संसद की कार्यवाही सुनिश्चित की जा सके और कुछ कार्य हो सके। सरकार की योजना 15 बिल पारित कराने की है। हालांकि विपक्ष के आक्रामक रवैये के कारण चुनौतियां भी हैं। मंगलवार को कांग्रेस के दफ्तर में विपक्षी दलों की बैठक हुई, जिसमें सरकार को घेरने की तैयारी की गई। इसमें अविश्वास प्रस्ताव पर 12 दलों ने सहमति भी जताई।
कार्य: 68 लंबित विधेयक, जिनमें से 25 को विचार के लिए सूचीबद्ध किया गया है और 3 वापसी के लिए सूचीबद्ध हैं। 18 नए विधेयक लाए जाने के लिए सूचीबद्ध हैं। मानसून सत्र के दौरान ही राज्यसभा में उप-सभापति का चुनाव होगा। पीजे कुरियन का कार्यकाल पूरा हो रहा है।
राजनीति: राज्यसभा चुनाव में (2019 के लोकसभा चुनाव से पहले) विपक्षी दलों की एकता की परीक्षा हो जाएगी। मॉब लिंचिंग, सांप्रदायिक हिंसा, महंगाई, ईंधन की कीमतें, किसानों का संकट, जम्मू-कश्मीर, बैंक धोखाधड़ी और टीडीपी द्वारा अविश्वास प्रस्ताव पर तीखी बहस की उम्मीद करें।
हकीकत: इस साल का आखिरी सत्र साल 2000 से लेकर अब तक का सबसे कम उपयोगी सत्र था। जिसमें संसद के विधायी कार्यों पर लोकसभा में 1 फीसदी समय और राज्यसभा में 6 फीसदी समय खर्च किया गया।
आप इसके लिए भुगतान करते हैं: संसद सत्र के हर एक मिनट के लिए आपको 2.5 लाख रुपये अदा करने पड़ते हैं (जो कि 2012 में था, अब इसकी लागत बहुत ज्यादा है)। अब इसकी लागत है 1.5 करोड़ रुपये प्रति घंटे और 9 करोड़ रुपये प्रति दिन है (अगर एक दिन में 6 घंटे का कार्य करना माना जाए)। सत्र के हंगाने की भेंट चढ़ जाने का मतलब है कि आपका पैसा नाली में बह गया।
सदन के हंगामे में बर्बाद हो जाती है आपकी गाढ़ी कमाई?आपका पैसा भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ता है, संसद में बर्बाद हुए समय के लिए भी आप पैसे अदा करते हैं। यहां देखिए यह आपकी जेब पर कितना भारी पड़ता है:
दो घंटे कार्य नहीं हुआ = तीन करोड़ रूपये = झामुमो घूस कांड (1995)
एक दिन कार्य नहीं हुआ = सात करोड़ रुपये = चारा घोटाला (1990)
दो दिन कार्य नहीं हुआ = 20 करोड़ रुपये = एचडीडब्ल्यू पनडुब्बी घोटाला (1987)
तीन दिन कार्य नहीं हुआ = 32 करोड़ रुपये = यूटीआई घोटाला (2001)
सात दिन कार्य नहीं हुआ = 64 करोड़ रुपये = बोफोर्स घोटाला (1987)
15 दिन कार्य नहीं हुआ = 133 करोड़ रुपये = यूरिया घोटाला (1996)
इसके लिए कौन जिम्मेदार है? निश्चित तौर पर, सरकार। संसद को सुचारू रूप से चलाने के लिए मंत्री होते हैं जिन्हें वेतन और भत्ता दिया जाता है।
मानसून सत्र की स्थिति
18 जुलाई से 10 अगस्त तक चलने वाले इस सत्र में 6 दिन छुट्टी के हैं। इसलिए कुल मिलाकर सदन की कार्यवाही के लिए हैं 18 बैठक यानी 198 घंटे। संसद के दोनों सदनों में 68 विधेयक अटके पड़े हैं। इनमें तीन तलाक पर रोक लगाने के लिए मुस्लिम विवाह संरक्षण बिल, मासूमों से रेप पर फांसी के लिए आपराधिक कानून संशोधन बिल, ओबीसी आयोग को संवैधानिक दर्जा बिल, भगोड़ा कानून सरकार की प्राथमिकता की सूची में सबसे ऊपर हैं। इसके अलावा संसद के इस सत्र में मानवाधिकार, सूचना का अधिकार और मानव तस्करी पर गंभीर बहस भी देखने-सुनने को मिलेगी।
मानसून सत्र में अब तक सूचीबद्ध किए गए विधेयक
सरकार ने मानसून सत्र के लिए 15 बिलों को सूचीबद्ध किया है। इनमें सरकार की प्राथमिकता अगले लोकसभा चुनाव के लिए गेमचेंजर माने जाने वाले तीन तलाक को दंडनीय बनाने, ओबीसी आयोग को संवैधानिक दर्जा दिलाने और 12 वर्ष से कम उम्र की बच्चियों के साथ दुष्कर्म के आरोपियों को फांसी की सजा दिलाने वाले बिलों का कानूनी जामा पहनाने का है। इसी सत्र में सरकार को कई अध्यादेशों के संदर्भ में भी बिल पेश करना है।
इस सत्र के लिए अब तक सरकार ने जिन बिलों को सूचीबद्ध किया है, उनमें
- तीन तलाक
- मासूमों से रेप पर फांसी के लिए आपराधिक कानून संशोधन बिल
- ओबीसी आयोग को संवैधानिक दर्जा बिल
- सार्वजनिक परिसर अनधिकृत कब्जा निषेध संशोधन बिल
- दंत चिकित्सक संशोधन बिल
- जन प्रतिनिधि संशोधन बिल 2017
- नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट संशोधन बिल
- दिल्ली अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता बिल
- भगोड़ा आर्थिक अपराध बिल
- मानवाधिकार सुरक्षा संशोधन बिल
- सूचना का अधिकार संशोधन बिल
- डीएनए प्रौद्योगिकी उपयोग नियामक बिल
- बांध सुरक्षा बिल
- मानव तस्करी रोकथाम बिल
- सुरक्षा एवं पुनर्वास बिल शामिल हैं।
इसके अलावा सरकार की योजना नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार दूसरा संशोधन बिल, महत्वपूर्ण बंदरगाह प्राधिकार बिल, राष्ट्रीय खेल विश्वविद्यालय बिल, भ्रष्टाचार रोकथाम संशोधन बिल, जिसे राज्यसभा में पेश करने के बाद प्रवर समिति को भेज दिया था, को चर्चा के लिए सदन में पेश करने की है।
सरकार की योजनाएं और चुनौतियां
मानसून सत्र में सरकार को लोकसभा में 28 और राज्यसभा में 30 विधेयक पारित कराने हैं। तीन तलाक के अलावा सरकार इस बार बहुविवाह और निकाह हलाला जैसे मुद्दों पर भी विपक्ष को घेरेगी। वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल कानून बनाने के लिए 17 जुलाई की समयसीमा दी थी। सरकार को उसका अनुपालन भी सुनिश्चित करना है। इसके अलावा, पीजे कुरियन के रिटायर होने के बाद लोकसभा के उपाध्यक्ष का चुनाव भी मानसून सत्र में होना है। बीजेपी की कोशिश है कि लोकसभा में बहुमत होने के नाते इस पद पर या तो उसका अपना उम्मीदवार जीते या उसके किसी सहयोगी दल का। लेकिन विपक्ष इसके लिए अपना संयुक्त उम्मीदवार उतारना चाहता है।
यह है विधेयकों की स्थिति
चिट फंड संशोधन विधेयक 2018
राज्य सरकार की अनुमति के बिना कोई चिटफंड नहीं चला सकता।
स्थिति: लोकसभा में 12 मार्च 2018 को लाया गया। प्रवर समिति की रिपोर्ट तीन महीने में मांगी गई।
भगोड़ा आर्थिक अपराधी विधेयक
यह बिल लोकसभा में 12 मार्च को पेश किया गया था। इसके पारित होने के बाद सरकार उन आर्थिक अपराधियों की संपत्ति जब्त कर पाएगी, जो आपराधिक मुक़दमों से बचने के लिए देश छोड़कर भाग गए हैं।
स्थिति: लोकसभा में लंबित है।
संविधान संशोधन (123वां) विधेयक
राष्ट्रीय अनुसूचित जाति और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की तर्ज पर राष्ट्रीय पिछड़ा आयोग को भी संवैधानिक दर्जा देना।
स्थिति: राज्यसभा से पारित। लोकसभा में लंबित।
महिला आरक्षण विधेयक
लोकसभा और विधानसभाओं की एक तिहाई सीटों को महिलाओं के लिए आरक्षित करना।
स्थिति: राज्यसभा से 9 मार्च 2010 के पारित हो चुका है। लेकिन 2014 में लोकसभा भंग हो जाने की वजह से वहीं नए सिरे से लाना होगा।
दिवालिया विधेयक
इनसालवेंसी और बैंकरप्सी कोड अध्यादेश 6 जून 2018 को लाया गया। किसी व्यक्ति या कंपनी द्वारा अपना कर्ज न चुकी पाने की स्थिति में उसकी संपत्तियों की नीलामी कर बकाया वसूल करने का प्रावधान।
स्थिति: अभी संसद के किसी भी सदन में लाया जाना बाकी।
राष्ट्रीय खेल विश्वविद्यालय विधेयक
खेलों को बढ़ावा देने के लिए मणिपुर में एक खेल विश्वविद्यालय की स्थापना करना।
स्थिति: लोकसभा 10 अगस्त 2010 को लाया गया। वहीं लंबित। 31 मई 2018 से अध्यादेश लागू।
आपराधिक कानून संशोधन विधेयक
आपराधिक दंड संहिता (आईपीसी) 1860 में संशोधन कर नाबालिग के साथ बलात्कार के मामले में कम से कम बीस साल की सज़ा। सामूहिक बलात्कार के मामलों में फांसी।
स्थिति: 21 अप्रैल 2018 को अध्यादेश लाया गया। संसद के किसी भी सदन में पेश होना बाकी।
नेशनल मेडिकल कमीशन विधेयक 2017
लोकसभा में 29 दिसंबर 2017 को लाया गया यह विधेयक मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया की जगह नेशनल मेडिकल कमीशन बनाएगा। यह देश भर में चिकित्सा शिक्षा और प्रैक्टिस को नियंत्रित करेगा।
स्थिति: अभी लोकसभा में लंबित।
इनके अलावा कुछ अन्य लंबित विधेयक हैं - ट्रांसजेंडर (अधिकारों की सुरक्षा) विधेयक, उपभोक्ता संरक्षण विधेयक 2018, नेशनल काउंसिल फॉर टीचर एजुकेशन विधेयक 2017, मानवाधिकार सुरक्षा संशोधन विधेयक आदि।