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केरल में चुनावी तपन के बीच मानसून का इंतजार
सुदीप ठाकुर/ तिरुवनंतपुरम
Updated Wed, 11 May 2016 08:02 PM IST
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मौसम विज्ञान केंद्र केरल
- फोटो : amar ujala
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चुनावी तपन के बीच मई की दोपहरी में केरल की राजधानी के बीचोंबीच छोटी पहाड़ी जैसी चढ़ान वाली जगह पर हरे भरे पेड़ों से घिरे इस परिसर पर शायद ही किसी का ध्यान जाए। यह मौसम विज्ञान केंद्र है, जहां से पूरे देश को मानसून की भविष्यवाणी का इंतजार रहता है।
हालांकि इसकी औपचारिक घोषणा दिल्ली स्थित मौसम विज्ञान विभाग केंद्र से की जाती है। इस उष्णकटिबंधीय शहर के ऑब्जरवेटरी हिल्स में नंदनवनम क्षेत्र में स्थित इस परिसर में अभी कोई हलचल नजर नहीं आती। मगर यहां के मौसम विज्ञानी अपनी नियमित गणना में लगे हुए हैं।
असल में मौसम पर सियासी बातें करना एक बात है और उसकी वैज्ञानिक गणना दूसरी बात। इसलिए आप तब चौंक सकते हैं, जब इस केंद्र के निदेशक संतोष कुमार यह कहें कि मानसून यों तो पहले अंडमान निकोबार द्वीप समूह में आता है, मगर भारतीय उपमहाद्वीप में यह केरल के रास्ते से ही प्रवेश करता है। वह समझाते हैं कि 'अंडमान निकोबार द्वीप समूह है, वहां से मानसूनी बारिश श्रीलंका की ओर मुड़ जाती है और फिर केरल के तट और लक्ष्यदीव तक आती है।'
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यानी मौसम विज्ञान के लिहाज से भारतीय उपमहाद्वीप, अंडमान और निकोबार तथा लक्ष्यदीव तीन अलग केंद्र हुए। इस तरह यह कहा जा सकता है कि देश में सबसे पहले मानसून केरल के तट से टकराता है। तो क्या मानसून को आता हुआ देखा जा सकता है? और क्या उसके केरल के तट से टकराने की कोई मुकम्मल जगह भी है?
नहीं। वह कहते हैं, 'ऐसा नहीं है कि कोई कार मानसून की बारिश लेकर आ रही हो और फिर अचानक त्रिवेंद्रम के तट से टकरा जाए। ऐसा भी नहीं है कि बादलों का बड़ा सा घेरा चला आ रहा हो और झमाझम बारिश कर दे। '
उत्तर भारत के लोग इन दिनों गरमी से परेशान हैं, जहां पारा चालीस डिग्री के पार पहुंच जा रहा है, लेकिन उन्हें यह जानकर हैरत हो सकती है कि मौसम विभाग गर्मियों के इस मौसम को भी प्री मानसून कहता है। संतोष कुमार बताते हैं, 'दरअसल मार्च से मई के दौरान जो बारिश होती है, वह प्री मानसून की बारिश है। हमारे लिए समर और प्री मानसून सीजन एक ही है।'
मगर मानसून आता कैसे है?
वह कहते हैं, तापमान, आद्रता, हवा और बादल जैसे विभिन्न पैरामीटर हैं, जिनके आधार पर मानसून का आकलन किया जाता है। अमूमन मई के दूसरे हफ्ते में मानसून के आगमन की तैयारी होने लगती है।
यह जरूरी नहीं है कि जोर से होने वाली बारिश मानसून का आगाज ही हो। हम कम से कम दो दिन बारिश का इंतजार करते हैं।हम यह देखते हैं कि यह कोई अस्थायी हलचल तो नहीं है। उसके बाद विभिन्न मानकों पर संतुष्ट होने के बाद ही मानसून की घोषणा की जाती है। यानी हर बारिश मानसूनी बारिश नहीं होती।
केरल में 14 ऑब्जरवेटरी हैं, जिनके जरिये अरब सागर में होनी वाली हलचलों पर नजर रखी जाती है। संतोष कुमार बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में मानसून में कुछ तब्दीली आई है, जिसकी वजह से केरल में औसत बारिश दस फीसदी तक घट गई है।
हालांकि वह यह भी कहते हैं कि इससे देश के दूसरे हिस्सों में होने वाली बारिश से कोई संबंध नहीं है। अमूमन केरल के तट पर एक जून को दक्षिण पश्चिम मानसून टकराता है और उसके बाद वह दस जून तक मुंबई और फिर पूरे देश को अपनी गिरफ्त में ले लेता है। मानसून का इंतजार करते हुए यह भी जान लीजिए कि यह अरबी शब्द मौसिम से बना है, जिसका अर्थ होता है मौसम।
त्रावणकोर महाराजा ने स्थापित किया था
तिरुवनंतपुरम स्थित इस ऑब्जरवेटरी की स्थापना त्रावणकोर के महाराजा स्वाथि थिरुनल ने त्रावणकोर सरकार के कमर्शियल एजेंट जॉन कालडेकोट की मदद से 1836 में की थी। इसे खगोलीय और मौसम संबंधी जानकारी के लिए स्थापित किया गया था।
1927 में इसे मौसम और खगोलीय विभाग के रूप में दो हिस्सों में बांट दिया गया। स्वतंत्रता मिलने के बाद 1951 में भारत सरकार ने इसे अपने अधीन ले लिया। यह केंद्र 1963 से मौसम की भविष्यवाणी कर रहा है। पहले यह केंद्र गोलाकार महलनुमा भवन में स्थित था। मगर उसकी हालत अब जर्जर हो गई है। उसके बगल में ही नया भवन बन गया है।
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हालांकि इसकी औपचारिक घोषणा दिल्ली स्थित मौसम विज्ञान विभाग केंद्र से की जाती है। इस उष्णकटिबंधीय शहर के ऑब्जरवेटरी हिल्स में नंदनवनम क्षेत्र में स्थित इस परिसर में अभी कोई हलचल नजर नहीं आती। मगर यहां के मौसम विज्ञानी अपनी नियमित गणना में लगे हुए हैं।
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असल में मौसम पर सियासी बातें करना एक बात है और उसकी वैज्ञानिक गणना दूसरी बात। इसलिए आप तब चौंक सकते हैं, जब इस केंद्र के निदेशक संतोष कुमार यह कहें कि मानसून यों तो पहले अंडमान निकोबार द्वीप समूह में आता है, मगर भारतीय उपमहाद्वीप में यह केरल के रास्ते से ही प्रवेश करता है। वह समझाते हैं कि 'अंडमान निकोबार द्वीप समूह है, वहां से मानसूनी बारिश श्रीलंका की ओर मुड़ जाती है और फिर केरल के तट और लक्ष्यदीव तक आती है।'
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यानी मौसम विज्ञान के लिहाज से भारतीय उपमहाद्वीप, अंडमान और निकोबार तथा लक्ष्यदीव तीन अलग केंद्र हुए। इस तरह यह कहा जा सकता है कि देश में सबसे पहले मानसून केरल के तट से टकराता है। तो क्या मानसून को आता हुआ देखा जा सकता है? और क्या उसके केरल के तट से टकराने की कोई मुकम्मल जगह भी है?
नहीं। वह कहते हैं, 'ऐसा नहीं है कि कोई कार मानसून की बारिश लेकर आ रही हो और फिर अचानक त्रिवेंद्रम के तट से टकरा जाए। ऐसा भी नहीं है कि बादलों का बड़ा सा घेरा चला आ रहा हो और झमाझम बारिश कर दे। '
उत्तर भारत के लोग इन दिनों गरमी से परेशान हैं, जहां पारा चालीस डिग्री के पार पहुंच जा रहा है, लेकिन उन्हें यह जानकर हैरत हो सकती है कि मौसम विभाग गर्मियों के इस मौसम को भी प्री मानसून कहता है। संतोष कुमार बताते हैं, 'दरअसल मार्च से मई के दौरान जो बारिश होती है, वह प्री मानसून की बारिश है। हमारे लिए समर और प्री मानसून सीजन एक ही है।'
मगर मानसून आता कैसे है?
वह कहते हैं, तापमान, आद्रता, हवा और बादल जैसे विभिन्न पैरामीटर हैं, जिनके आधार पर मानसून का आकलन किया जाता है। अमूमन मई के दूसरे हफ्ते में मानसून के आगमन की तैयारी होने लगती है।
यह जरूरी नहीं है कि जोर से होने वाली बारिश मानसून का आगाज ही हो। हम कम से कम दो दिन बारिश का इंतजार करते हैं।हम यह देखते हैं कि यह कोई अस्थायी हलचल तो नहीं है। उसके बाद विभिन्न मानकों पर संतुष्ट होने के बाद ही मानसून की घोषणा की जाती है। यानी हर बारिश मानसूनी बारिश नहीं होती।
केरल में 14 ऑब्जरवेटरी हैं, जिनके जरिये अरब सागर में होनी वाली हलचलों पर नजर रखी जाती है। संतोष कुमार बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में मानसून में कुछ तब्दीली आई है, जिसकी वजह से केरल में औसत बारिश दस फीसदी तक घट गई है।
हालांकि वह यह भी कहते हैं कि इससे देश के दूसरे हिस्सों में होने वाली बारिश से कोई संबंध नहीं है। अमूमन केरल के तट पर एक जून को दक्षिण पश्चिम मानसून टकराता है और उसके बाद वह दस जून तक मुंबई और फिर पूरे देश को अपनी गिरफ्त में ले लेता है। मानसून का इंतजार करते हुए यह भी जान लीजिए कि यह अरबी शब्द मौसिम से बना है, जिसका अर्थ होता है मौसम।
त्रावणकोर महाराजा ने स्थापित किया था
तिरुवनंतपुरम स्थित इस ऑब्जरवेटरी की स्थापना त्रावणकोर के महाराजा स्वाथि थिरुनल ने त्रावणकोर सरकार के कमर्शियल एजेंट जॉन कालडेकोट की मदद से 1836 में की थी। इसे खगोलीय और मौसम संबंधी जानकारी के लिए स्थापित किया गया था।
1927 में इसे मौसम और खगोलीय विभाग के रूप में दो हिस्सों में बांट दिया गया। स्वतंत्रता मिलने के बाद 1951 में भारत सरकार ने इसे अपने अधीन ले लिया। यह केंद्र 1963 से मौसम की भविष्यवाणी कर रहा है। पहले यह केंद्र गोलाकार महलनुमा भवन में स्थित था। मगर उसकी हालत अब जर्जर हो गई है। उसके बगल में ही नया भवन बन गया है।