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नोटा में सर्वोत्तम को भी किनारे कर देते हैं, इसका फायदा सबसे बुरा ले जाते है: मोहन भागवत  

Thu, 20 Sep 2018 12:21 AM IST
जितेंद्र भारद्वाज, नई दिल्ली 
जितेंद्र भारद्वाज, नई दिल्ली  Updated Thu, 20 Sep 2018 12:21 AM IST
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Mohan Bhagwat says NOTA Do not consider the best, it's advantage is take the worst candidate 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने लोकतंत्र में नोटा को अस्वीकार कर दिया है। उन्होंने कहा, नोटा में हम लोग सर्वोत्तम को भी किनारे कर देते हैं और इसका फायदा सबसे बुरा उम्मीदवार ले जाता है। होना यह चाहिए कि हमारे पास जो सर्वोत्तम उपलब्ध है, उसे चुन लें।

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प्रजातंत्र में सौ फीसदी लोग सही मिलेंगे, ऐसा बहुत मुश्किल है। सरसंघचालक ने मोदी सरकार के कामकाज को अच्छा-बुरा न बताते हुए केवल इतना कहा, जो सरकार भारत को स्वावलंबी और आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में काम कर रही है तो वह भी सही है। भाजपा ने साल 2014 से लेकर अब तक उस दिशा में चलने का काम किया है।
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मोहन भागवत ने बुधवार को विज्ञान भवन में आयोजित तीन दिवसीय ‘भविष्य का भारत: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दृष्टिकोण, व्याख्यानमाला के अंतिम दिन लोगों के सवालों के जवाब देते हुए ये बात कही हैं। सरसंघचालक से पूछा गया कि क्या वे अमेरिका या रूस जैसी प्रतिनिधित्व प्रणाली भारत में लागू करना चाहेंगे तो उन्होंने कहा, हमारी चुनाव पद्धति कैसी हो, यह बात तो हमारे लोग ही बताएंगे।
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भारत की चुनाव पद्धति में अगर किसी सुधार की जरूरत है तो करो। कुछ सुझाव आ भी रहे हैं। इसे पद्धति को बदला नहीं जा सकता, क्योंकि इसे सब लोग मामने हैं। यह साबित भी हो गया है कि आज भारत दुनिया का यशस्वी प्रजातंत्र माना जाता है।

संगठन मंत्री जो दल मांगते हैं, संघ उसे दे देता है...

आरएसएस और राजनीतिक दल का संबंध, इस विषय पर सवाल पूछा गया कि संघ क्या कभी दूसरे दलों की भी मदद करता है, इसका जवाब देते हुए भागवत ने कहा, हम किसी राजनीतिक दल का समर्थन नहीं करते, बल्कि उसकी नीति का समर्थन करते हैं। एक अन्य सवाल, भाजपा के संगठन मंत्री संघ से क्यों आते हैं। इस पर सरसंघचालक ने कहा, संगठन मंत्री जो मांगते हैं, संघ उसे दे देता है। कोई राजनीतिक दल इसका फायदा उठा लेता है तो कोई पीछे रह जाता है। मंदिर के मुद्दे पर संघ ने भाजपा की नीति का समर्थन किया था।
 

देश में एक नई शिक्षा नीति जल्द आएगी...

भागवत ने कहा, शिक्षा में भारतीय मूल्यों, परंपराओं व आधुनिकता का समावेश बहुत जरूरी है। शिक्षण संस्थान भले ही धर्म की शिक्षा न दें, मगर वे मूल्य आधारित व संस्कारयुक्त शिक्षा तो दें। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में इन सब बातों का समावेश होना चाहिए।

आज शिक्षा का स्तर नहीं घटा है, बल्कि देने वालों का स्तर घट गया है। देश में रिसर्च कम हो रही है। मूल्य, परंपराएं एवं संस्कारों के समावेश वाली नई शिक्षा नीति पर काम हो रहा है। बहुत जल्द नई शिक्षा नीति देखने को मिलेगी। संस्कृत भाषा के प्रति बेरुखी के सवाल पर उन्होंने कहा, किसी भाषा को किसी के ऊपर थोपना भी सही नहीं है।

भाषा का आदर व सम्मान मन की बात होती है। किसी भाषा से कभी भी शत्रुता नहीं रखनी चाहिए। अंग्रेजी का हौवा अपने दिमाग से निकाल दें। देश को जानने के लिए एक सामान्य भाषा होनी ही चाहिये। चूंकि आज हिंदी ज्यादा बोली जाती है तो इसे अपनाने में कोई गुरेज नहीं है। हां, एक बात है कि हिंदी बोलने वालों को भी दूसरे किसी एक राज्य की भाषा सीखनी चाहिये।

छोटे किसान गाय को अर्थव्यवस्था का आधार बना सकते हैं...

गाय को लेकर भीड़ हिंसा, इस सवाल के जवाब में सरसंघचालक ने कहा, गाय छोटे किसानों की अर्थव्यवस्था का आधार बन सकती है। सब लोगों को गाय का पालन करना चाहिये। अगर गाय खुले में नहीं घूमेगी तो उपद्रव भी नहीं होगा।

जैन धर्म के अलावा मुस्लिम भी अच्छी गौशाला चलाते हैं। यह बात साबित हो चुकी है कि अपने हाथ से गाय की सेवा करने वाले व्यक्ति में अपराधिक प्रवृति कम हो जाती है। भीड़ हिंसा बाबत उन्होंने कहा, यह गलत है। कानून को ऐसे लोगों की खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए।

संविधान सम्मत आरक्षण का समर्थन करता है संघ...

आरक्षण बाबत पूछे गए सवाल पर भागवत ने कहा, संघ सदैव संविधान सम्मत आरक्षण का समर्थन करता है और करता रहेगा। आरक्षण कब तक चले, इसका निर्णय वे लोग ही करेंगे, जिन्हें ये प्रदान किया गया है। बाकी ऐसे निर्णय लेने के लिए संवैधानिक पीठ है, वह स्वतंत्र निर्णय ले सकती है। समाज में बराबरी के लिए ऊपर वालों को थोड़ा झुकना होगा और नीचे वाले को एड़ी ऊपर उठानी होगी।

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