Modi Vs Kharge: मोदी बनाम खरगे हुआ चुनाव तो किसे होगा फायदा, सहमति बनाने की मुश्किलें हुईं दूर
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विस्तार
इंडिया गठबंधन की दिल्ली में आयोजित चौथी बैठक बहुत महत्त्वपूर्ण साबित हुई है। इस बैठक में अगले दस दिनों के अंदर सभी राज्यों में सीटों पर अंतिम सहमति बनाने की कोशिश करने की बात हुई है, तो कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को इंडिया गठबंधन का संयोजक या प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने की चर्चा भी हुई है। इसके बाद से ही यह चर्चा शुरू हो गई है कि यदि आगामी लोकसभा चुनाव 'मोदी बनाम खरगे' हुआ तो इसका क्या असर हो सकता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक अपनी छवि है। वे गुजरात में मुख्यमंत्री रहने के बाद अब दस साल से देश के प्रधानमंत्री पद पर विराजमान हैं। अपने कार्यों और जनहितकारी योजनाओं के जरिए देश की जनता के बीच उनकी एक खास अपील है। उनके नाम पर भाजपा को जीत दिलाने की विश्वसनीयता भी जुड़ गई है। भाजपा आगामी लोकसभा चुनाव भी उनके नाम 'मोदी की गारंटी' पर लड़ेगा।
लेकिन, केवल किसी नेता की छवि के आधार पर किसी चुनाव का परिणाम तय नहीं किया जा सकता। प्रधानमंत्री मोदी के ना्म पर भाजपा को अब तक की सबसे बड़ी जीत दिलाने का रिकॉर्ड दर्ज है, तो हिमाचल प्रदेश, बिहार, दिल्ली, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक और तेलंगाना जैसे राज्यों की हार भी उनके नाम पर दर्ज हैं।
दक्षिण में भाजपा के लिए मुश्किल खड़ी कर सकते हैं खरगे
खरगे के नाम पर अभी इंडिया गठबंधन में कोई सहमति नहीं बनी है, लेकिन यदि उनके नाम पर अंतिम सहमति बनी, तो यह कांग्रेस के लिए तुरुप का पत्ता साबित हो सकता है। विशेषकर दक्षिण भारत के राज्यों में, जहां द्रविड़ राजनीति नेतृत्वकारी भूमिका में है, कांग्रेस और इंडिया गठबंधन को नई संजीवनी मिल सकती है। कर्नाटक और तेलंगाना में जिस तरह कांग्रेस ने शानदार जीत हासिल की है, उसके पीछे मल्लिकार्जुन खरगे का नाम बहुत अहम माना जाता है। ऐसे में यह मानने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए कि यदि खरगे को इंडिया गठबंधन ने पीएम उम्मीदवार के रूप में पेश किया, तो इससे उसकी साख को मजबूती मिलेगी।
उत्तर भारत के राज्यों में मल्लिकार्जुन खरगे की विश्वसनीयता कितनी होगी, यह कहना आसान नहीं है, लेकिन इसका एक सकारात्मक संदेश अवश्य जाएगा और कांग्रेस के साथ-साथ दूसरे दलों को इसका लाभ हो सकता है। कांशीराम-मायावती के बाद की राजनीति में कोई ऐसा चेहरा नहीं है, जो दलितों का प्रतिनिधित्व करता हो। ऐसे में दलित समुदाय भी कहीं न कहीं दूसरे दलों की ओर आकर्षित हो रहा है। दलितों का एक बड़ा हिस्सा भाजपा के पास भी चला गया है।
लेकिन यदि कांग्रेस दलित चेहरे को प्रधानमंत्री के तौर पर पेश कर दे, तो इससे दलितों का वोटर उसके पास वापस लौट सकता है। इंडिया गठबंधन में शामिल अरविंद केजरीवाल को इसका लाभ दिल्ली-पंजाब में हो सकता है, तो ममता बनर्जी को इसका लाभ पंजाब में हो सकता है। यूपी में समाजवादी पार्टी और बिहार में लालू-नीतीश कुमार को भी इसका लाभ मिल सकता है।
लेकिन आसान नहीं राह
लेकिन खरगे को प्रधानमंत्री पद के रूप में स्वीकार करना सबके लिए आसान नहीं होगा। खुद कांग्रेस में ही एक वर्ग राहुल गांधी को प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनाने पर तुला हुआ है, ऐसे में उनके लिए यह समझा पाना आसान नहीं होगा कि खरगे को पीएम उम्मीदवार बनाने से बेहतर संदेश दिया जा सकता है।
विपक्ष में भी अनेक दल लगातार कांग्रेस पर हमलावर रहे हैं। उनके लिए भी खरगे को पीएम उम्मीदवार के रूप में स्वीकार कर पाना आसान नहीं होगा। ममता बनर्जी उन्हें राष्ट्रीय संयोजक बनाने पर तो सहमत हो सकती हैं, लेकिन जब प्रधानमंत्री पद की बात आएगी तब उनका रुख क्या रहेगा, यह कहा नहीं जा सकता। यहां तक कि जिस अरविंद केजरीवाल ने खरगे को पीएम बनाने का पासा फेंका है, जब बात असलियत में सामने आ जाएगी, तो उनका रुख कैसा होगा, कहना आसान नहीं है। क्योंकि खरगे को पीएम उम्मीदवार बनाने का एक मतलब दिल्ली-पंजाब में दलित मतदाताओं को कांग्रेस की ओर धकेलना होगा, जिसे केजरीवाल कभी पसंद नहीं करेंगे, क्योंकि यह निर्णय उनके लिए राजनीतिक आत्महत्या की तरह होगा।