मूडीज में रेटिंग बढ़वाने के लिए भारत ने की लॉबिंग की असफल कोशिशः रिपोर्ट
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इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार अंतराष्ट्रीय स्तर पर बेहतर रेटिंग पाने के लिए प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में काफी प्रयास किया गया जिससे विदेशी निवेश को आकृषित किया जा सके।
साल 2014 में प्रधानमंत्री मोदी के सत्ता में आने के बाद सरकार ने विदेशी निवेश को बढ़ावा देने के लिए में मुद्रास्फीति नीचे रखने और राजकोषीय घाटे और चालू खाते को कम करने के लिए काफी कदम उठाए हैं। लेकिन इसका भी कोई खास असर नहीं दिखाई दिया है। यही कारण है कि शीर्ष तीन ग्लोबल रेटिंग एजेंसी ने भारत की रेटिंग में कोई सुधार नहीं किया।
वित्त मंत्रालय ने खत और ईमेल से रखा अपना पक्ष
पूर्व में वित्त मंत्रालय और अंतराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी मूडीज के बीच बातचीत के अप्रकाशित संवाद से पता चलता है कि नई दिल्ली रेटिंग कर्ज के बोझ और 136 बिलियन डॉलर के कर्ज तले बैंकों के मुद्दे पर एजेंसी को संतुष्ट नहीं कर पाई।
अक्टूबर में वित्त मंत्रालय की ओर से एजेंसी को लिखे गए खतों और ईमेल में मूडीज की मैथोलॉजी पर भारत ने सवाल उठाते हुए कहा था कि वह हाल के वर्षों में कम होते कर्ज के घाटे को नहीं गिन रही है।
हालांकि मूडीज ने भारत के इस तर्क को नहीं माना और कहा कि भारत की कर्ज की स्थित उतनी अच्छी नहीं है जितनी वह दावा कर रही है न ही उनके बैंकों की स्थिति में सुधार आया है।
मूडी और उसके प्रमुख एनालिस्ट मैरी डिरोन ने इस संबंध में कोई कमेंट तो नहीं किया, उनका कहना था कि रेटिंग की विवेचना गोपनीय है इसलिए इस पर कुछ नहीं कहा जा सकता। वहीं वित्त मंत्रालय ने भी इस संबंध में कोई बयान जारी नहीं किया। वित्त मंत्रालय के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी अरविंद मायाराम ने इस पूरी कवायद को गैरजरूरी बताया है।